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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

17. साहिब जी को अष्ट धातु की गदा से मरवाया जाना

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(17) साहिब जी को अष्ट धातु की गदा से मरवाया जाना

साहिब की बढ़ती हुई सत्य भक्ति से परेशान पीर शेख तकी को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि साहिब को कैसे मरवाया जाए। एक दिन उसके सहयोगियों ने सलाह दी कि क्यों न अष्ट धातु की गदा बनवाई जाए और उसका प्रहार कबीर पर करवाया जाए। अष्ट धातु की बनी गदा के प्रहार से कोई भी जीवित नहीं बच सकता। शेख तकी को योजना बहुत पसंद आई। उसने उसी समय ऐसी कई गदा बनवाने का आदेश दिया।

बढ़ती महिमा देख साहिब की, सूझा एक उपाय।
अष्ट धातू की गदा बनाकर, साहिब को मरवायें॥

कुछ ही दिनों में कारीगरों ने अष्ट धातु की गदाएँ तैयार कर दीं। अब उन्हें चलाने वाले चाहिए थे। शेख तकी ने गदा चलाने वाले कुशल पहलवानों को बुलवाया और उन्हें उनका काम समझा कर मुँह मांगा ईनाम देने की बात भी कही। अवसर पाते ही तकी के आदेशानुसार पहलवानों ने गदाएँ अपने-अपने हाथ में लेकर साहिब पर प्रहार करने शुरू कर दिये। प्रहार करते-करते पहलवान तो थक गये और हार मान कर भाग गये, पर साहिब का कुछ नहीं बिगड़ा। यह देख शेख तकी और उसके पाखण्डी साथी बड़े दुखी और लज्जित होकर चले गए।

सबने मिलके साहिब के, शीश पे गदा चलाई।
गदा चलाकर थके पहलवां, साहिब को आँच न आई॥

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18. ज़हरीले नाग के डंक से साहिब जी को मरवाया जाना

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#(18) ज़हरीले नाग के डंक से साहिब जी को मरवाया जाना

बार-बार मारने के प्रयास करता शेख तकी साहिब का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा था। इस बात से उसकी ईर्ष्या भी बहुत बढ़ गयी थी। एक दिन वो कहीं जा रहा था कि रास्ते में उसे एक सपेरा मिला। सपेरा अपने द्वारा पकड़े हुए साँप लोगों को दिखा रहा था। शेख तकी के मन में एक युक्ति आई और उसने सपेरे को अपने पास बुलाया और कहा ज़हरीले साँप के डंक से कबीर को मारना है। यदि तुम इस काम में कामयाब हो जाओगे तो तुम्हें बहुत सारा ईनाम भी मिलेगा। ईनाम के लालच से सपेरा बड़ा खुश हुआ और जंगल में चला गया। जंगल में बीन बजाते-बजाते सपेरे के जाल में एक ज़हरीला नाग आ गया। उसने उसे पकड़कर पिटारी में बंद कर लिया और शेख तकी के पास लाया। शेख तकी ने सपेरे से कहा कि जब मैं इशारा करूँ, तभी तुम इस ज़हरीले नाग को कबीर के गले में डाल देना। राजा सिकंदर का दरबार लगा हुआ था। तब साहिब सबको उपदेश दे रहे थे। ऐसे समय में शेख तकी ने उस सपेरे को आज्ञा दी। शेख तकी की आज्ञा पाते ही सपेरे ने उस ज़हरीले नाग को साहिब के गले में डाल दिया। तकी साहिब के अंत का इंतज़ार कर रहा था पर हुआ बिलकुल उल्टा। साहिब के गले में पड़ा नाग पुष्पमाला बन गया। यह घटना देख सब साहिब की जय-जयकार करने लगे और पीर शेख तकी लज्जित होकर वहाँ से चला गया।

तकी सोचे कबीर जुलाहा, पड़ा अकल को ताला।
विषधारी फनीयर साँप ले, साहिब ऊपर डाला॥
गले पड़ा फनीयर विषधर, बना फूलों की माला॥

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19. साहिब जी को विष वाले त्रिशूल से मरवाया जाना

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(19) साहिब जी को विष वाले त्रिशूल से मरवाया जाना

क्रोध अथवा ईर्ष्या की आग से जलते हुए एक समय शेख तकी ने विचार किया कि क्यों न कबीर को विष वाले त्रिशूल से मरवा दिया जाए। उसके साथी पंडित, मुल्ला, मौलवी आदि को भी यह योजना बहुत अच्छी लगी। बस, फिर क्या था! तकी ने एक त्रिशूल मँगवाया और उसे विष में बुझाया। उसके बाद एक त्रिशूल चलाने वाले को बुलाकर अच्छी तरह से उसका काम समझाया कि उसे क्या करना है।

मुल्ला मौलवी धर्म गुरु, मिल तरकीब एक बनाई।
करो खातमा पीर कबीर का, त्रिशूल से दियो मरवाई॥

जब साहिब सत्य भक्ति की अमृत वर्षा से भक्तों को प्रसन्न कर रहे थे, तो वहीं उस व्यक्ति ने आकर तकी के इशारे से साहिब पर त्रिशूल के अनेक प्रहार किये। पर त्रिशूल तो साहिब के शरीर तक पहुँच ही नहीं पा रहा था। साहिब तो स्वयं सतपुरुष थे। शरीर तो उन्होंने केवल दुनिया को दिखाने मात्र ही धारण किया था। अगर उनका शरीर मायावी होता तो त्रिशुल चलाने वाले का कोई प्रहार खाली न जाता। इसलिए त्रिशूल चलाने वाला थक-हार गया तो उसने वहाँ से भाग लेना ही उचित समझा। यह देख भक्तजन साहिब की जय-जयकार करने लगे और शेख तकी को फिर लज्जित होना पड़ा और वह शर्मसार होकर वहाँ से चला गया।

साहिब तक न पहुँच सका, कोई त्रिशूल का वार।
यह देख हैरान भक्तजन, करते जय-जयकार॥

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20. दूध में काँच मिलाकर साहिब जी को पिलाया जाना

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#(20) दूध में काँच मिलाकर साहिब जी को पिलाया जाना

दूर-दूर तक साहिब की ख्याति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। साहिब की जय-जयकार के जैकारे सुनते-सुनते शेख तकी की क्रोध अग्नि चरम सीमा तक पहुँच गई थी। एक समय शेख तकी ने साहिब से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए किसी विश्वसनीय सहयोगी की सलाह ली। दोनों ने मिल कर एक नया षड्यंत्र रचा कि साहिब को दूध में काँच डालकर पिलाया जाये तो साहिब जीवित नहीं बच पाएगा। शेख तकी ने सोचा कि इससे बादशाह की दृष्टि में भी कबीर नीचा हो जायेगा। यह सोच उसने काँच मँगवाया और उसे बहुत बारीक पीसकर दूध में मिला दिया। काँच मिले हुए दूध को शेख तकी ने कबीर साहिब को पीने के लिए दिया। अंतर्यामी साहिब सब जानते थे। उन्होंने काँच मिले हुए दूध को अपने हाथों में लिया। ऐसे में एक हैरान कर देने वाली घटना हुई। उस दूध से मनुष्य निकल-निकल कर साहिब के चरणों में बन्दना करने लगे। यह देख सब आगे बैठे भक्तजन साहिब की जय-जयकार करने लगे और शेख तकी मारे लज्जा के वहाँ से अपना मुख छुपा कर चला गया।

शेख तकी ने काँच मिला दूध, साहिब को पकड़ाया। भरे गिलास से मनुष्य निकल कर, चरनी शीष झुकाया॥ मारे लज्जा के कोई पाखण्डी, पल भर रुक न पाया। जय-जयकार हुई जगत में, अमरलोक का साहिब आया॥

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21. साहिब जी को तोप से मरवाने का प्रयास

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(21) साहिब जी को तोप से मरवाने का प्रयास

भोले-भाले लोगों को भरम में डाल समाज को लूट-लूट कर खाने वालों की गिनती बढ़ती जा रही थी। धार्मिक पाखण्डियों के पाखण्डवाद को छोड़ कर आम लोग साहिब की सत्य भक्ति को अपना रहे थे। इसलिए साहिब को अपने रास्ते से हटाने के लिए पाखण्डी रोज-रोज नये-नये षंड्यंत्र रचते जा रहे थे। शेख तकी जितनी साहिब की कसौटियाँ लेता था, उतनी ही साहिब की ख्याति बढ़ती जा रही थी। भक्त लोग पाखण्ड से छूटकर साहिब की शरण में तेजी से आने लगे। ऐसे में एक दिन शेख तकी ने षड्यंत्र रचा कि साहिब को तोप से उड़ा देता हूँ। उसने अपने तोपची से कहा कि तुम तोप में गोला बारूद अच्छी तरह से भरो। तोपची ने आदेश का पालन करते हुए तोप में गोला बारूद भर दिया। अब शेख तकी ने साहिब से कहा कि आप इस तोप के सामने खड़े हो जाओ। साहिब बिना किसी झिझक के तोप के सामने खड़े हो गये। तकी ने फौरन अपने तोपची को तोप चलाने का हुक्म दिया। तोपची तोप चलाता था पर तोप से कुछ नहीं निकलता था क्योंकि तोप में भरे गोला बारूद ने पानी का रूप धारण कर लिया था। इसलिए तोप में भरा पानी आग नहीं पकड़ रहा था। साहिब तोप के सामने खड़े-खड़े मुस्करा रहे थे। अब तकी कुछ-कुछ समझने लगा था कि साहिब साधारण नहीं हैं, फिर भी साहिब की कसनी लेने से नहीं चूकता था।

तोप से उड़ाएँ साहिब को, पीर ने ऐसी युक्ति बनाई।
खड़ा किया तोप के आगे, गोला बारुद को आग लगाई॥
गोला बारुद पानी बन गया, ऐसी साहिब खेल रचाई।
शब्द स्वरूपी देह साहिब की, झूठी दुनिया समझ न पाई॥

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22. साहिब जी को मरवाने के लिए जादू की पुड़िया खिलाई गई

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(22) साहिब जी को मरवाने के लिए जादू की पुड़िया खिलाई गई

जब राज गुरु शेख तकी के साहिब को मारने के सारे प्रयास विफल होने लगे तो उसे लगा कि शायद कबीर कोई बहुत बड़ा जादूगर है जो अब तक मारा नहीं गया। उसने सोचा कि कोई जादूगर ही जादूगर कबीर को मारने का सही तरीका बता सकेगा। यह सोच कर उसने साथियों को बुलाया और साहिब को मारने के नये षड्यंत्र के बारे में बताया। सबको यह बात अच्छी लगी। शेख तकी ने अपने सिपाहियों को किसी प्रसिद्ध जादूगर को खोज लाने की बात कही। सिपाहियों को एक ऐसा प्रसिद्ध जादूगर मिल गया। शेख तकी अपने साथियों सहित उस जादूगर के पास गया और कबीर को एक जादूगर बताते हुए कहा कि उसे मार कर पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताओ। जादूगर ने उसकी समस्या को सुनकर उसे एक जादू की पुड़िया दी और उसके प्रयोग की विधि भी बताई। शेख तकी बड़ा खुश हुआ, सोचा कि अब साहिब से छुटकारा मिल जायेगा। अब ठीक समय पाकर जादूगर द्वारा बताई गई विधि के अनुसार शेख तकी ने उस पुड़िया का प्रयोग साहिब पर कर दिया। लेकिन हुआ तो बिलकुल ही उल्टा। साहिब का तो कुछ भी नहीं बिगड़ा बल्कि शेख तकी को ही उस पुड़िया द्वारा कष्ट उठाना पड़ा।

तंत्र मंत्र सब झूठ है, मत भरमो कोय।
सार नाम पाय बिना, कागा हंस न होय॥
डांकिनी शाकिनी बहु किलकारें, जम किंकर धर्मदूत हंकारे।
सत्य नाम सुन भागे सारे, जब सतगुरु नाम उचारा है॥

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23. बाँस की फूँकनी के प्रहार से साहिब जी को मारवाया जाना

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(23) बाँस की फूँकनी के प्रहार से साहिब जी को मरवाया जाना

साहिब की सत्य भक्ति पूरे देश में बहुत तेज़ी से फैल रही थी। पाखण्डियों के चुंगल से निकल कर लोग साहिब की सत्य भक्ति को अपना रहे थे। साहिब की बढ़ती हुई शान देख शेख तकी की चिन्ता बढ़ रही थी। इसलिए वो तलाश में रहता कि कैसे साहिब को रास्ते से हटाया जाये। अपने साथी पंडित, मुल्ला और मौलवियों से मिलकर नये-नये षड्यंत्र साहिब को मारने के लिए रचता रहता। एक दिन उसने नगर में बाँस की भारी फूँकनी देखी तो उसके मन में विचार आया कि क्यों न साहिब के सिर पर इस फूँकनी से प्रहार कर साहिब की जीवन लीला को समाप्त किया जाए। यह सोच कर उसने अपने सिपाहियों को भेजकर वो बाँस की फूँकनी मँगवाई और उसने स्वयं ही बाँस की फूँकनी से प्रहार करने का फैसला कर लिया। समय आने पर उसने उस भारी बाँस की फूँकनी से साहिब के सिर पर प्रहार किया। पर साहिब के सिर पर उसका कोई भी असर न हुआ। साहिब के सिर पर बार-बार प्रहार करने से बाँस की फूँकनी का असर न होते देख शेख तकी अत्यंत लज्जित हुआ और शीघ्र ही वहाँ से चल दिया।

देख बाँस की फूँकनी, तकी ने किया विचार।
जिसके सिर पै लगेगी, वोह सह सके न मार॥
अपने हाथों साहिब पर, बहुत किये प्रहार।
बाल बाँका न कर सका, थक कर गया हार॥

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24. विलक्षण नाग को साहिब जी पर छोड़ा गया

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(24) विलक्षण नाग को साहिब जी पर छोड़ा गया

साहिब को रास्ते से हटाने के सारे प्रयास फेल हो रहे थे। हर बार शेख तकी को लज्जित ही होना पड़ता। पर वो साहिब को जादूगर समझकर नये-नये षड्यंत्र रचने लगता था। कहीं से भी साहिब को मारने की कोई भी सलाह उसे देता तो वो फौरन मान लेता था। क्योंकि उसका एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह से साहिब को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना। शेख तकी के एक सूझवान साथी ने एक ऐसे विलक्षण नाग के बारे में बताया जिसके डंसते ही मनुष्य मर जाता है। शेख तकी ने फौरन उस नाग को मँगवाने का आदेश दे दिया। विलक्षण नाग आ गया। एक दिन जब बादशाह सिकंदर का राजदरबार लगा था और साहिब मध्य में आसन पर विराजमान होकर सत्य भक्ति का उपदेश दे रहे थे, शेख तकी ने ऐसे समय विलक्षण नाग की पटारी अपने हाथ में लेकर साहिब पर उस नाग को छोड़ा। शेख तकी साहिब की छवि को सबके सामने बिगाड़ने के चक्कर में था, पर उसे क्या पता था कि वो अपनी इन करतूतों से साहिब को अधिक-से-अधिक प्रसिद्ध किये जा रहा है। विलक्षण नाग साहिब को प्रणाम कर आकाश में उड़कर लुप्त हो गया। यह देख सब भक्तजन साहिब की जय-जयकार के जैकारे लगाने लगे।

नीचा दिखावन हेतु साहिब को, ऐसा नाग ले आये।
विलक्षण नाग अत डरावना, डसते ही मर जाये॥
नाग फूंकारे मारता, दिया साहिब पर छोड़।
कर प्रणाम साहिब को, उड़ा आकाश की ओर॥

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25. साहिब जी को सागवान के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

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(25) साहिब जी को सागवान के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

आशाओं पर पानी फिर रहा था। शेख तकी बहुत परेशान हो रहा था। साहिब को अपने रास्ते से हटाने के सारे प्रयास असफल हो रहे थे। वो जहाँ भी जाता, उसके कानों में साहिब की प्रशंसा ही सुनाई पड़ती। इससे उसके हृदय की क्रोधाग्नि और बढ़ती जा रही थी। ऐसे में किसी ने उसे बताया कि यदि किसी को सागवान के पेड़ के साथ चाँदी की तारों से बाँध दिया जाए तो उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। बौखलाए हुये शेख तकी ने साहिब को मारने का यह षड्यंत्र बिना विचार किये स्वीकार कर लिया। क्योंकि उसका लक्ष्य था कि किसी भी तरह से साहिब को अपने रास्ते से हटाया जाए।

भक्ति साहिब कबीर की, चारों ओर बढ़ती जाये। रोज बड़ाई सुनते सुनते, तकी को नींद न आये॥

उसने सोचा कि ऐसा करके भी देख लेते हैं। शेख तकी साहिब को घुमाने के बहाने साथ ले गया। रास्ते में जहाँ सागवान के पेड़ थे, वहाँ पहुँचकर रुक गया और साहिब को पेड़ के साथ खड़ा होने को कहा। साहिब उसके कहे अनुसार बिना किसी डर के वहाँ खड़े हो गये। शेख तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को चाँदी की तारों के साथ इस पेड़ से बाँध दो। सिपाहियों ने साहिब को पेड़ के साथ बाँध दिया पर सब बेकार ही गया। साहिब का तो कुछ बिगड़ा ही नहीं। तकी मारे लज्जा के मुँह छिपाकर वहाँ से चला गया।

तार चाँदी से बाँध दिया, साहिब पुरुष कबीर। कुछ न बिगड़ा साहिब का, हार गया तकी पीर॥

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26. नीरु, नीमा और भक्तजनों को कत्ल करवाया

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(26) नीरू, नीमा और भक्तजनों को कत्ल करवाया

साहिब की बढ़ती हुई प्रसिद्धी को देख शेख तकी और भी तिलमला उठा। सिपाहियों को हुक्म दिया कि नीरू–नीमा और अन्य भक्तजन, जो कबीर के शिष्य हैं, उन्हें पकड़ कर हमारे पास लाओ। उसकी आज्ञानुसार सबको पकड़कर लाया गया तो शेख तकी ने अपनी तलवार उठाई और सबके गले काट दिये। जब साहिब को इस बात का पता चला तो वे शेख तकी के पास आये और आकर शेख तकी से कहने लगे कि वाह ! पीर जी, बड़ा बहादुरी वाला काम किया है, क्या पीरों के यही काम होते हैं ! इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो तुमने इनको कत्ल किया ! तुम्हारी दुश्मनी तो मेरे साथ है।

साहिब ने उसी समय एक ऐसी तान सुनाई कि सब जीवित हो उठ खड़े हुए। सब साहिब की जय–जयकार करने लगे। अब शेख तकी को बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। उसे अपने किये पर बहुत पछतावा भी हुआ। वो साहिब के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगने लगा। दया के सागर साहिब ने उसे इस भूल पर भी क्षमा कर दिया पर शेख तकी अन्दर से बहुत घबराया हुआ था।

क्रोध अग्नि से जलते हुए, धर्म गुरु पकड़ी तलवार।
नीरु नीमा और शिष्य अनेका, सबको दीया मार॥
आ नजदीक बोले साहिब, यही पीरों के काम।
क्या बिगाड़ा इन्होंने तेरा, गले पै चली तलवार॥

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