भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३०२. भैषज्यरत्नावली । [ बालरोग-
पटोलादि ।
पटोलत्रिफलारिष्टहरिद्राकथितं पिबेत् ।
क्षतवीसर्पविस्फोटज्वराणां शान्तये शिशुः ॥७१॥
क्षत, वीसर्प, विस्फोट और ज्वरादिरोगोंको शान्त करनेके लिये बालककों परवल, त्रिफला, नीमकी छाल, और हल्दी इनका क्वाथ पान कराना हितकारी है ॥
पञ्चमूलादि ।
पञ्चमूलीकषायेण सघृतेन पयः शृतम् ।
सशृङ्गवेरं सगुडं पीतं हिक्कार्दितः पिबेत् ॥ ७२ ॥
बेल, शोनापाठा, कुम्हेर, पाढर, अरणी इनकी छालोंको समान भागसे मिश्रित दो तोले, जल ३२ तोले और दूध १६ तोले लेकर सबको एकत्र कर पकावे । जब दूधमात्र अवशिष्ट रहे तब उसको उतारकर उसमें घी, अदरखका रस और गुड डालकर पान करानेसे बालकको हिचकी आना दूर होती ह ॥ ७२ ॥
बिल्वादि ।
बिल्वशक्राम्बुमोचादसिद्धमाजं पयः शिशोः ।
सामां सरक्तां ग्रहणीं पीतं हन्यात्त्रिरात्रतः ॥ ७३ ॥
बेलगिरी, इन्द्रजौ, सुगन्धवाला, मोचरस और नागरमोथा इन औषधियोंके क्वाथद्वारा बकरीके दूधको सिद्ध कर पान करानेसे बालककी आम और रक्तसहित संग्रहणी तीन दिनमें ही नष्ट होती है ॥ ७३ ॥
शृङ्ग्यादि ।
शृङ्गीं समुस्तातिविषां विचूर्ण्य लेहं विदध्यान्मधुना
शिशूनाम् । कालज्वरच्छाद्दिभिरर्द्दितानां समाक्षिकां
चातिविषां तथैकाम् ॥ ७४ ॥
काकडासिङ्गी, नागरमोथा और अतीस इनको चूर्णकरके शहदमें मिलाकर अथवा केवल अतीसके चूर्णको ही शहदमें मिलाकर बालकोंको चटानेसे बच्चोंकी खाँसी, ज्वर और वमनादि रोगोंकी निवृत्ति होती है ॥ ७४ ॥
रजन्यादि ।
रजनी दारु सरलं श्रेयसी बृहतीद्वयम् ।
पृश्निपर्णी शताह्वा च लीढं माक्षिकसर्पिषा ॥७५ ॥