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बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

राजा विक्रमादित्य के कंधे पर लदे बेताल ने यह कथा सुनाकर पूछा—‘‘राजन ! अब तुम यह बतलाओ कि उस राजा और सेनापति में से, सेनापति बलधर क्यों अधिक दृढ़चरित्र नहीं था ? उसकी स्त्री तो अलौकिक सुन्दरी थी। उसने बहुत समय तक उसके साथ सुख भोगकर उसका स्वाद जाना था, फिर भी वह वैसी स्त्री को राजा को सौंपने को तत्पर हो गया ता और फिर, राजा की मृत्यु के बाद उसने स्वयं भी अपना शरीर अग्नि में होम करके अपने प्राण त्याग दिए थे। लेकिन, राजा ने उसकी उस पत्नी का त्याग किया था, जिसके भोग-रस का उसने आस्वादन भी नहीं किया था। भला ऐसा क्यों हुआ था ? इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी यदि तुम मौन रहोगे तो तुम्हें मेरा वही शाप लगेगा।’’

राजा हंसकर बोला—‘‘बेताल ! कहते तो तुम ठीक ही हो लेकिन इसमें अचरज की क्या बात है ? सेनापति कुलीन वंश का था, उसने स्वामी की भक्ति में जो किया, ठीक ही किया क्योंकि सेवक का तो कर्त्तव्य ही है कि वह प्राण देकर भी अपने स्वामी की रक्षा करे लेकिन राजा तो मदमत्त हाथी की तरह निरंकुश होते हैं। वे जब विषय-लोलुप होते हैं तब धर्म और मर्यादाओं की सभी श्रृंखलाएं तोड़ देते हैं। निरंकुश हृदय वाले राजाओं का विवेक अभिषेक के जल से उसी प्रकार बह जाता है, जैसे बाढ़ के पानी में सब कुछ बह जाता है। डुलते हुए चंवर की वायु जैसे रजकण, मच्छर और मक्खियों को दूर उड़ा देती है, वैसे ही वृद्धों के द्वारा उपदिष्ट शास्त्रों के अर्थ तक को दूर भगा देती है। उसका छत्र जैसे धूप को रोकता है, वैसे ही सत्य को भी ढक देता है। वैभव की आंधी मैं चौंधियाई हुई उसकी आंखें उचित मार्ग नहीं देख पातीं। नहुष आदि राजा जगतविजयी थे, फिर भी जब उनका चित्त काम-मोहित हो गया, तब उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था। यह राजा भी परम प्रतापी था, फिर भी वह लक्ष्मी समान चंचला और सुन्दरता में अप्सराओं को भी मात करने वाली उन्मादिनी के द्वारा विमोहित नहीं हुआ। उस धर्मात्मा और धीर राजा ने अपने प्राण त्याग दिए किंतु कुमार्ग पर पैर नहीं रखे। इसी से तो मैं उसे दृढ़चरित्र वाला मानता हूं। ’’

यह उत्तर सुनकर बेताल ने कहा—‘‘तुम्हारा उत्तर बिल्कुल ठीक है राजा विक्रमादित्य। किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके चरित्र से ही होती है। किंतु उत्तर देने के चक्कर में तुम अपना मौन रहने का संकल्प भूल गए। तुम भूले और मैं आजाद हो गया, इसलिए मैं चला अपने स्थान पर।’’ कहते हुए बेताल उसके कंधे से सरककर पुनः अपने स्थान को उड़ गया। राजा ने भी उसी प्रकार उसे फिर प्राप्त करने के लिए शीघ्रतापूर्वक उसका अनुसरण किया। महान पुरुष जब कोई कार्य आरंभ कर देते हैं, तब वह काम, चाहे जितना कठिन क्यों न हो, उसे पूर्ण किए बिना विश्राम नहीं करते।

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अट्ठारहवां बेताल: ब्राह्मणकुमार की कथा

अट्ठारहवां बेताल ब्राह्मणकुमार की कथा

उस भयानक रात में राजा विक्रमादित्य जब उस शिंशपा-वृक्ष के पास पहुंचा तो वहां का बदला दृश्य देखकर कुछ विस्मित-सा हो गया। श्मशान का समूचा क्षेत्र श्मशान की चिता की अग्नि और मांसभक्षी भूत-प्रेतों से भरा हुआ था, जिनकी जीभें आग की चंचल लपटों के समान जान पड़ती थीं।

वहां उसने बहुत से प्रेत-शरीरों को उल्टे लटका देखा, जो देखने में एक जैसे प्रतीत होते थे। यह देखकर भी राजा भयभीत न हुआ। वह मन-ही-मन सोचने लगा—‘अरे ! यह क्या बात है ? क्या वह मायावी बेताल इस प्रकार मेरा समय नष्ट कर रहा है ? समझ में नहीं आता इन बहुत-से शवों में से मैं किसको ले जाऊं ? यदि मेरा काम हुए बिना ही यह रात बीत गई तो फिर मरने के अतिरिक्त मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं बचेगा। तब मैं अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण दे दूंगा किंतु उपहास का पात्र कदापि नहीं बनूंगा।’

राजा जब ऐसा सोच रहा था, तब उसका यह निश्चय जानकर बेताल उसकी दृढ़ता से संतुष्ट हुआ और उसने अपनी माया समेट ली। तब राजा ने एक ही मनुष्य शरीर में बेताल को देखा। उसे वृक्ष से उतारकर राजा ने अपने कंधे पर डाला और वहां से प्रस्थान किया। चलते हुए राजा से वह बेताल फिर बोला—‘‘राजन, मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हो रहा है कि न तो तुम ऊबते ही हो और न अपनी जिद छोड़ते हो। उस योगी के लिए तुम निश्चय ही बहुत परिश्रम कर रहे हो। सुनो, तुम्हारे श्रम की थकान दूर करने के लिए मैं तुम्हें फिर एक कथा सुनाता हूं। ’’

तब बेताल ने यह कथा सुनाई।

आर्यावर्त्त में उज्जायिनी नाम की एक नगरी है। नागों की भूमि भोगवती और देवों की भूमि अमरावती के बाद श्रेष्ठता में तीसरा स्थान उसी का है। माता गौरी ने कठिन तपस्या के बाद जब शिव का वरण किया था, तब इस नगरी के असाधारण गुणों से आकृष्ट होकर भगवान शिव ने इसी नगरी को अपना निवास स्थान बनाया था। पुण्य की अधिकता से प्राप्त होने वाले अनेक प्रकार के सुख-भोगों से वह नगरी भरी हुई है।

उस नगरी में चंद्रप्रभ नाम का एक राजा राज करता था। उसका मंत्री एक ब्राह्मण था, जिसका नाम था—देवस्वामी। देवस्वामी बहुत धनवान था, उसने बहुत से यज्ञ भी किए थे।

समय पाकर उसे चंद्रस्वामी नाम का एक पुत्र पैदा हुआ। यद्यपि उसने विद्याओं का अध्ययन किया था, फिर भी जवानी में उसे जुआ खेलने का व्यसन पैदा हो गया।

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एक बार चंद्रस्वामी, जुआ खेलने के लिए किसी बड़े जुआखाने में गया। वहां एक से बढ़कर एक जुआरी पहले से ही मौजूद थे। चंद्रस्वामी उनके साथ जुआ खेलने लगा। दुर्भाग्य से वह अपना सारा धन हार गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि वह अपने वस्त्र तथा दूसरो से मांगा हुआ धन भी हार गया। मांगने पर जब वह उस रकम को नहीं चुका सका तो उस जुआखाने के मालिक ने उसे डंडे से खूब पीटा। डंडे की चोट से चंद्रस्वामी का सारा शरीर घायल हो गया। कई दिन तक वह उसी जगह मुर्दे के समान घायल पड़ा रहा। यह देखकर उस जुआखाने के मालिक ने अपने जुआरियों से कहा—"सुनो मित्रों! तीन दिन हो गए, यह तो आंखें ही नहीं खोल रहा, पत्थर के समान हो गया है। तुम इसे मार डालो और इसका शव किसी अंधे कुएं में फेंक आओ। तुम लोगों को इसके लिए मैं उचित मुआवजा दे दूंगा।"

उसके ऐसा कहने पर दूसरे जुआरी चंद्रस्वामी को वहां से उठाकर ले गए और कुएं की खोज में दूर एक वन में जा पहुंचे। वहां एक बूढ़े जुआरी ने दूसरों से कहा—"यह तो लगभग मर ही चुका है, फिर इसे कुएं में फेंकने से क्या लाभ ? बेहतर है हम इसे यहीं छोड़ दें और उस द्यूतशाला (जुआघर) के मालिक से जाकर यह कह दें कि हम उसे कुएं में डाल आए हैं।" सबने उसकी बात का समर्थन किया और वे चंद्रस्वामी को छोड़कर चले गए।

चंद्रस्वामी को होश आया तो उसने स्वयं को एक निर्जन वन में पाया। वहां एक शिवालय बना हुआ था। तब वह लड़खड़ाता-सा उठा और थके-थके कदमों से उस मंदिर में चला गया। अंदर पहुंचकर जब उसकी हालत थोड़ी और सुधरी तो वह दुखी होकर सोचने लगा—'कैसे दुख की बात कि मुझे उन जुआरियों ने धोखे से लूट लिया। मैं नंगा हूं, घायल हूं, धूल से मेरा शरीर भरा हुआ है। ऐसी हालत में मैं जाऊं भी तो कहां जाऊं ? मेरे पिता, मेरे संबंधी और मेरे हितैषी मित्र मुझे देखकर क्या कहेंगे ? इसलिए मैं अभी तो यहीं ठहरता हूं, रात को बाहर निकलकर देखूंगा कि भूख मिटाने के लिए खाने-पीने का क्या उपाय कर सकता हूं।' थका हुआ और वस्त्ररहित चंद्रस्वामी ऐसा सोच ही रहा था कि तभी सूर्यास्त हो गया।

इसी बीच एक महाव्रती तपस्वी वहां आया। उसके समूचे शरीर में विभूति (भभूत) लगी हुई थी और जटा और शूल धारण करने के कारण वह दूसरे शिव के समान जान पड़ता था। उस तपस्वी ने जब चंद्रस्वामी से उसका परिचय पूछा तो चंद्रस्वामी ने उसे वह सारा वृत्तांत कह सुनाया जिसके कारण उसकी यह दुर्दशा हुई थी। यह सुनकर तपस्वी ने चंद्रस्वामी से दयापूर्वक कहा—"तुम्हें घबराने की आवश्यकता नहीं है वत्स। तुम मेरे अतिथि हो, यह मेरा आश्रम है। उठो और पहले स्नान करो, तत्पश्चात् मैं जो कुछ भिक्षा में मांगकर लाया हूं, उसमें से कुछ हिस्सा तुम खा लो।"

उस व्रतधारी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने उससे कहा—"भगवन, मैं ब्राह्मण हूं। आपकी भीख में हिस्सा कैसे बांटकर खाऊंगा?"

112 ❑ बेताल पच्चीसी बेताल पच्चीसी—7

यह सुनकर अतिथि का आदर करने वाला वह सिद्ध व्रतधारी अपनी मटी (छोटी कुटिया) में घुस गया। वहां उसने इष्ट सिद्धि देने वाली अपनी विद्या का स्मरण किया। याद करते ही विद्या प्रकट हुई और जब उसने पूछा कि—‘‘मैं क्या करूं ?’’ तो उस तपस्वी ने आज्ञा दी कि—‘‘मेरे इस अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करो।’’

विद्या ने कहा—‘‘ऐसा ही होगा।’’ कहकर उसने एक स्वर्ण नगर उत्पन्न कर दिया, जिसमें बगीचा भी था और सुन्दर-सुन्दर स्त्रियां भी थीं।

उस नगर से निकलकर सुन्दरियां विस्मित चंद्रस्वामी के पास आई और बोली—‘‘भद्र उठो, स्नान-भोजन करो और अपनी थकावट दूर करो।’’

यह कहकर वे उसे अंदर ले गई। स्नान कराकर उन्होंने उसके शरीर पर अंगराग लगाया। उनके द्वारा दिए गए उत्तम वस्त्र पहनने के बाद वे उसे एक दूसरे सुन्दर भवन में ले गई।

उस भवन के अंदर उसने एक सर्वांग सुन्दर युवती को देखा, जो उन सबकी प्रधान जान पड़ती थी और जिसे मानो विधाता ने बड़ी कुशलता से अपने हाथो स्वयं गढ़ा था। उसने उत्कंठापूर्वक चंद्रस्वामी को अपने आसन के आधे हिस्से पर बैठाया। फिर उसके साथ ही उसने दिव्य भोजन किया। भोजन के उपरान्त चंद्रस्वामी ने स्वादिष्ट पके हुए फल और फिर ताम्बूल (पान) खाया। फिर उसके साथ नरम बिस्तर पर सोकर चरम सुख प्राप्त किया !

सवेरे जब चंद्रस्वामी जागा तो वहां केवल उसे शिवालय ही दिखाई दिया। वहां न तो वह दिव्य स्त्री थी, न नगर था और न वे दासियां ही थीं।

तभी मठी के भीतर से हंसता हुआ वह तपस्वी निकला। उसके यह पूछने पर कि—‘‘रात कैसी कटी ?’’ उदास चित्त वाले चंद्रस्वामी ने उससे कहा—‘‘भगवन, आपकी कृपा से रात तो मैंने बहुत सुखपूर्वक बिताई लेकिन अब उस दिव्य स्त्री के बिना, मेरे प्राण निकले जा रहे हैं।’’ यह सुनकर उस दयालु तपस्वी ने मुस्कराते हुए चंद्रस्वामी से कहा—‘‘तुम यहीं ठहरो वत्स। रात को तुम्हें फिर वही सुख प्राप्त होगा।’’ तपस्वी के कहने पर चंद्रस्वामी वहीं ठहरकर तपस्वी की विद्या के प्रताप से वह हर रात सुख भोगने लगा।

धीरे-धीरे इस विद्या का प्रभाव जानकर देव प्रेरणा से एक दिन चंद्रस्वामी ने उस तपस्वी को प्रसन्न करके कहा—‘‘भगवन ! मुझ शरणागत पर यदि सचमुच आपकी कृपा है तो मुझे यह विद्या सिखा दीजिए, जिसका ऐसा प्रभाव है।’’

चंद्रस्वामी द्वारा आग्रहपूर्वक ऐसा कहने पर तपस्वी उससे बोला—‘‘वत्स यह विद्या तुम्हारे लिए असाध्य है क्योंकि इसकी साधना जल के अंदर की जाती है। जो साधक वहां इसकी साधना करता है, उसको भरमाने के लिए कई मायाजाल उत्पन्न होते है जिसके कारण वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। वहां उसे ऐसा भ्रम होता है कि उसका फिर से जन्म हुआ है। तब वह अपने को बालक, फिर युवक, फिर विवाहित मानता है

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और उसे जान पड़ता है, जैसे उसके यहां पुत्र उत्पन्न हुआ हो। तब वह झूठे मोह में पड़ जाता है कि यह मेरा मित्र है और यह शत्रु। उसे न तो इस जन्म का स्मरण रहता है, न ही इसका कि उसकी क्रियाएं विद्या की साधना में लगी हुई हैं। जो लोग चौबीस वर्ष की आयु तक गुरु के द्वारा विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन वीर पुरुषों को इस जन्म का स्मरण रहता है और वे जानते हैं कि यह सब माया का खिलवाड़ है और विद्या की सिद्धि के बाद जल से निकलकर परम ज्ञान का दर्शन करते है। ''

तपस्वी ने आगे बताया—''जिस शिष्य को यह विद्या दी जाती है, उसे यदि यह सिद्धि नहीं मिलती तो अनुपयुक्त पात्र को शिक्षा देने के कारण उसके गुरु की भी विद्या नष्ट हो जाती है। मेरी सिद्धी से ही तुम्हें उसके सब फल प्राप्त हो रहे हैं। अतः इसके लिए तुम आग्रह क्यों कर रहे हो ? कहीं ऐसा न हो कि इससे मेरी सिद्धि भी नष्ट हो जाए और जिसके द्वारा तुम ये सुख-भोग प्राप्त कर रहे हो, तुम्हें उससे भी वंचित होना पड़े।'' तपस्वी के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने हठपूर्वक कहा—''हे महात्मन ! आप चिंता न करें, मैं सब कुछ सीख लूंगा।''

इसके बाद तपस्वी ने चंद्रस्वामी को विद्या सिखाना स्वीकार कर लिया। सज्जन पुरुष आश्रितों के अनुरोध पर भला क्या नहीं करते ? तब वह नदी-तट पर ले जाकर चंद्रस्वामी से बोला—''वत्स, इस विद्या (मंत्र) का जाप रते हुए जब तुम माया के दृश्य देखो, तो सावधान रहना और मेरे मंत्र से सावधान रहकर माया की अग्नि में प्रवेश करना। मैं तब तक तुम्हारे लिए नदी के इस तट पर रुका रहूंगा।'' यह कहकर उस व्रतधारी ने आचमन करके चंद्रस्वामी को विधिपूर्वक वह विद्या सिखाई।

अनन्तर, नदी के तट पर स्थित अपने गुरु को चंद्रस्वामी ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक नदी में उतर गया। जल के भीतर जाकर वह उस मंत्र का जाप करने लगा, तब माया के मिथ्या प्रभाव से मोहित होकर सहसा-ही वह अपने इस जन्म की सारी बातें भूल गया। उसने देखा कि वह स्वयं किसी दूसरी नगरी में किसी अन्य ब्राह्मण का पुत्र होकर उत्पन्न हुआ। अनन्तर, वह धीरे-धीरे किशोर हुआ। उसका यज्ञोपवीत हुआ, उसने विद्याएं पढ़ीं, विवाह किया और उसके सुख-दुख में पूरी तरह लिप्त रहकर सन्तान लाभ किया। वहां पुत्र स्नेह के कारण स्वीकार किए हुए अनेक प्रकार के कार्य करता और माता-पिता तथा कुटुंबियों की प्रीति से बंधा वह रहने लगा। इस प्रकार वह झूठे जन्मांतर का अनुभव कर रहा था, तभी समय जानकर उसके गुरु उस तपस्वी ने चेतना उत्पन्न करने वाली अपनी विद्या का प्रयोग किया।

उस विद्या के प्रयोग से शीघ्र ही उसने (मायाजाल को भेदकर) चेतना प्राप्त की। उसे अपने गुरु का स्मरण हो आया और उसने मायाजाल को भी पहचान लिया। दिव्य और असाध्य फल की प्राप्ति के लिए जब वह अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हुआ, तब वृद्ध और विश्वासी उसके गुरु एवं उसके कुटुंबीजन उसे ऐसा करने से

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यहाँ चित्र में दिए गए हिंदी पाठ का प्रतिलेखन (transcription) है:

रोकने लगे। उन लोगों के बहुत समझाने-बुझाने पर भी दिव्य सुख की लालसा से वह अपने कुटुंबियों सहित नदी के उस तट पर गया जहां चिता बनी हुई थी। वहां उसने अपने बूढ़े माता-पिता तथा पत्नी को मरने के लिए उद्यत देखा। अपने बच्चों को भी रोता देखकर वह मोह में पड़ गया। वह सोचने लगा—'मैं यदि अग्नि में प्रवेश करूंगा तो मेरे ये सभी संबंधी मर जाएंगे। मैं यह भी नहीं जानता कि गुरु की बात सच्ची भी है या नहीं। तब मै क्या करूं—अग्नि में प्रवेश करूं या नहीं ? किंतु अब तक तो सारी बातें गुरु के कहने के अनुसार ही हुई हैं, अतः यही बात झूठ कैसे होगी ? इसलिए मुझे चाहिए कि मैं प्रसन्नतापूर्वक अग्नि में प्रवेश करूं ?' मन-ही-मन ऐसा सोचते हुए उस ब्राह्मण चंद्रस्वामी ने अग्नि ने प्रवेश किया।

अग्नि का स्पर्श जब उसे बर्फ के समान ठंडा जान पड़ा, तब उसे आश्चर्य हुआ। तब तक माया का प्रभाव जाता रहा। नदी से निकलकर उसने अपने गुरु को देखा और उनके चरणों में प्रणाम किया, पूछने पर आरंभ से लेकर अग्नि की शीतलता तक की सारी बातें उन्हें बता दीं। तब उसके गुरु ने कहा—'वत्स, मुझे इस बात की शंका हो रही है कि कहीं तुमसे कुछ भूल हो गई है, नहीं तो अग्नि तुम्हारे लिए शीतल कैसे हो गई ?'

गुरु के ऐसा कहने पर चंद्रस्वामी ने पूछा—'भगवन, मैंने कहीं कोई भूल तो नहीं की ?'

तब इस रहस्य को जानने की इच्छा से उसके गुरु ने अपनी विद्या का स्मरण किया। वह विद्या न तो उसके सम्मुख ही प्रकट हुई और न उसके शिष्य के सम्मुख ही। तब वे दोनों ही अपनी विद्या को नष्ट हुआ जानकर दुखी होकर वहां से चले गए।

यह कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य को पहली कही शपथ का स्मरण कराकर उससे पूछा—'राजन, मेरा संशय दूर करो और बतलाओ कि बताई हुई सारी क्रियाएं करने के बाद भी उन दोनों की विद्या नष्ट क्यों हो गई ?'

बेताल की बात सुनकर उस वीर राजा ने उत्तर दिया—'योगेश्वर ! यह तो मैं जानता हूं कि इस प्रकार आप केवल समय ही व्यतीत कर रहे हैं, फिर भी मैं बताता हूं। जब तक मनुष्य का मन द्विविधा से रहित, धैर्ययुक्त, निर्मल और सुदृढ़ नहीं होता, तब तक केवल ठीक तरह से कोई दुष्कर कार्य करने से ही उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह मंदमति ब्राह्मण युवक चंद्रस्वामी काम करके भी द्विविधा में पड़ गया था, इसी से उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकी और अपात्र को देने के कारण गुरु की भी सिद्धि जाती रही।'

राजा के ऐसा कहने पर बेताल पुनः उसके कंधे से उतरकर अदृश्य रूप से अपनी जगह पर चला गया। तत्पश्चात् राजा भी उसी प्रकार उसके पीछे-पीछे गया।

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उन्नीसवां बेताल: चंद्रस्वामी की कथा

उन्नीसवां बेताल

चंद्रस्वामी की कथा

राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष से फिर बेताल को उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। चलते हुए बेताल ने पुनः कहा—‘‘राजन ! सुनो, मैं तुम्हें इस बार यह मनोहर कथा सुनाता हूं।’’

बहुत पहले वक्रोलस नाम का एक नगर था। जहां इन्द्र के समान एक राजा राज्य करता था। उसका नाम था—सूर्यप्रभ। राजा सूर्यप्रभ हर प्रकार से सुखी था किंतु उसे एक ही दुख था कि बहुत-सी रानियों के होते हुए भी उसे कोई संतान नहीं हुई थी। उस समय ताम्रलिप्ति नाम की एक महानगरी में धनपाल नाम का एक महाजन (सेठ) रहता था, जो उस क्षेत्र के सभी धनवानों में अग्रणी था। उसकी इकलौती पुत्री का नाम धनवती था। वह इतनी सुन्दर थी कि उसे देखकर किसी अप्सरा का भ्रम होता था। जब वह कन्या युवती हुई, तब महाजन की मृत्यु हो गई। राजा का सहारा पाकर महाजन के संबंधियों ने उसका सारा धन हड़प लिया। महाजन की पत्नी हिरण्यवती किसी प्रकार अपने रत्न एवं आभूषणों को छिपाकर अपनी पुत्री सहित, अपने संबंधियों के डर से वहां से भाग निकली। उसके हृदय में दुख का अंधेरा घिरा हुआ था। अपनी पुत्री का हाथ थामे वह बड़ी कठिनाई से नगर से बाहर निकली।

संयोगवश, अंधकार में जाती हुई हिरण्यवती ने दिख न पाने के कारण सूली पर चढ़ाए गए एक चोर को अपने कंधे से धक्का दे दिया। वह चोर जीवित था। उसके कंधे के धक्के से वह तिलमिला उठा और कराहकर कह उठा—‘‘हाय ! मेरे कटे हुए जख्मों पर कौन नमक छिड़क रहा है ?’’ इस पर उस महाजन की स्त्री ने क्षमायाचना करते हुए उस चोर से पूछा—‘‘श्रीमंत, आप कौन हैं ?’’

तब उस चोर ने उत्तर दिया—‘‘मैं एक कुख्यात चोर हूं। चोरी करने एक कारण मुझे सूली पर चढ़ाए जाने का दंड मिला है। लेकिन आर्या, आप बतलाएं कि आप कौन हैं और इस अंधकार में भटकती हुई कहां जा रही हैं ?’’

चोर के पूछने पर महाजन की पत्नी उसे अपना परिचय देने लगी, तभी चंद्रमा निकल आया और उसके प्रकाश में सारा क्षेत्र आलोकित हो गया। तब चोर ने देख लिया कि उस स्त्री के साथ चंद्रमा के मुख के समान एक कन्या भी वहां मौजूद थी। यह देखकर उसने उसकी माता से प्रार्थना की—‘‘आर्ये, तुम मेरी एक प्रार्थना सुनो। मैं तुम्हें एक हजार स्वर्णमुद्राएं दूंगा। तुम अपनी कन्या मुझे दे दो।’’ यह सुनकर धनवती की माता हंसी और चोर से पूछा—‘‘तुम तो मरने वाले हो। सूली पर टंगे


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हुए तुम्हें मरने में विलम्ब नहीं होगा। फिर क्यों मेरी कन्या का हाथ मांगना चाहते हो?''

इस पर उस चोर ने कहा—''यह सत्य है कि मेरी आयु समाप्त हो गई है, पर मैं पुत्रहीन हूं। शास्त्रों में लिखा है कि पुत्रहीन व्यक्ति की सद्गति नहीं होती। अतः यह यदि मेरी आज्ञा से किसी और के द्वारा पुत्र पैदा करेगी तो वह मेरा क्षेत्रज पुत्र होगा। इसी से मैं तुमसे यह निवेदन करता हूं कि मेरा मनोरथ पूरा करो।''

चोर की बात सुनकर महाजन की पत्नी के मन में लोभ पैदा हो गया। उसने चोर की बात स्वीकार कर ली।

तब वह महाजन की पत्नी कहीं से जल ले आई और यह कहकर उसने उस जल को चोर के हाथों पर डाल दिया कि—'मैं अपनी यह कुंवारी कन्या तुम्हें देती हूं।'

तब उस चोर ने उस कन्या को अपना क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न करने का आदेश दिया और अपनी सास से बोला—''सामने उस बरगद के विशाल वृक्ष को देखो। उस वृक्ष की जड़ के समीप जमीन खोदो तो वहां जमीन में दबी तुम्हें कुछ स्वर्णमुद्राएं मिलेंगी। वह स्वर्णमुद्राएं निकाल लो और मेरी मृत्यु के बाद विधिपूर्वक मेरा दाह-संस्कार करा देना। तत्पश्चात् मेरी अस्थियों का किसी तीर्थस्थान में विसर्जन करने के पश्चात् अपनी कन्या सहित वक्रोलस नगर में चली आना। वहां राजा सूर्यप्रभ के शासन में वहां के लोग सुखपूर्वक रहते हैं। मुझे आशा है तुम्हें वहां रहने के लिए किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आएगी।'' यह कहकर उस प्यासे चोर ने हिरण्यवती द्वारा लाया हुआ जल पीया और सूली पर चढ़ाए जाने की पीड़ा के कारण अपने प्राण त्याग दिए।

हिरण्यवती ने चोर के निर्देशानुसार बरगद के वृक्ष के पास जाकर स्वर्णमुद्राएं निकालीं और किसी गुप्त मार्ग से अपने पति के किसी मित्र के यहां चली गई। वहां रहकर उसने युक्तिपूर्वक उस चोर की दाह-क्रिया करवाई और उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित कराने आदि की भी व्यवस्था कर दी।

अगले दिन वह उस छिपे धन को लेकर अपनी कन्या के साथ वहां से निकल पड़ी और चलती-चलती क्रमशः वक्रोलस नगर में पहुंच गई। वहां उसने वसुदत्त नाम के किसी श्रेष्ठ वणिक से एक मकान खरीद लिया और पुत्री सहित उस मकान में रहने लगी। उन्हीं दिनों उस नगर में विष्णुस्वामी नाम के एक अध्यापक रहते थे। मनःस्वामी नाम का उनका एक ब्राह्मण-शिष्य बहुत रूपवान था।

यद्यपि वह ब्राह्मण-शिष्य उत्तम कुल का था तथापि यौवन के वशीभूत होकर हंसाबलि नाम की एक विलासिनी के प्रेम में फंस गया था। हंसाबलि शुल्क के रूप में पांच-सौ स्वर्णमुद्राएं मांगती थी और इतना धन उसके पास नहीं था इसलिए वह उसे पाने को दिन-रात बेचैन रहता था।

एक दिन उस महाजन की कन्या धनवती ने अपने मकान की छत पर से उस

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सुन्दर युवक को देखा। धनवती उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गई। उसे अपने चोर पति की आज्ञा का स्मरण हो आया। तब उसने अपनी माता को बुलाया और उससे कहा—‘‘मा, नीचे खडे उस ब्राह्मण युवक के रूप और यौवन को तो देखो। उसके नेत्र कितने सुन्दर हैं। इस वेश मे तो वह साक्षात् कामदेव जैसा दिखाई दे रहा है।’’ यह सुनकर उसकी माता हिरण्यवती समझ गई कि धनवती को यह युवक पसंद आ गया है। तब उसने मन में सोचा—‘पति की आज्ञा से पुत्र-प्राप्ति के लिए मेरी पुत्री को किसी पुरुष का वरण तो करना ही है, फिर क्यों न इसी युवक से अनुरोध किया जाए ?’ यह सोचकर उसने इच्छित संदेश के साथ भेद जानने वाली एक दासी को भेजा कि वह उस ब्राह्मण युवक को यहां ले आए।

उस दासी ने जाकर उस ब्राह्मण युवक को एकांत में बुलाया और सारी बातें कहीं। उन्हें सुनकर वह व्यसनी ब्राह्मण युवक बोला—‘‘यदि मुझे हंसावली के लिए पाच सौ सोने की मोहरें दे, तो मैं एक रात के लिए वहां जा सकता हूं।’’ उसके ऐसा कहने पर दासी ने यह बात महाजन की स्त्री से कही। महाजन की स्त्री ने उसी के हाथ उतना धन भेज दिया। वह धन लेकर मनःस्वामी उस दासी के साथ महाजन की कन्या उस धनवती के महल में गया, जो एक रात्रि के लिए उसे अर्पित कर दी गई थी।

वहां मनःस्वामी ने अत्यंत उत्कंठित उस कन्या को देखा, जिसने धरती को विभूषित कर रखा था। चकोर जिस प्रकार चांद को देखता है, वैसे ही वह धनवती को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने धनवती के साथ समागम करते हुए वह रात बिताई। सवेरा होने पर जिस प्रकार से वह वहां आया ता, उसी प्रकार वहां से निकलकर चला गया। समय पाकर धनवती गर्भवती हुई और उसने मनःस्वामी के अंश-रूप एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। बालक के लक्षण उसके उज्ज्वल भविष्य की सूचना दे रहे थे। पुत्र के रूप में उस बालक को पाकर धनवती बहुता संतुष्ट हुई। रात में भगवान शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन देकर आदेश दिया कि—‘‘सहस्त्र स्वर्णमुद्राओं के साथ, पालने में लेटे हुए इस बालक को सवेरे राजा सूर्यप्रभ के दरवाजे पर छोड़ आओ। इससे इसका और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा।’’ शिव-नी के ऐसा कहने पर वह वणिकपुत्री और उसकी माता जागकर आपस में विचार-विमर्श करने लगी और भगवान की बातों पर विश्वास पर वे राजा सूर्यप्रभ के सिंहद्वार पर उस बालक को स्वर्णमुद्राओं सहित छोड़ आई। उधर भगवान शिव ने पुत्र की चिंता में सदा दुखी रहने वाले राजा सूर्यप्रभ को भी स्वप्न में आदेश दिया—‘‘राजन ! उठो, तुम्हारे सिंहद्वार पर किसी ने पालने में लेटे हुए एक सुंदर बालक को रख दिया है। उसे स्वीकार करो और उसका पुत्रवत् पालन करो।’’

राजा की नींद खुली और उसने सिंहद्वार पर जाकर देखा तो उसे भगवान शिव के कथन की सत्यता का पता चला। बालक के साथ धनराशि भी रखी हुई थी और

120 ▢ बेताल पच्चीसी

उसके हाथ-पैरों में छत्र, ध्वज आदि के चिन्हों की रेखाएं थीं। वह बालक बहुत ही सुंदर आकृति वाला था।

“भगवान शिव ने मेरे योग्य पुत्र ही मुझे दिया है।” ऐसा कहते हुए राजा ने उस बालक को अपने हाथों में उठा लिया और महल में चला गया। तब राजा ने पुत्र प्राप्ति के उपलक्ष्य में इतना धन गरीबों में लुटाया कि नगर में कोई दरिद्र ही न रहा। नृत्य-वाद्य आदि के साथ राजा ने विधिपूर्वक बालक को अपनाया और उसका नाम रखा—चंद्रप्रभ। राजमहल में हर प्रकार के सुखों के साथ धीरे-धीरे राजकुमार बड़ा होने लगा। जब वह युवक हुआ तो राज ने उसे राज्यभार सौंप दिया और वह तीर्थाटन के लिए वाराणसी चला गया।

नीति जानने वाला उसका पुत्र जब अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन चला रहा था, तभी सूचना मिली कि वाराणसी में उसके पिता का देहान्त हो गया है। पिता की मृत्यु का संवाद पाकर राजा चंद्रप्रभ ने उसके लिए शोक किया तथा उसके लिए श्राद्ध आदि किए। फिर वह धर्मात्मा अपने मंत्रियों से बोला—'पिताजी से भला मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूं। फिर भी मैं अपने हाथों उनका एक ऋण चुकाऊंगा। मैं उनकी अस्थियां ले जाकर विधिपूर्वक गंगा में प्रवाहित करूंगा तथा गया जाकर सभी पित्तरों को पिंडदान दूंगा। मैं इसी प्रसंग में पूर्व समुद्र तक की तीर्थयात्रा भी करूंगा।”

राजा के ऐसा कहने पर उसके मंत्री उससे बोले—'देव ! आपको किसी प्रकार ऐसा नहीं करना चाहिए। आप यदि राज्य को इस प्रकार अरक्षित छोड़कर चले गए तो पीछे से शत्रुओं को राज्य पर आक्रमण करते देर न लगेगी। अतः आप पिता के संबंध में यह कार्य किसी और के हाथों करा लें। एक राजा के लिए प्रजापालन के अतिरिक्त और कोई बड़ा धर्म नहीं है।”

अपने मंत्रियों की बात सुनकर राजा चंद्रप्रभ ने कहा—"हम जो कुछ निश्चय कर चुके हैं, वह अटल है। पिता के लिए मुझे तीर्थयात्रा अवश्य करनी है। इस क्षणभंगुर शरीर का क्या विश्वास ? पता नहीं कब पूज्य पिताजी की तरह मेरा साथ छोड़ दे। अतः मेरा आदेश है कि जब तक मैं इस तीर्थयात्रा से वापस न लौट आऊं, मेरे स्थान पर तुम लोग मेरे राज्य की रक्षा करोगे।”

राजा की यह आज्ञा सुनकर मंत्रिगण चुप ही रहे। तब वह राजा अपनी यात्रा की तैयारियां करने लगा। एक शुभ दिन स्नानादि करके उसने अग्निहोत्र की विधि सम्पन्न की और ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर शांत वेश धारण करके जुते हुए रथ में बैठकर उसने नगर से प्रस्थान किया।

जो सामंत, राजपुत्र, नगरवासी तथा ग्रामीण, राजा को छोड़ने सीमान्त तक आए थे, उनकी इच्छा न होने पर भी राजा चंद्रप्रभ ने बड़ी कठिनता से उन्हें समझा-बुझाकर वापस लौटा दिया और मंत्रियों को राज्य-शासन का भार सौंपकर, वाहनों पर आरूढ़ ब्राह्मणों तथा पुरोहितों के साथ वे आगे बढ़े।

बेताल पच्चीसी ▢ 121

विचित्र प्रकार के वेशों और भाषाओं को देख-सुनकर प्रसन्न होते तथा अनेक प्रकार के देशों को देखते हुए वे सब क्रमशः गंगातट पर जा पहुंचे। राजा ने उस गंगा नदी के देखा, जिसमें जल-कल्लोल से बनने वाली लहरियां, प्राणियों के स्वर्गारोहण के लिए बनाई जा रही सीढ़ियों के समान जा पड़ती थीं। राजा ने रथ से उतरकर विधिपूर्वक पतित-पावनी गंगा में स्नान किया और राजा सूर्यप्रभ की अस्थियां उसमें प्रवाहित कीं।

दान देकर और श्राद्धादि सम्पन्न करके वह फिर रथ पर सवार होकर चल पड़ा और क्रमशः ऋषियों से वंदित प्रयाग में जा पहुंचा। राजा ने वहां उपवास रखकर स्नान, दान, श्राद्ध आदि सभी उत्तम क्रियाएं सम्पन्न कीं और उसके बाद वाराणसी गया। वाराणसी में तीन दिन रुककर विधिपूर्वक सभी धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करके राजा ‘गयाशिर’ नामक स्थान पर पहुंचा। वहां राजा ने पर्याप्त दक्षिणा के साथ विधिपूर्वक श्राद्ध किया और फिर धर्मारण्य चला गया। ‘गया कूप’ में जब वह पिंड देने लगा तो उस पिंड को लेने के लिए उस कुएं के भीतर से मनुष्य के तीन हाथ ऊपर निकले। यह देखकर राजा घबरा गया कि यह क्या बात है ? उसने अपने ब्राह्मणों से पूछा—‘‘इनमें से किस हाथ में मैं पिंड दूं ?’’

तब उन ब्राह्मणों ने राजा से कहा—‘‘राजन, इनमें से एक हाथ तो निश्चित ही किसी चोर का है क्योंकि लोहे की हथकड़ी पड़ी रहने का निशान उसकी कलाई में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। दूसरा हाथ किसी ब्राह्मण का है क्योंकि उसमें ‘पवित्री’ पड़ी हुई है। तीसरा उत्तम हाथ लक्षणों वाले किसी राजा का है क्योंकि उसकी उंगलियों में बहुमूल्य रत्नों से जड़ी कई अंगूठियां पड़ी हैं। अतः हम लोग यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि आपको पिंडदान इन तीनों हाथों में से किस हाथ में दिलाएं।’’

ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर राजा अनिश्चय में घिर गया और कोई फैसला न कर सका।

राजा विक्रमादित्य के कंधे पर बैठा बेताल इतनी कथा सुनाकर राजा से बोला—‘‘राजन, वे ब्राह्मण और राजा चंद्रप्रभ पिंडदान देने के विषय में कोई निर्णय न ले सके किंतु तुम अवश्य जानते होंगे कि पिंड लेने का अधिकारी कौन था ? जानते हुए भी यदि तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हें पहले वाला ही शाप लगेगा।’’

धर्मज्ञ राजा विक्रमादित्य ने बेताल की यह बात सुनी। तब उसने मौन त्यागकर बेताल को यह उत्तर दिया—‘‘हे योगेश्वर ! राजा चंद्रप्रभ को उस चोर के हाथ में ही पिंड देना चाहिए क्योंकि वह उसी का क्षेत्रज पुत्र था, शेष दोनों का नहीं। उसे जन्म देने वाले ब्राह्मण को उसका पिता नहीं माना जा सकता क्योंकि उसने तो धन लेकर एक रात के लिए स्वयं को बेच दिया था। राजा सूर्यप्रभ ने यद्यपि उसके जातकर्म संस्कार आदि कराए थे और उसका पालन-पोषण भी किया था, फिर भी वह उसका

122 ▢ बेताल पच्चीसी

पुत्र नहीं माना जा सकता। कारण, जब राजा ने उस बालक को पाया था, तब बच्चे के सिर के पास पालने में जो स्वर्णमुद्राएं रखी हुई उसे मिली थीं, वह उस बालक का अपना ही धन था, जो उसके पालन-पोषण का मूल्य था। अतः उसकी माता जल से संकल्प करके जिसको दी गई थी और जिसने उसे पुत्र उत्पन्न करके ही आज्ञा दी थी तथा अपना सारा धन उसे सौंप दिया था, राजा चंद्रप्रभ उस चोर का ही क्षेत्रज पुत्र था। मेरे विचार से चंद्रप्रभ का उसी के हाथ में पिंड देना उचित था।”

राजा के इस सटीक उत्तर से बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की भांति उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया, जहां से राजा विक्रम उसे लाया था। राजा विक्रमादित्य भी पहले की भांति उसे वापस लाने के लिए उसी स्थान की ओर चल पड़ा।

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बीसवां बेताल: राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा

बीसवां बेताल

राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा

राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष के नीचे जाकर पुनः बेताल को अपने कंधे पर उठाया और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

मार्ग में बेताल ने पुनः राजा से कहा—‘‘राजन ! यह तुम्हारा कैसा दृढ़ निश्चय है ? जाकर राज-पाठ का सुख भोगो। तुम मुझे जो उस दुष्ट भिक्षु के पास ले जा रहे हो, यह उचित नहीं है। किंतु यदि तुम्हारा ऐसा ही आग्रह है तो मेरी यह कथा सुन लो।’’

आर्यावर्त्त में अपने नाम को सार्थक करने वाला चित्रकूट नाम का एक नगर है। वहां के लोग वर्ण-व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन नहीं करते, अर्थात् सभी वर्णों के लोग अपनी मर्यादा के भीतर रहते हुए ही अपने-अपने कार्य करते हैं।

उस नगर में चंद्रावलोक नाम का एक राजा राज्य करता था। वह राजा बहुत धीर-वीर, गंभीर एवं एक महान योद्धा था। उसकी शूरवीरता की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। लेकिन जैसा कि कहा गया है, हर व्यक्ति को अपनी समस्त इच्छित वस्तुएं कभी नहीं मिल पातीं। इसी प्रकार समस्त संपत्तियों के होते हुए भी वह राजा चंद्रावलोक इस बात से बहुत दुखी रहता था कि उसे अपनी पसंद के अनुसार पली नहीं मिली थी।

एक दिन वह अपने मन का उद्वेग मिटाने के लिए घोड़े पर सवार होकर अपने अनुचरों के साथ वन में शिकार खेलने गया। वहां उसने कई दुर्दात हिंसक पशुओं का शिकार किया। एक सिंह का शिकार करने की इच्छा से वह अकेला ही उस विकट वन में घुस गया। वहां उसने एक हृष्ट-पुष्ट एवं कद्दावर सिंह को देखा तो लगा जैसे उसका लक्ष्य उसे मिल गया हो। उसने सिंह की ओर कई अचूक तीर छोड़े। उनमें से एक तीर सिंह को जा लगा और वह घबराकर घने जंगल की ओर भाग चला गया। राजा ने भी अपने घोड़े की एड़ लगाई ताकि वह जल्दी से उस सिंह के पास पहुंचकर उसका वध कर सके। किंतु एड़ कुछ ज्यादा ही लग गई। उसका घोड़ा राजा के पांव की एड़ एवं चाबुक की फटकार सुनकर बेहद उत्तेजित हो उठा। सम और विषम भूमि का ध्यान छोड़कर वह वायु-वेग जैसी तीव्रता से दौड़ता हुआ राजा को वहां से दस योजन दूर एक दूसरे प्रदेश में ले आया। वहां पहुंचकर जब घोड़ा रुका, तब राजा को दिशा-भ्रम हो गया। वह किसी प्रकार घोड़े से उतरा और सही दिशा पाने के लिए इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसकी निगाह अपने से कुछ आगे एक विशाल सरोवर पर पड़ी। उस सरोवर में कमल खिले हुए थे और भांति-भांति के जलचर उसमें तैरते दिखाई दे रहे थे।

सरोवर के किनारे पहुंचकर राजा ने अपने घोड़े की जीन खोल दी। पहले उसने

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घोड़े को पानी पिलाया और खुला छोड़ दिया ताकि वहा उगी हरी-भरी दूब खाकर वह अपना पेट भर सके। फिर स्वयं स्नान करके जल पिया। थकावट दूर होने पर वह उस रमणीक स्थान में इधर-उधर नजर डालने लगा।

तभी उसकी निगाह एक अशोक-वृक्ष के नीचे अपनी सखी के साथ बैठी एक मुनि-कन्या पर पड़ी। वह फूलों के गहने एवं वल्कल वस्त्र पहने हुए थी। प्राकृतिक श्रृंगार करने से वह बहुत मनोरम प्रतीत हो रही थी। राजा उसके रूप को देखकर मोहित हो गया। उसने मन में सोचा—'अरे कौन है यह ? क्या यह कोई दूसरी सावित्री है जो सरोवर में स्नान करने आई हुई है या शिव की गोद में छूटी पार्वती है जो फिर भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या करने आई है ? अथवा यह दिन में अस्त हुए चंद्रमा की कान्ति है, जिसने व्रत धारण कर रखा है। तो मैं धीरे-धीरे इसके पास जाकर वरदान प्राप्त करूं।'

ऐसा सोचकर वह राजा उस कन्या के पास पहुंचा। उस कन्या ने भी जब राजा को अपने निकट आते देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई। फूलों की माला गूंथते उसके हाथ सहसा ही रुक गए। वह सोचने लगी—'ऐसे विकट वन में आने वाला यह पुरुष कौन है ? कोई विद्याधर है या कोई सिद्ध ? इसका रूप तो मेरी आंखों को चकाचौंध किए दे रहा है।'

मन-ही-मन ऐसा सोचकर लज्जा के कारण तिरछी नजरों से देखती हुई, वह उठ खड़ी हुई। यद्यपि उसके पांव जकड़-से गए थे तथापि वह जाने को उद्यत हुई। तब चतुर और विनम्र राजा उसके पास पहुंचा और बोला—"सुन्दरी ! जो व्यक्ति दूर से आया है, जिसे तुमने पहली बार देखा है और जो तुम्हारा दर्शन मात्र चाहता है, उसके स्वागत-सत्कार का तुम आश्रम वासियों का यह कैसा ढंग है कि तुम उससे दूर भागी जा रही हो ?"

राजा के ऐसा कहने पर उस कन्या की सखी ने, जो राजा के समान ही चतुर थी, राजा को वहां बिठाया और उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उत्सुक राजा ने विनम्र स्वर में पूछा—"भद्रे ! तुम्हारी इस सखी ने किस पुण्यवान वंश को अलंकृत किया है ? इसके नाम के वे कौन से अक्षर हैं, जो कानों में अमृत उड़ेलते हैं ? और इस निर्जन वन में, पुष्प के समान कोमल अपने शरीर को तपस्वियों जैसी चर्या से क्यों कष्ट दे रही हैं ?"

राजा की यह बातें सुनकर उसकी सखी ने उत्तर दिया—"श्रीमंत ! यह महर्षि कण्व की पुत्री इंदीवर प्रभा है। यह आश्रम में ही पाली-पोसी गई है। इसकी माता स्वर्ग की अप्सरा मेनका है। पिता की आज्ञा से यह इस सरोवर पर स्नान करने के लिए आई है। इसके पिता का आश्रम यहां से अधिक दूर नहीं है।"

राजा यह बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और घोड़े पर सवार होकर उस कन्या का हाथ मांगने के लिए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचा।

वहा पहुंचकर राजा ने मुनि के चरणों की वंदना की। मुनि ने भी उसका

बेताल पच्चीसी ❐ 125

यथोचित स्वागत-सत्कार किया। उसे विश्राम करने के लिए उचित स्थान दिया।

जब राजा विश्राम कर चुका तो मुनि ने उससे कहा—"वत्स चंद्रावलोक ! तुम मेरी एक बात ध्यानपूर्वक सुनो। इस संसार में प्राणियों को मृत्यु से जैसा भय है, उसे तुम भली-भांति जानते हो, फिर भी तुम अकारण ही इन बेचारे मृगों की हत्या क्यों करते हो ? विधाता ने क्षत्रियों का निर्माण तो दुष्टजनों से सज्जनों की रक्षा हेतु ही किया है अतः तुम धर्मपूर्वक राजसुख का भोग करो। हे राजन ! तुम स्वयं ही सोचो कि निर्बल निरीह पशुओं का वध करने से आखिर लाभ ही क्या है ? हे राजा चंद्रावलोक ! क्या तुमने राजा पांडु का वृत्तांत नहीं सुना जिन्हें इसी शौक के कारण शापवश अपने प्राण त्यागने पड़े थे। इसीलिए मैं तुम्हें समझ रहा हूं कि मृगया (आखेट) के बहाने पर निरीह पशुओं का शिकार करना तुरंत बंद कर दो।"

मुनि के बार-बारे ऐसा समझाने का राजा के मन पर भारी प्रभाव पड़ा। उसने मुनि से कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! आज से पहले किसी ने मुझे इस प्रकार समझाने की चेष्टा नहीं की थी इसीलिए अज्ञानवश मैं ऐसा करता रहा। किंतु मैं वचन देता हूं कि आज के बाद फिर कभी मृगया करने का विचार मन में नहीं लाऊंगा। आज के बाद मेरी ओर से सभी वन-प्राणी अभय हैं।"

यह सुनकर मुनि ने कहा—"राजन ! तुमने वन-प्राणियों को अभयदान दिया, इससे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूं। अतः तुम मुझसे कोई इच्छित वर मांगो।"

मुनि के ऐसा कहने पर समय को जानने वाले राजा चंद्रावलोक ने कहा—"हे मुनिवर ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप अपनी कन्या इंदीवर प्रभा को मुझे दे दें।"

राजा के इस प्रकार याचना करने पर मुनि ने अपनी वह कन्या राजा को दे दी, जिसका जन्म एक अप्सरा की कोख से हुआ था और जो सिर्फ राजा के ही योग्य थी।

अनन्तर, उसके साथ विवाह करके राजा वहां से चलने को तैयार हुआ। आश्रम के समस्त मुनिकुमार आंखों में अश्रु लिए उन्हें आश्रम की सीमा तक पहुंचा आए।

जब राजा ने मुनि कण्व और उनके शिष्यों से विदा ली, तब सूर्यास्त होने को ही था। मार्ग में चलते हुए उन्हें रात्रि हो गई लेकिन राजा फिर भी चलता ही रहा।

एक स्थान पर रुककर राजा ने मार्ग में एक पीपल का वृक्ष देखा। तब राजा ने सोचा कि रात्रि में वही विश्राम करना चाहिए। यही सोचकर वह वहीं घोड़े से उतर पड़ा। उस रात वह राजा वहां उस मुनिकन्या के साथ पुष्प शय्या पर सोया।

सुबह जब वह अपने नगर की ओर चलने को हुआ तो अचानक एक ब्रह्मराक्षस से उसका सामना हो गया। उस राक्षस का विकराल शरीर देखकर राजा की पत्नी, वह मुनिकन्या सिहर उठी। वह राक्षस काजल के समान काला था और कालमेघ के समान प्रतीत होता था। उसने अंतड़ियों की माला पहन रखी थी। उस समय वह किसी मनुष्य

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का मांस खा रहा था और उसकी खोपड़ी का रक्त पी रहा था। क्रोध के कारण उसके मुख से अग्नि-सी निकल रही थी। उसकी दाढ़ें बड़ी भयानक थीं।

प्रचंड अट्टहास करके, राजा का तिरस्कार करते हुए वह बोला—“अरे नीच, मैं ज्वालामुखी नाम का राक्षस हूं। पीपल का वह वृक्ष मेरा निवास-स्थान है। देवता भी इसकी अवमानना नहीं कर सकते। मैं रात को जब घूमने-फिरने गया, तभी तूने यहां रात बिताई। अब तू इस अविनय का फल भोग। अरे दुराचारी, वासना से तेरी सुध-बुध जाती रही है। मैं तेरा हृदय निकालकर खाऊंगा और तेरा रुधिर पी जाऊंगा।”

राजा ने ब्रह्मराक्षस की बातें सुनीं। ब्रह्मराक्षस बड़ा भयानक था। राजा ने महसूस किया कि उसे मार डालना किसी भी प्रकार संभव नहीं है, अतः उसने विनयपूर्वक कहा—“अनजाने में मुझसे जो अपराध हुआ है, आप उसे क्षमा कर दें। मैं आपके आश्रय में आया हुआ अतिथि हूं, आपकी शरण में हूं। मैं आपको मनचाहा आखेट ला दूंगा जिससे आपकी तृप्ति हो जाएगी। अतः क्रोध त्यागकर आप प्रसन्न हों।”

राजा की बातें सुनकर राक्षस कुछ शांत हुआ और उससे बोला—“अगर तुम सात दिनों के अंदर मुझे किसी ऐसे ब्राह्मण-पुत्र की भेंट लाकर दो जो सात वर्ष का होने पर भी बड़ा वीर हो, विवेकी हो और अपनी इच्छा से तुम्हारे लिए अपने को दे सके और जब वह मारा जाए तो भूमि पर डालकर उसकी माता उसके हाथ और पिता उसके पांव मजबूती से पकड़े रहें तथा तलवार के प्रहार से तुम्हीं उसे मारो तो मैं तुम्हारे इस अपराध को क्षमा कर दूंगा, नहीं तो राजन मैं शीघ्र ही तुम्हें और तुम्हारे लश्कर को मार डालूंगा।”

प्राण जाने के भय से राजा ने तुरंत उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तब वह ब्रह्मराक्षस तत्काल वहां से अन्तर्ध्यान हो गया।

राजा अपनी पत्नी को लिए घोड़े पर सवार होकर आगे चल दिया लेकिन उसका मन बहुत उदास था। वह सोचने लगा—“मैं भी कैसा पागल हूं जो उस ब्रह्मराक्षस की शर्त मान ली। भला वैसा उपहार मुझे मिलेगा भी कहां? मैंने प्राण जाने के भय से व्यर्थ ही उस राक्षस की शर्त स्वीकार की। इससे तो बेहतर था कि वह मुझे ही अपना आहार बना लेता। अब मैं अपने नगर को चलूं और देखूं कि होनहार क्या है?’

राजा ऐसा ही कुछ सोचता जा रहा था कि उसकी सेना उसे खोजती हुई वहां पहुंच गई। तब वह अपनी सेना व अपनी पत्नी के साथ अपने नगर चित्रकूट में आया। राजा को उसके अनुकूल पत्नी मिली है, यह जानकर राजधानी में उत्सव मनाया गया लेकिन मन का दुख मन में ही दबाए हुए राजा ने बाकी दिन बिता दिया।

अगले दिन एकान्त में उसने अपने मंत्रियों से सारा वृत्तांत कह सुनाया।

सुनकर उनमें से सुमति नामक एक मंत्री ने कहा—“राजन, आप चिंता न करें,

बेताल पच्चीसी ❐ 127

128 ◻ बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी—8

मै वैसा ही उपहार खोजकर ला दूंगा क्योकि यह धरती अनेक आश्चर्यो से भरी पड़ी है। "

राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर उस मंत्री ने शीघ्र ही सात वर्ष की उम्र वाले एक बालक की मूर्ति बनवाई। उसने मूर्ति को रत्न से सजाकर एक पालकी में बिठा दिया। फिर वह पालकी इस घोषणा के साथ अनेक नगरो, गांवों में जहां-तहां घुमाई गई—'सात वर्ष का एक ब्राह्मण पुत्र, जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए अपनी इच्छा से अपना शरीर एक ब्रह्मराक्षस को सौपेगा और इस कार्य में वह न केवल अपने माता-पिता की अनुमति ही ले लेगा, बल्कि जब वह मारा जाएगाः तब स्वयं उसके माता-पिता उसके हाथ-पैर पकड़े रहेंगे। अपने माता-पिता की भलाई चाहने वाले ऐसे बालक को राजा सौ गांवों के साथ यह सोने और रत्नों से जड़ी मूर्ति भी दे देंगे।'

इस प्रकार जब बालक की वह मूर्ति घुमाई जा रही थी, तब एक ब्राह्मण-पुत्र ने यह घोषणा सुनी। वह बालक बड़ा वीर और अद्भुत आकृति वाला था। पूर्वजन्म के अभ्यास से वह बचपन से ही सदा परोपकार में लगा रहता था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रजा के पुण्य-फल ने ही उसके रूप में शरीर धारण कर रखा हो। ढिंढोरा पीटने वालों के पास जाकर उसने कहा—"प्रजा के हित में मै अपने को अर्पित करूंगा। मै अपने माता-पिता को समझाकर अभी आता हूं।"

उसकी यह बातें सुनकर ढिंढोरा पीटने वाले प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे अनुमति दे दी। घर जाकर बालक ने हाथ जोड़कर अपने माता-पिता से कहा—"समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए मैं अपना यह नश्वर शरीर दे रहा हूं। अतः आप लोग मुझे आज्ञा दें और इस प्रकार अपनी दरिद्रता का भी अंत करें। इसके लिए यहां के राजा सौ गांवों सहित सोने और रत्नों वाली मेरी यह प्रतिकृति (मूर्ति) मुझे देंगे, जिसे मैं आप लोगों को सौंप दूंगा। हे पिताश्री, तब मैं आप लोगों से भी उऋण हो जाऊंगा और पराया कार्य भी सिद्ध कर सकूंगा। दरिद्रता से छुटकारा पाकर आप भी अनेक पुत्र प्राप्त कर सकेंगे।"

पुत्र की यह बातें सुनकर उसके माता-पिता ने कहा—"बेटा ! क्या तू पागल हो गया है जो ऐसी बहकी-बहकी बातें कह रहा है ? भला धन के लिए कौन अपने पुत्र की हत्या करना चाहेगा और कौन बालक अपना शरीर देना चाहेगा ?"

"माता-पिता की यह बातें सुनकर उस बालक ने फिर कहा—"पिताश्री, न तो मेरी बुद्धि नष्ट हुई है और न ही मैं कोई प्रलाप कर रहा हूं। अतः आप मेरी अर्थयुक्त बातें सुनिए। मानव का यह शरीर अपवित्र वस्तुओं से भरा है। जन्म से ही यह जुगुप्सित (व्याधियों का घर) है। अतः शीघ्र ही इसे नष्ट हो जाना है। इसलिए बुद्धिमान लोगों का कहना है कि इस क्षणभंगुर शरीर से संसार में जितना भी पुण्य उपार्जित किया जा सके, वही सार वस्तु है। हे पिताश्री समस्त प्राणियों का उपकार करने से बड़ा और कौन-सा पुण्य हो सकता है ? और उसमें भी अगर माता-पिता की भक्ति हो तो देह-धारण करने का अधिक फल और क्या होगा ?"

बेताल पच्चीसी ▢ 129