भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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१०८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धि

**अनु०—**उदाहरण के लिए निम्नलिखित अवसरों पर कुश और जल से धोने से ही शुद्धि बतायी गयी है। अग्निहोत्र में घर्मोच्छिष्ट, दधिघर्म, कुण्डपायिनायन, उत्सगिणामयन, दाक्षायणयज्ञ, ऐडादध, चतुश्चक्र, ब्रह्मौदन ॥ ३० ॥

**टि०—**अग्निहोत्र में आहुति के बाद हवणी से ही शेष हवि का भक्षण किया जाता है। सोमयज्ञ में दधिघर्म का भक्षण होता है। कुण्डपायिनामयन नामका वर्ष भर का विशेष सत्र होता है उसमें ऋत्विज चमस से ही भक्षण करते हैं। उत्सर्गिणामयन भी एक विशेष सत्र है इसमें पात्र से ही सान्नाय्य अन्न का भक्षण होता है। दाक्षायणयज्ञ दर्शपूर्णमास का ही एक रूप है। उसमें भी सान्नाय्य अन्न का भक्षण होता है। ऐडादध चतुश्चक्र विशेष प्रकार की इष्टियाँ तथा दर्शपूर्णमास के ही रूप हैं इनमें भी सान्नाय्य का भक्षण होता है। इस प्रकार के भक्षण के बाद चमस या यज्ञपात्र की शुद्धि कुश और जल द्वारा प्रक्षालन करने से हो जाती है। बोधायन श्रौत सूत्र, तथा आश्वलायन श्रौतसूत्र में ये विशिष्ट यज्ञ तथा इष्टियाँ वर्णित हैं।

शौचमित्यनुवर्तते । चतुश्चक्रो नाम 'इष्टकोष्ठमध्ये वसन्ते यजन्ते । तथैडादधः । अन्यत् प्रसिद्धम् । यथैतदिति निपातावुदाहरणसूचनार्थौ । तेषु कर्मस्वग्निहोत्रहवण्यादीनामुच्छिष्टसमन्वारब्धे शेषोपघाते च दर्भैरद्भिः प्रक्षालनमेव शौचं नावलेखनादि । ब्रह्मौदनेष्विति बहुवचनमाश्वमेधिकानामुपसङ्ग्रहणार्थम् । तत्र यद्यपि ब्रह्मौदनभोजनपात्रस्य सकृद्भोजने कृते पुनः क्रतौ नोपयोगः । तथाऽपि दर्भैरद्भिः प्रक्षालनं शौचम्, नेतरत्, अद्भिः प्रक्षालनमेवेत्यभिप्रायः ॥ ३० ॥

किञ्च—

सर्वेष्वेव सोमभक्षेष्वद्भिरेव मार्जालीये प्रक्षालनम् ॥ ३१ ॥

**अनु०—**सभी सोमयज्ञों में चमस आदि का मार्जालीय पर जल से ही प्रक्षालन करना चाहिए ॥ ३१ ॥

ग्रहचमससोमभक्षेषु 'मार्जालीयेऽद्भिः प्रक्षालनं न दर्भैरिति ॥ ३१ ॥

तेषामेव—

मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युत्सर्गः ॥ ३२ ॥

इति बौधायनधर्मसूत्रे प्रथमप्रश्ने त्रयोदशः खण्डः ॥ १३ ॥


दिना दर्शिता तत एवाऽवगन्तव्या । अस्यैव च वसिष्ठयज्ञः, केशयज्ञः, सार्वंसेनियज्ञः इत्यपि संज्ञान्तराणि ॥ (बौ. श्रौ. १७.५४.)

१. मार्जालीयो नाम सौमिकवेदेर्दक्षिणभागेऽवस्थितः स्थानविशेषः ॥