भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

प्रथमः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १६१

एतदेवाऽसंस्कृते ॥ २३ ॥

अनु०—इसी प्रकार शिष्य का संस्कार न करने पर ( अध्यापन पूरा न करने पर भी गुरु तीन कृच्छ्र व्रत करे ) ॥ २३ ॥

संस्कारः संस्कृतं शौचाचारादिलक्षणानुशासनं तदभावोऽसंस्कृतम् । तस्मिन्नप्येतदेव कृच्छ्रत्रयम् । एतदुक्तं भवति—शिष्यशासनाकर्तुर्गुरोः प्राजापत्यत्रयमिति ॥ २३ ॥

गुरुप्रसङ्गाद् ब्रह्मचारिणोऽपि नियममाह—

ब्रह्मचारिणश्शवकर्मणा व्रतावृत्तिरन्यत्र मातापित्रोराचार्याच्च ॥ २४ ॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी अपने माता-पिता या आचार्य के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति के शव का कोई कर्म ( वहन करना या दाहसंस्कार ) करता है तो उसे अपना व्रत पुनः आरम्भ से करना चाहिए ॥ २४ ॥

टि०—इस प्रकार के शव-संस्कार के बाद ब्रह्मचारी को पुनः उपनयनं करना पड़ता है। मनु में भी इस सम्बन्ध में माता-पिता, गुरु का शव-संस्कार करने पर ब्रह्मचारी के व्रत को खण्डित माना है ।

शवकर्म अलङ्करणवहनदहनादि । तेन कृतेन व्रतावृत्तिरुप नयनावृत्तिः, पुनरूपनयनम् । तदेतदन्यत्र मातापित्रोराचार्याच्च । तेषां शवकर्मण्यपि दोषाभावः । आह च मनुः—

आचार्यं स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् ।
निहृत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ इति ॥ २४ ॥

इदानीमन्यत्राऽपि पुनरुपनयननिमित्तेषु ब्रह्मचारिणः क्वचिदपवादार्थमिदमाह—

स चेद् व्याधीयोत कामं गुरोरुच्छिष्टं भैषज्यार्थं सर्वं प्राश्नीयात् ॥२५॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी किसी रोग से पीड़ित हो तो वह औषधि के लिए गुरु के प्रयोग से उच्छिष्ट सभी प्रकार की वस्तुएं खा सकता है ॥ २५ ॥

टि०—ब्रह्मचारी के लिए मधु, मांस इत्यादि वर्जित है किन्तु रोगी होने पर औषधि के रूप में इनका प्रयोग किया जा सकता है । स्वाद या तृप्ति के लिए नहीं । रोग दूर हो जाने पर उन वस्तुओं का परित्याग कर देना भी विहित है ।

स यदि ब्रह्मचारी रोगेणाऽभिभूयेत कामं तथा भैषज्यार्थं सर्वं मधु मांसाद्यपि प्राश्नीयादिति सम्बन्धः । तत्र व्रतावृत्तिर्नाऽस्ति गुरोरुच्छिष्टभोजनेऽपि ।

१४ बौ० गृ०