भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 486 में से

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११०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ द्रव्यशुद्धिः

**अनु०—**मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि से दूषित हुए धातु के बर्तनों का फिर से ढालने या बनाने पर उनकी शुद्धि होती है ॥ ६ ॥
रुक्महिरण्मयादीनां मूत्राद्युपहतानामेतत् ॥ ६ ॥

गोमूत्रे वा सप्तरात्रं परिशायनम् ॥ ७ ॥
**अनु०—**अथवा उसे सात दिन-रात गाय के मूत्र में डुबो देना चाहिए ॥ ७ ॥
अगूढार्थमिदम् ॥ ७ ॥
अस्मिन्नेव विषये—

महानद्यां चैवम् ॥ ८ ॥
**अनु०—**अथवा एक बड़ी नदी में इसी प्रकार सात दिन-रात तक डाल देना चाहिए ॥ ८ ॥
सप्तरात्रं परिशायनमित्येव । याः स्वनाम्नैव समुद्रं गच्छन्ति ता महानद्यः । 'एते विकल्पाः सन्निकर्षविप्रकर्षापेक्षया व्यवस्थाप्याः ॥ ८ ॥

एवमश्ममयानाम् ॥ ९ ॥
**अनु०—**इसी प्रकार पत्थर के पात्रों को ( जल में डालना चाहिए ) ॥ ९ ॥
**टि०—**ब्यूहलेर ने इस सूत्र को अगले सूत्र के साथ ग्रहण कर गोवाल से घर्षण से ही शुद्धि बता दिया है। इसे अलग पढ़ने पर पूर्ववर्ती सूत्र का नियम ही अनुवर्तित होगा ।
दृषदादिष्वश्ममयेषु परिशायनं द्वितीयम् । एवमिति निर्देशेन पुनः करणमपि । यद्वा—मृन्मयशौचस्यैतदनुकर्षणम् ॥ ९ ॥

अधुना यज्ञभाजनानां फलादीनां शुद्धिः—
अलाबुबिल्वविनालानां गोवालैः परिमार्जनम् ॥ १० ॥
**अनु०—**लौकी, बिल्व, बांस के विनाल नामक पात्रों के दूषित होने पर उनको गाय के केशों के गुच्छे से रगड़ना चाहिए ॥ १० ॥
अलाबुः स्रुचां भाजनम् । बिल्वं यवमतीषु प्रोक्षणीषु यूपावटादिषु चोपयोक्तव्यानां यवानाम् । विनालं वेणुविदलमयादिकं दीर्घभाजनमुच्यते । तच्च प्रणीताप्रणयनादीनाम् । उच्छिष्टसमन्वारब्धानां चैतत् ॥ १० ॥

नलवेणुशरकुशव्यूतानां गोमयेनाऽद्भिरिति प्रक्षालनम् ॥ ११ ॥


१. एतत्स्थाने, कालः रुक्मादीनामुपयोगः कालसन्निकर्षविप्रकर्षापेक्षया व्यवस्थाप्या इति पाठो. गः पु.