बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १११
अनु०—नरकुल, बांस शर और कुश से बुनकर बनाये गये उपकरणों को गाय के गोबर, जल आदि से धोना चाहिए ॥ ११ ॥
टि०—गोविन्द के अनुसार इन उपकरणों के उच्छिष्ट से दूषित होने पर ही प्रक्षालन नियम है । ‘इति’ शब्द से गोमूत्र का भी ग्रहण उन्हों ने माना है ।
इदं पुनरुच्छिष्टलेपोपहतानाम् । नलशब्दो वेत्रे भाष्यते । शेषाः प्रसिद्धाः । एतैः व्यूता ओतप्रोतभावेन समं तता इतिशब्दस्तु गोमूत्रोपलक्षणार्थः ॥ ११ ॥
अथ प्रदेयद्रव्येषु—
व्रीहीणामुपघाते प्रक्षाल्याऽवशोषणम् ॥ १२ ॥
अनु०—बिना कूटे हुए धान के दूषित हो जाने पर उसे धोकर सुखाना चाहिए ॥ १२ ॥
टि०—गोविन्द के अनुसार यह नियम चण्डाल आदि के स्पर्श से एक द्रोण से अल्प धान के दूषित होने पर समझना चाहिए । धान की मात्रा अधिक होने पर केवल जल छिड़क देना पर्याप्त होता है ।
सतुषोपलक्षणमेतत् । उपघातश्चण्डालादिस्पर्शः द्रोणादल्पतरस्येदमुक्तम् । बहूनां तु प्रोक्षणं तथाविधानामेव ॥ १२ ॥
तण्डुलानामुत्सर्गः ॥ १३ ॥
अनु०—(मूत्रादि से दूषित ) चावल को फेंक देना चाहिए ॥ १३ ॥
टि०—अधिक मात्रा हो तो जितना दूषित हुआ हो उतना निकाल कर फेंकने नियम समझना चाहिए ।
मूत्राद्युपहतानामल्पानामिति शेषः । बहूनां तावन्मात्रत्याग इति ( १. १५ १५) वक्ष्यति ॥ १३ ॥
एवं सिद्धहविषाम् ॥ १४ ॥
अनु०—इसी प्रकार तैयार हवि के दूषित होने पर भी उसका त्याग कर देना चाहिए ॥ १४ ॥
एवं चरुपुरोडाशादीनामुपघाते त्याग एवाऽर्थः । स एव च हविर्दोषो भवति ॥ १४ ॥
महतां श्वायसप्रभृत्युपहतानां तं देशं पुरुषाभमुद्धृत्य “पवमा
१. “पवमानस्सुवर्जनः पवित्रेण विचर्षणिः” इत्यादिः “जातवेदा मोर्जंयन्त्या पुनातु” इत्यन्तोऽनुवाकः तैत्तिरीयब्राह्मणे प्रथमाष्टके चतुर्थप्रपाठकेऽष्टमो द्रष्टव्यः ।