भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

षष्ठमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने अष्टमोऽध्यायः ४०३

अनु०—वृद्धावस्था, युवावस्था और बाल्यावस्था में, यहाँ तक कि पूर्वजन्म में भी अज्ञानवश किये गये पापों का जितना संचय होता है उन सबसे वह मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

फलविधिः फलार्थवादो वायम् ॥ ८ ॥

भोजयित्वा द्विजानन्ते पायसेन सुसर्पिषा । गोभूमितिलहेमानि मुक्तवद्भूयः प्रदाय च ॥ ९ ॥ विप्रो भवति पूतात्मा निर्दग्धवृजिनेन्धनः । काम्यानां कर्मणां योग्यः तथाऽऽधानादिकर्मणाम् ॥ १० ॥

अनु०—सात दिनों के अन्त में ब्राह्मणों को भली भांति घृत से युक्त पायस (खीर) का भोजन कराकर तथा भोजन करने वालों ब्राह्मणों को गाय, भूमि, तिल और सुवर्ण दान देकर ब्राह्मण पाप रूपी इन्धन के जल भस्म हो जाने से पवित्र हो जाता है, वह मन की इच्छाओं की प्राप्ति के योग्य हो जाता है तथा अग्नि का आधान आदि याज्ञिक कर्मों के लिए भी योग्य बन जाता है ॥ ९-१० ॥

अन्ते सप्ताहस्य । ततस्सप्तम एवाऽहन्यापराहिकप्रयोगानन्तरं भोजनादि गम्यते । द्विजास्यवराः । गवादीनां समुच्चयः । स च मुक्तवद्भूयः प्रत्येकं भवति । विप्रग्रहणं द्विजातिप्रदर्शनार्थम् । वृजिनं पापम् , तदेवेन्धनम् , तन्निर्दग्धं येनेति विग्रहः । योग्यः अधिकारी । अन्यथाऽनधिकारीति गम्यते । एषा तावद्गणहोमक्रिया ह्यात्मन एव प्रयोक्तव्या नाऽन्यस्य ॥ ९-१० ॥

इति बौधायनीयधर्मसूत्रविवरणे गोविन्दस्वामिकृते चतुर्थप्रश्ने सप्तमोऽध्यायः ।


अष्टमोऽध्यायः

अष्टमः खण्डः

तत्र दोषमाह—

अतिलोभात्प्रमादाद्वा यः करोति क्रियामिमाम् । अन्यस्य सोऽहसाऽऽविष्टो गरगीरिव सीदति ॥ १ ॥

अनु०—जो व्यक्ति अत्यन्त लोभ से या प्रमाद से दूसरे व्यक्ति के लिए इस