भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

१४४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ विवाहाः

अनु०—वेद में यह बताया गया है कि जिस प्रकार के गुणवाला विवाह होता है उसी प्रकार के गुणवाले पुत्र भी होते हैं ॥ १ ॥

प्रशस्ते विवाहे यत्न आस्थेय इत्यभिप्रायः । तथा च सति तत्रोत्पन्नाः पुत्रा अपि साधवो भविष्यन्ति ॥ १ ॥

'अथाऽप्युदाहरन्ति—

साधवस्त्रिपुरुषमार्षाद् दश दैवाद् दश प्राजापत्याद् दश पूर्वान् दशाऽपरानात्मानं च ब्राह्मीपुत्र इति विज्ञायते ॥ २ ॥

अनु०—इस सन्दर्भ में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य भी उद्धृत करते हैं— आर्ष विवाह से उत्पन्न साधु आचरण वाले पुत्र तीन पुरुषों को, दैव विवाह से उत्पन्न दस, प्राजापत्य से उत्पन्न दस को तथा ब्राह्म विवाह से उत्पन्न पुत्र दस पूर्ववर्ती, दस परवर्ती पुरुषों को तथा स्वयं को पवित्र करता है ॥२॥

टि०—गोविन्द स्वामी ने इसकी व्याख्या नहीं दी है। ब्यूह्लर ने दो सूत्रों का अनुवाद टिप्पणी में दिया है, क्योंकि उनकी प्रति में इनका अभाव है। उनके अनुवाद का भाव इस प्रकार है : "दैव विवाह से दस सदाचारी पुत्र और पुत्रियां ( उत्पन्न होती हैं ), प्राजापत्य विवाह से दस । वेद में यह कहा गया है कि ब्राह्म विवाह से विवाहित पुत्री का पुत्र दस पूर्वजों, दस वंशजों को और स्वयं को पवित्र करता है ।' प्रथम अंश चिन्त्य है। द्रष्टव्य—गौतमधर्मसूत्र १.४.२४-२७. "पुनन्ति साधवः पुत्राः । त्रिपुरुषमार्षात् । दश दैवाद्दशैव प्राजापत्यात् । दश पूर्वान्दश पराना-त्मानं च ब्राह्मीपुत्राः ।" मेरे अनुवाद सहित संस्करण, पृ० ४५ । इस सूत्र का ब्यूह्लर कृत अनुवाद में 'उत्पन्न होने' का अर्थ संगत नहीं है।

तेनाऽस्मिन्नर्थे ब्राह्मणमपि भवतीत्येतदाह ॥ २ ॥

तदाह— वेदस्वीकरणशक्तिरप्येवंविधानामेव पुत्राणां भवतीति ॥ ३ ॥

अनु०—वेद को ग्रहण करने की शक्ति भी इसी प्रकार के पुत्रों (आर्ष, दैव, प्राजापत्य तथा ब्राह्म विवाह से उत्पन्न पुत्रों) में ही होती है ॥ ३ ॥

ऋग्ध्येतत् ॥ ३ ॥

आसुरादिविवाहो ब्राह्मणानां निन्द्य इत्याह—

क्रीता द्रव्येण या नारी सा न पत्नी विधीयते । सा न दैवे न सा पित्र्ये दासीं तां कश्यपोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥


१. इदमग्रिमं च सूत्रं मूलपुस्तकेषु न स्तः ।

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 196, कुल 486 में से · BharatKosha