बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ प्रायश्चित्तम्
बौधायन-धर्मसूत्रम्
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गुरुराचार्योऽभिप्रेतः। यदि व्याधेरपगमनं चेत् विरुद्धभोजने भवति, तत आचार्योच्छिष्टं भक्षयेत् । नोपभोगार्थं तृप्त्यर्थं वा । सर्वं मधुमांसादि प्रतिषेध-माचार्योनेनापोत्यर्थः। अथ प्राशितेऽपि व्याधेरनपगमस्ततो निवत्तैत। व्याधीयीत १इङ्घाङ् इत्यस्य धातोर्व्याङ्पूर्वात् लिङात्मनेपदयक्सीयुडुगुणादौ कृते कर्मक-र्तरि २व्याधीयोतेति भवति ३व्याधिमान् भवतीत्यर्थः॥ २५ ॥
गुरोरुच्छिष्टसर्वप्राशनेऽपि रोगशमनस्याऽसम्भवे तु—
येनेच्छेत्तेन चिकित्सेत ॥ २६ ॥
**अनु०—**औषधि के लिए किसी वस्तु का प्रयोग ब्रह्मचारी कर सकता है ॥ २६ ॥
**टि०—**अर्थात् लशुन इत्यादि वे वस्तुएं भी जो गुरु के लिए निषिद्ध हैं प्रयोग में लाई जा सकती हैं।
गुरोरपि यत्प्रतिषिद्धं लशुनगृञ्जनादि तेनाऽपि चिकित्सा कार्येत्यभिप्रायः। 'सर्वत एवाऽऽत्मानं गोपायेत्' इति स्मृतेः ॥ २६ ॥
स यदा गदी स्यात्तदुत्थायाऽऽदित्यमुपतिष्ठते “हंसश्शुचिष”दित्येतया ॥ २७ ॥
**अनु०—**रोगी होने पर ब्रह्मचारी उठकर 'हंसश्शुचिषद' इत्यादि मन्त्र से सूर्य की प्रार्थना करे ॥ २७ ॥
**टि०—**यह प्रायश्चित्त उस ब्रह्मचारी के लिए है जो रोगी होने के कारण सन्ध्या वन्दन तथा अन्य प्रकार की पूजा अर्चना न कर सकता हो। ब्रह्मचारी के अतिरिक्त दूसरों के लिए भी यह प्रायश्चित्त का नियम समझना चाहिए।
गदी व्याधितः। ब्रह्मचारिणो व्याधितस्य सन्ध्योपासनादिनियमानुष्ठाना-शक्तौ प्रायश्चित्तमेतत्। इतरेषां चैतदेषाऽविरोधिस्वात् ॥ २७ ॥
तत्र गृहस्थस्येदम्—
दिवा रेतस्सिक्त्वा त्रिरपो हृदयङ्गमाः पिबेद्रेतस्याभिः ॥ २८ ॥
**अनु०—**दिन में वीर्यपात करने पर 'रेतस्' शब्द से युक्त मन्त्रों का उच्चारण करते हुए तीन बार हृदय तक पहुँचने वाले जल का पान करे ॥ २८ ॥
१. इण् गतावित्यस्य धातोरधिपूर्वं इति, क, घ. पु.
२. इदमशुद्धं प्रतिभाति।
३. व्याधिमनुभवति इति घ. पु.