भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 486 में से

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पृष्ठ 92
४०बौधायन-धर्मसूत्रम्[ कमण्डलुचर्या

आज्येनेति शेषः ॥ ६ ॥
जपेद्वा ॥ ७ ॥
अनु०— अथवा व्याहृतियों का उतनी ही बार जप करे ॥ ७ ॥
व्याहृतीरेव ॥ ७ ॥

“भूमिर्भूमिमगानन्माता मातरमप्यगात् । भूयास्म पुत्रैः पशुभिर्यो नो द्वेष्टि स भिद्यता”मिति कपालानि संहृत्याऽप्सु प्रक्षिप्य सावित्रीं दशावरां कृत्वा पुनरेवाऽन्यं गृह्णीयात् ॥ ८ ॥

अनु०— “भूमिर्भूमिमगानन्माता मातरमप्यगात्। भूयास्म पुत्रैः पशुभिर्यो नो द्वेष्टि स भिद्यताम्” (भूमि भूमि को प्राप्त हुई, माता माता के पास गयी, हम पुत्र, पशुओं से वृद्धि प्राप्त करें, जो हम से द्वेष करता है वह नष्ट हो जाय) इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए टूटे हुए कमण्डलु के टुकड़ों को एकत्र कर जल में फेंक दे, कम से कम दस बार गायत्री का जप करे और फिर दूसरा कमण्डलु ग्रहण करे ॥ ८ ॥

टिप्पणी— मन्त्र में 'भूमिः' शब्द मिट्टी से बने कमण्डलु का और 'भूमिम्' प्रकृति अर्थात् पृथ्वी तत्त्व का बोधक है। 'माता मातरम॒ अगात्' से घट के भीतर परिमित आकाश के अपने मूल आकाश तत्त्व में विलीन होने का तात्पर्य है।

भूमिर्भूमिगादिति वामदेव ऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। भिन्नानि मृन्मयानि ^१प्रतिपाद्यानि। भूमिविकाराणां प्रकृतिलयविज्ञानं क्रियते। प्रथमान्तो भूमिशब्दः पात्रमाह। द्वितीयान्तः प्रकृतिम्। कपालानि स्वप्रकृतौ लीनानि। मातां मातरमप्यगात्। य एवमन्तःपरिमिताकाशो मृत्पिण्डः कमण्डलुः घटादिरूपेण निर्मितोऽसावपि स्वप्रकृतिमगात्। ततः किमायातमस्माकम् ? वयं तु पुत्रैः पशुभिर्भूयास्म। आशिषि लिङ्। यो नोऽस्मान् द्वेष्टि स एव हि भिद्यतामिति। अनेन मन्त्रेण कमण्डलुकपालानाम् अप्सु प्रक्षेपणं प्रतिपत्तिः। अथाऽन्यं गृह्णन् सावित्रीं दशावरां कृत्वा जपित्वा गृह्णीयात् ॥ ८ ॥

किञ्च—
वरुणमाश्रित्य 'एतत्ते वरुण पुनरेव तु मामो'मित्यक्षरं ध्यायेत् ॥ ९ ॥
अनु०— वरुण देवता का आश्रय लेकर 'एतत्ते वरुण पुनरेव तु माम् ओम्' ( हे वरुण, यह तेरा है, दूसरा फिर मुझे प्राप्त होवे' ) मन्त्र का उच्चारण करते हुए अक्षर का ध्यान करे ॥ ९ ॥


१. प्रतिपत्तिसंस्कारेण संस्कार्याणीत्यर्थः । कार्योपयुक्तस्य उपयुक्तशेषस्य वा वस्तुनो विहितदेशे प्रक्षेपणं प्रतिपत्तिः ।

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