भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 486 में से

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पृष्ठ 459

अष्टमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने अष्टमोऽध्यायः ४०५

किंच—

प्राजापत्यमिदं गुह्यं पापघ्नं प्रथमोद्भवम् ।
समुत्पन्नान्यतः पश्चात्पवित्राणि सहस्रशः ॥ ५ ॥

**अनु०—**प्रजापति के इस पाप का विनाश करने वाले रहस्य का सबसे पहले उद्भव हुआ इसके बाद ही सहस्रों का अन्य पवित्र करने वाली क्रियाएँ उद्भूत हुईं ॥ ५ ॥

इदमष्टगणहोमकर्म प्राजापत्यं प्रजापतेस्सकाशात् प्रथमोद्भूतम् । अन्यानि तु यन्त्रान्यतः पश्चादुत्पन्नानि ॥ ५ ॥

अथाऽस्यैव कालविकल्पाः—

योऽब्दायनर्तुपक्षाहान् जुहोत्यष्टौ गणानिमान् ।
पुनाति चाऽऽत्मनो वंश्यान् दश पूर्वान् दशाऽपरान् ॥ ६ ॥

**अनु०—**जो व्यक्ति वर्ष, अयन, ऋतु और पक्ष के प्रथम दिनों को इन आठ गण होमों को करता है वह अपने वंश के दश पहले के तथा दश बाद के पुरुषों को पवित्र करता है ।

कर्तुस्तु कालाभिनियमात् फलविशेषः कल्प्यते । अब्दस्संवत्सरः । अयनं तदर्धः आदित्यस्य दक्षिणोत्तरायणगमनेन । ऋतुः अब्दषड्भागो वसन्तादिः । तदर्धः मासः । तदर्धः पक्षः शुक्लः कृष्णो वा । अहस्तु प्रसिद्धम् । एतद्वन्दादिभिरेव सम्बध्यत इति केचित् । कल्पान्तरमित्यपरे ॥ ६ ॥

अथ—

एतानष्टौ गणान् होतुं न शक्नोति यदि द्विजः ।
एकोऽपि तेन होतव्यो रजस्तेनाऽस्य नश्यति ॥ ७ ॥

**अनु०—**यदि कोई द्विज इन आठ गण होमों को करने में समर्थ न हो तो एक ही करे; उसी से उसका पाप नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥

तत्राऽप्यशक्तौ—

सूनवो यस्य शिष्या वा जुहुत्यष्टौ गणानिमान् ।
अध्यापनपरिक्रीतैरंहसस्सोऽपि मुच्यते ॥ ८ ॥

**अनु०—**जिसके पुत्र या शिष्य इन आठ गण होमों को करते हैं वह भी उनका अध्यापन कर उस पुण्य को खरीद लेता है और पाप से मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

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