भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ९

तत्रेमान्युदाहरणानि-- यथैतदनुपेतेन सह भोजनं स्त्रिया सह भोजनं पर्युषितभोजनं मातुलपितृष्वसृदुहितृगमनमिति ॥ ३ ॥

अनु०—ये विशिष्ट आचरण ये हैं:-जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है उनके साथ भोजन करना, पत्नी के साथ भोजन, बासी अन्न का भोजन, मामा की पुत्री से विवाह, बुआ ( पिता की बहन ) की पुत्री से विवाह ॥ ३ ॥

मातुलदुहितृगमनं पितृष्वसृदुहितृगमनमिति सम्बन्धः । ऋज्वन्यत् ॥३॥

अथोत्तरतः ऊर्णाविक्रयः शीधुपानमुभयतोदद्भिर्व्यवहारः आयुधीयकं समुद्रसंयानमिति ॥ ४ ॥

अनु०--उत्तर में जो आचरण विशिष्ट हैं, वे हैं—ऊन बेचने का व्यापार मदिरा-पान, उन पशुओं का विक्रय, जिनके मुख में ऊपर और नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, अस्त्र-शस्त्र का व्यापार तथा समुद्र की यात्रा ॥ ४ ॥

ऊर्णायास्तद्विकारस्य च कम्बलादेर्विक्रयः । उभयतो दन्ता अश्वादयः । व्यवहारः विक्रयादिः आयुधीयकं शस्त्रधारणम् समुद्रसंयानं नावा द्वीपान्तरगमनम् ॥ ४ ॥

इतरदितरस्मिन् कुर्वन् दुष्यतीतरदितरस्मिन् ॥ ५ ॥

अनु०—जिस प्रदेशों में जो आचरण प्रचलित हैं उससे भिन्न प्रदेश में उन आचरणों का व्यवहार दोष उत्पन्न करता है ॥ ५ ॥

टि०—दक्षिण की विशिष्ट रीतियों का उत्तर में आचरण करना दोष उत्पन्न करता है। उत्तर के विशिष्ट कर्मों का दक्षिण में आचरण दोषजनक होता है। इस सम्बन्ध में भट्टकुमारिल के दो वाक्यों को गोविन्दस्वामी ने उद्धृत किया है। "स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति" "अहिच्छत्रब्राह्मण्यस्सुरां पिबन्ति"।

इतरत् अनुपेतेन सह भोजनादि, इतरस्मिन्नुत्तरापथे कुर्वन् दुष्यति तत्रत्यैश्शिष्टैः दूष्यत इत्यर्थः । एवमूर्णाविक्रयादीनि कुर्वन्नितरत्र । तस्मादनुपेतेन सह भोजनादीनि दाक्षिणात्यैश्शिष्टैराचर्यमाणत्वात् दोषाभावाच्च तैरेव कर्तव्यानि । ऊर्णाविक्रयादीनि चोदीच्यैरेव । तदेतद्भट्टकुमारिलैर्निरूपितम्

(१) स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति ॥ इति ॥


१. शूद्रान्नभोजनेनाऽपि तुष्यन्त्यन्ये द्विजातयः । इति पूर्वार्धम् ।