बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
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४२२ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साऽस्य देवता | पा. सू. ४. २. २४ | ३४४ |
| सान्तानिकं यक्ष्यमाणं | मनु. ११. १. २. | २१२ |
| सार्ववर्णिकं भैक्षाचरणं | गौ. ध. २. ४२. | २२ |
| सिंहे मे मन्युः | बौ. श्रौ. २. ५. | ४०२ |
| सिंहे व्याघ्र उत | तै. ब्रा. २. ७. ७. | ३३६ |
| सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | याज्ञ. २. ७५. | १३७ |
| सुरां पीत्वा द्विजः | मनु. ११. ९० | १५८ |
| सुवर्णस्तेयकृद्विप्रः | मनु. ११. ९९. | १५९ |
| सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा | मनु. ३. ३४. | १४२ |
| सूर्ये ते चक्षुः | तै. आ. ३. ४. | ३४० |
| सूर्यश्च मा मन्युश्च | याज्ञिकी. २४. २५. | २२४ |
| सृष्टीरुपदधाति | तै. सं. ५. ३. ४. | १६३ |
| सोमाय पितृपीताय | बौ. गृ. १. ८. ८. | २७१ |
| स्तेनो हिरण्यस्य सुरां | छा. उ. ५. १०. ९. | १५९ |
| स्तेनस्य श्वपदः कार्यः | मनु, ९. २३७, | १३२ |
| स्नातकव्रतलोपे च | मनु. ११. २०३. | २१७ |
| स्त्रीषु चान्तं | १९७ | |
| स्त्रीभ्यस्सर्ववर्णेभ्यः | आप. ध. २. २९. १६. | ८७ |
| स्त्रीष्वनन्तरजातासु | मनु. १०. ६. | १२२ |
| स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधः | मनु. ११. ६६. | १३४ |
| स्वधर्मो राज्ञः परिपालनं | व. ध. १९. १. | १२८ |
| स्वधा पितृभ्यः | तै. सं. १. १. ११. | ११५ |
| स्वप्ने सिक्त्वा | मनु. २. १८१. | ३८३ |
| स्वमातुलसुतां प्राप्य | तं. वा. १. ३. ३. | ९ |
| स्वमांसं परमांसेन | मनु. ५. ५२. | ७५ |
| स्वरादित्योभवति | निरु. २. ४. २. | २२७ |
| स्वादिष्ठया | ऋ. सं ६. ७. १६. | ३५९ |
| स्वाध्याय एवोत्सृजमानः | आप. ध. .१. २६. ११. | २८९ |
| हन्तिजातानजातांश्च | मनु. ८. ९९. | १३८ |
| हिरण्यवर्णाः | तै. सं. ५. ६. १. | २२५ |
| हिरण्यशृङ्गं वरुणं | याज्ञिकी. उ. १. ७. | २२४ |
| हिंसानुग्रहयोः | गौ. ध. ३. २५. | ३०० |