बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ भोजनविधिः |
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को भोजन कराये, फिर गर्भिणी स्त्रियों की, उसके बाद बालकों और वृद्धों को भोजन कराये फिर दुःखी व्यक्तियों को और विशेषतः रोगी व्यक्ति को भोजन कराए ॥ ५ ॥
अन्तर्वत्नी गर्भिणी। ऋज्वन्यत् ॥ ५ ॥
अन्यथाकरणनिन्दा—
अदत्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्क्ते यथाविधि ।
भुज्यमानो न जानाति न स भुङ्क्ते स भुज्यते ॥ ६ ॥
**अनु०—**किन्तु जो व्यक्ति पहले उपर्युक्त व्यक्तियों को नियमपूर्वक भोजन न कराकर स्वयं ही भोजन कर लेता है, वह यह नहीं जानता कि स्वयं उसी का भक्षण होता है, वह खाता नहीं है, खाया जाता है ॥ ६ ॥
यथाविधीति आचमनभोजनसामान्यात् भुज्यमानः क्षीयमाणोऽपि न जानात्यात्मनो भुज्यमानताम्। न हि स भोजनकर्ता। किं तर्हि ? स भुज्यते कर्म भवति। यथा भुज्यमानं द्रव्यं क्षीयते एवं केवलादीत्यभिप्रायः ॥६॥
पितृदैवतभृत्यानां मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
वाग्यतो विघसमश्नीयादेवं धर्मो विधीयते इति ॥ ७ ॥
**अनु०—**पितरों, देवों, सेवकों, माता, पिता, तथा गुरुओं को खिलाने के बाद अवशिष्ट भोजन मौन होकर ग्रहण करे, यही धर्म बताया गया है ॥ ७ ॥
विघसः शेषः। तथा वसिष्ठोऽप्यतिथिपूजाप्रकरणे आह—'श्रेयांसं श्रेयांसमानुपूर्व्येण। स्वगृह्याणां कुमारीबालवृद्धतरुणप्रजाताः। ततोऽपरान् गृह्यांश्च। श्वचण्डालपतितवायसेभ्यो भूमौ निर्वपेत्। शूद्रायोच्छिष्टमनुच्छिष्टं वा दद्यात्। शेषं दम्पती भुञ्जीयाताम्' इति। वाग्यत इति पुनर्वचनमादरार्थम् ॥७॥
अथाऽप्युदाहरन्ति—
'अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशारण्यवासिनः ।
द्वात्रिंशतं गृहस्थस्याऽपरिमितं ब्रह्मचारिणः ॥ ८ ॥
**अनु०—**इस संबन्ध में ही निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं संन्यासी का भोजन आठ ग्रास का होता है, वानप्रस्थ का भोजन सोलह ग्रास का तथा गृहस्थ का भोजन बत्तीस ग्रास का होता है, किन्तु ब्रह्मचारी के लिए भोजन के ग्रासों का कोई नियम नहीं है ॥ ८ ॥
१. cf. वा. ध. ६. १८.