बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
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४१० बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अनुशिष्टं लोक्यम् | बृ. उ. १. ५. १७ | २८० |
| अनृतसम्मिता मनुष्याः | ऐ. ब्रा. १. ६. | २८९ |
| अनृतञ्च समुत्कर्षवति | ३३५ | |
| अन्नं प्राणमन्नमपानम् | तै. ब्रा. २. ८. ८. | २२१ |
| अन्नं ब्रह्म | तै. उ. २. २. | ३०२ |
| अन्नममृतम् | तै. आ. १०. १५. | २६१ |
| अन्विदनुमते त्वम् | तै. सं ३. ३. ११. | ४०१ |
| अपि यत्सुकरं कर्म | मनु. ७. ५२. | ३४२ |
| अपो निशि न गृह्णीयात् | ४१ | |
| अपोऽशान कर्म कुरु | तै. सं. सं. २. ६. | २६१ |
| अभावप्रत्ययालम्बना | यो. सू. १. १२. | २०४ |
| अभिचरन् दशहोतारं | तै. ब्रा. २. २. १. | १०२ |
| अभि त्वा शूर | साम. सं. ५. ३. १. | ३५९ |
| अभिहुत्य हुत्वा भक्षयन्ति | तै. सं. ६. २. ११ | २०० |
| अभ्यर्हितं पूर्वम् | व्याक. वा. २३४. | २२४ |
| अद्भि कार्ष्णायसीम् | मनु. ११. १३३ | ३६१ |
| अबद्धं मनो दरिद्रं | तै. सं. ३. १. १. | १२१ |
| अमन्त्रिका तु कार्येयं | मनु. २. ६६. | ८० |
| अमृतापिधानमसि | याज्ञिकी. ५०. | ३४५ |
| अमृतोपस्तरणमसि | याज्ञिकी. ४७. | २६१ |
| अलाबुं दारुपात्रं वा | मनु. ६. ५४. | २८५ |
| अयं वाव यः पवते | तै. ब्रा. ३. ११. ७. | २६९ |
| अहंकृत्य तृचञ्च | पा. सू. ३. ३. १४९ | २३४ |
| अव ते हेडः | तै. सं. १. ५. ११. | २२५ |
| अश्रद्धया हुतं दत्तम् | भगवद्गी. १७. २८. | ६६ |
| अश्रोत्रिया अननुवाक्याः | ब. ध. ३. १. | २१० |
| अश्मलवणमपण्यम् | ब. ध. २. २९. | ११ |
| असंस्थितो हि तर्हि | २५५ | |
| अज्ञानादिनियमपर्यवसानम् | शाबर भा. १. १. १ | ३५ |
| अहरेष मित्रः रात्रिर्वरुणः | तां. ब्रा. २५. १०. १०. | २२९ |
| अहमस्मि | साम. सं. पू. ६. १. | ३५९ |
| अविच्छिन्नब्राह्मण्यस्सुरां | तं. ब्रा. १. ३; ४. | १० |
| आकारजानामभ्युदितानां | शङ्खः | ६४ |
| आग्नावैष्णवमेकादशकपालं | तै. सं. २. २. ९. | १०२ |
| आग्नेयी वा एषा | तै. ब्रा. ३. ७. ३. | ३९ |
| आचम्याग्न्यादि सलिलं | या. स्मृ. ३. १३. | ८७ |
| आचार्यं स्वमुपाध्यायम् | मनु. ५. ९१ | १६१ |