भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 268
२१६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ स्नातकधर्माः

पुनः धयन्तोमितिशब्देन स्तनं पिबन्तीति गम्यते १। गां धयन्तीं वत्सस्य मूत्रा- दिकमिति योजनया। अनेन चाऽतीव प्रस्तुतावस्था लक्ष्यते ॥ १७ ॥

'नाधेऽनुमधेनुरिति ब्रूयात् ॥ १८ ॥
यदि ब्रूयात् धेनुम्भव्येत्येव ब्रूयात् ॥ १९ ॥

**अनु०—**जो गाय दूध न देने वाली गाय हो उसे अधेनु न कहे। यदि उसके विषय में कहना हो तो उसे 'धेनुभव्या' (भविष्य में दूध देने वाली) कहे ॥१८-१९॥

क्षीरिणी गौर्धेनुः । अधेनुस्तद्विपरीता । ^२उच्चारणनिषेधाददृष्टं कल्प्यम् ॥ १८ ॥ १९ ॥

^३शुक्ता रूक्षाः परुषा वाचो न ब्रूयात् ॥ २० ॥

**अनु०--**शोकमय वा अपशकुनयुक्त, रूक्ष और कठोर वचन न बोले ॥२०॥
**टि०—**शुक्ता से इस प्रकार के वचनों का तात्पर्य है जिससे किसी को हृदय में कष्ट हो और अपने दुर्भाग्य का स्मरण हो जैसे विधवा को विधवा कहना। रूक्ष वचन में किसी व्यक्ति में दोष न होने पर भी उसमें दोष का कथन होता है जैसे श्रोत्रिय को अश्रोत्रिय कहना। परुष वचन ऐसे वचन हैं जिनमें किसी में दोष होने पर भी गुण के रूप में उल्लेख किया जाय जैसे अन्धे को आँखवाला कहना।—गोविन्द स्वामी।

शुक्ताः शोककारिण्यः, यथा विधवा विधवाविति । रूक्षाः अविद्यमाने दोषे दोषख्यापिकाः, यथा श्रोत्रियं सन्तमश्रोत्रिय इति । परुषास्तु विद्यमाने दोषे गुणख्यापकाः, यथाऽन्धं चक्षुष्मानिति ॥ २० ॥

नैकोऽध्वानं व्रजेत् ॥ २१ ॥

**अनु०—**अकेले यात्रा पर न निकले ॥ २१ ॥

मध्ये व्याध्याद्युत्पत्तिप्रसङ्गात् । अतस्सद्वितीयो व्रजेत् ॥ २१ ॥

° न पतितैर्न स्त्रिया न शूद्रेण ॥ २२ ॥

**अनु०—**पतितों के साथ, किसी स्त्री के साथ या शूद्र वर्ण के पुरुष के साथ यात्रा न करे ॥ २२ ॥


१. cf. गौ. ध. ९. २०.
२. अनुच्चारणे नियमादृष्टं कल्प्यम् । इति घ. पु.
३. घ. पुस्तके रिक्ता इति सूत्रमारभ्य रिक्ताः व्यर्थाः, रूक्षाः क्रूराः, परुषाः कर्णकठोराः, इति व्याख्यातम् ।