बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| २८८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ संन्यासविधिः |
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अथ पृष्ठ्याँस्तीर्त्वाऽपः प्रणीय वैश्वानरं द्वादशकपालं नि 'पति सा प्रसिद्धेष्टिसन्तिष्ठते ॥ २३ ॥
अनु०—इसके उपरान्त वेदी के पृष्ठ्या नाम के भाग को ढंक कर जल लाकर अग्नि वैश्वानर के लिए द्वादश कपालों में चरु तैयार करे । यह प्रसिद्ध इष्टि ही अन्तिम इष्टि है ॥ २३ ॥
अग्निर्वैश्वानरो देवता अस्य । औपासननिष्ठ आत्मसमारोपञ्चेत् तद्देवत्यश्चरुः । अन्यत्प्रसिद्धम् ॥ २३ ॥
आहवनीयेऽग्निहोत्रपात्राणि प्रक्षिपेदमृन्मया^१न्यनायसानि ॥ २४ ॥
अनु०—अग्निहोत्र के उन पात्रों को जो मिट्टी या पत्थर के न हों, आहवनीय अग्नि में डाले ॥ २४ ॥
उत्तरत्र मन्त्रविधानात् तूष्णीमेवाऽत्र प्रक्षेपः ॥ २४ ॥
गार्हपत्ये अरणी^२ "भवतं नस्समनसा" विति ॥ २५ ॥
अनु०—'भवतं नस्समनसो' (तुम हमारे मन के साथ एक होओ) कहते हुए दोनों अरणियों को गार्हपत्य अग्नि में डाले ॥ २५ ॥
प्रक्षीपतीत्यनुवर्तते ॥ २५ ॥
अथाऽऽत्मन्यग्नीन् समारोपयते "^३या ते अग्ने यज्ञिया तनू" रिति त्रिस्त्रिरेकैकं समाजिघ्रति ॥ २६ ॥
अनु०—अपने में पवित्र अग्नियों का समारोपण करे और 'या ते अग्ने यज्ञिया तनू ।' कहते हुए तीनों अग्नियों के धुएं को तीन-तीन बार खींचे ॥ २६ ॥
एकैकमग्नि सभ्यावसथ्यावपि यदि विद्येते, तथा औपासनमपि । जिघ्रतिः गन्धोपादाने वर्तते । ततश्च धूमायमाने नाग्नेराघ्राणं कर्तव्यमिति गम्यते । सर्वत्राऽयमात्मसमारोपणप्रकारः ॥ २६ ॥
अथाऽन्तर्वेदि तिष्ठन् ओं भूर्भुवस्सुवः संन्यस्तं मया संन्यस्तं मया संन्यस्तं मयेति त्रिरुपांशुक्त्वा त्रिरुच्चैः ॥ २७ ॥
अनु०—तब यज्ञवेदि के भीतर खड़े होकर तीन बार मन्द स्वर से तथा तीन बार उच्च स्वर से कहे 'ओं भुर्भुवस्सुवः संन्यस्तं मया' ( मैंने संन्यास आश्रम में प्रवेश किया ) ॰॰॰॥ २७ ॥
१. अनश्ममयानि, इति सर्वत्र पाठः ।
२. भवतं नस्समनसौ समोकसावरेपसौ । मा यज्ञं हिंसिष्टं मा यज्ञपतिं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः ॥ (तै० सं० १. ३. ७.)
३. तैत्तिरीयादौ श्रूयमाणमिदं वाक्यम् ॥ तै. सं. ६. ३. १०. १.