भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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अष्टादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने दशमोऽध्यायः १३१

अनु०—धर्मशास्त्रज्ञ इस विषय में निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—यदि वेदाध्ययन करने वाले, उच्चकुल में ( ब्राह्मण वर्ण में ) उत्पन्न आततायी का वध करता है तो उससे वध करने वाला भ्रूणहा ( विद्वान् ब्राह्मण की हत्या का दोषी ) नहीं होता, क्योंकि क्रोध ही क्रोध के ऊपर परावर्तित हो जाता है ॥ १२ ॥

टि०—द्रष्टव्य—मनु० ८-१५०, १५१ ।

भ्रूणहा यज्ञसाधनवधकारी । भ्रूणो यज्ञः बिभर्ति सर्वमिति । एवं ब्रुवतैतद-भिप्रेतम्—आततायिविषयेऽपि ब्राह्मणवधे दोषोऽस्तीति । इतरथा 'न तेन भ्रूणहा भवति' इति नाऽवक्ष्यत् ॥ १२ ॥

'षड्भागभृत्तो राजा' ( १.१८.१ ) इत्युक्तम् । तस्य कचिदपवादमाह—

सामुद्रश्शुल्कः ॥ १३ ॥

अनु०—दूसरे द्वीप से समुद्र मार्ग से लायी गयी वस्तु पर कर इस प्रकार होता है ॥ १३ ॥

राज्ञो भवतीति शेषः । द्वीपान्तरादाहृतं सामुद्रं वस्तु तत्सम्बन्धी सामुद्र-श्शुल्कः पणद्रव्यम् ॥ १३ ॥

तस्मिन् भागः कियानित्यत आह —

वरं रूपमु द्धृत्य दशपणं शतम् ॥ १४ ॥

अनु०—राजा उसमें से किसी उत्कृष्ट द्रव्य ( रत्नादि ) को लेकर शेष में सौ में दस पण ग्रहण करे ॥ १४ ॥

गृह्णीयाद्राजेति शेषः । वरमुत्कृष्टद्रव्यरूपं रत्नादिद्रव्यं स्वामिने प्रदाय शेषं शतधा विभज्य दशपणं गृह्णीयात् । अनेन सामुद्रे दशभागश्शुल्क इत्युक्तं भवति ॥ १४ ॥

अन्येषामपि सारानुरूप्येणाऽनुपहत्य धर्मं प्रकल्पयेत् ॥ १५ ॥

अनु०—दूसरी व्यापारिक वस्तुओं में भी उनके मूल्य के अनुसार उसमें से सबसे अच्छी वस्तु को लिए बिना, व्यापारी को पीडित न करते हुए शुल्क ग्रहण करे ॥ १५ ॥

असामुद्राणामपि द्रव्याणां सारफल्गुत्वापेक्षया वरं रूपमनुपहत्यैव धर्मं प्रकल्पयेदात्मार्थम् । तत्र सारफल्गुविभागो गौतमेनोक्तः 'विंशतिभागश्शुल्कः पण्ये । मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणेन्धनानां षाष्ठ्यम्' इति षष्ठतमं षाष्ठ्यम् ॥

किञ्च—

अब्राह्मणस्य प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं संवत्सरं परिपाल्य राजा हरेत् ॥१६॥