बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः
नस्सुवर्जन” इत्येतेनाऽनुवाकेनाऽभ्युक्षणम् ॥ १५ ॥
**अन०—**अधिक मात्रा में कुत्ता, कौआ आदि द्वारा दूषित होने पर उस स्थान से पुरुष के लिये अन्न निकाल कर फेंक दे और शेष पर 'पवमानस्सुवर्जन' (तैत्तिरीय ब्रा० १. ४.८) आद अनुवाक का उच्चारण करते हुए जल छिड़के ॥ १५ ॥
टि०—'पवमानस्सुवर्जनः पवित्रेण विचर्षणिः' से 'जातवेदा मोर्जंयन्त्या पुनातु' अनुवाक है ।
अवशिष्टानामिति शेषः । प्रभृतिशब्दः पतितादिसंग्रहार्थः ॥ १५ ॥
मधूदके पयोविकारे पात्रात् पात्रान्तरानयने शौचम् ॥ १६ ॥
अनु०—(दधि, मधु, घृत, जल, धाना या लावा) से निर्मित मधूदक, दूध के बने आमिक्षा आदि अशुद्ध व्यक्ति द्वारा छुए जाने पर एक पात्र से दूसरे पात्र में रख देने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥ १६ ॥
'‘दधि मधु घृतमापो धानाः’ इत्यत्र मधूदके । पयोविकारः आमिक्षा । एतेषां पुरुषदोषमात्रदुष्टानाम् । तच्चोच्छिष्टस्पर्शमात्रम् । अत्र तु विकारग्रहणात् पयसश्शौचान्तरं कल्प्यम् ॥ १६ ॥
तैलमपि प्रतिनिधित्वेन यज्ञेषु प्राप्तम् । यद्वा—
एवं तैलसर्पिषी उच्छिष्टसमन्वारब्धे उदकेऽवधायोपयोजयेत् ॥ १७ ॥
**अनु०—**इसी प्रकार अशुद्ध व्यक्ति द्वारा छुए गये तेल और घृत को जल में रख कर तब काम में लाना चाहिये ॥ १७ ॥
'तैलं दधि पयस्सोमो यवागूरोदनं घृतम् ।
तण्डुळा मांसमापश्च दशद्रव्याण्यकामतः ॥
इत्यभियुक्तापदेशान्मुख्य एवेति ।
पात्रान्तरानयनमिति निर्दिश्यते । उदकेऽवधानं विशेषः । स च तैलसर्पिषोर्यथाऽऽत्मविनाशो भवति तथा कार्यः ॥ १७ ॥
अथाऽग्नीनां शौचमाह—
अमेध्याभ्याधाने समारोप्याऽग्निं मथित्वा पवमानेष्टिं कुर्यात् ॥१८॥
**अनु०—**अग्नि में मूत्र, पुरीष आदि अमेध्य के पड़ जाने से अरणियों से अग्नि मन्थन कर अग्नि उत्पन्न करे और पवमान इष्टि करे ॥ १८ ॥
१. चिनेष्टिद्रव्यमिदम् ।