भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३०३

ग्रहणी दीपनं हन्ति मारुतार्त्तिं सकामलाम् ।
ज्वरातीसारपाण्डुघ्नं बालानां सर्वरोगजित् ॥ ७६ ॥

हल्दी, देवदारु, धूपसरल, गजपीपल, कटेरी, बडीकटेरी, पृश्निपर्णी और सोया इनके चूर्णको बराबर भाग ले घी और शहदमें मिलाकर चटानेसे बालकोंके संग्रहणी, मन्दाग्नि, वातरोग, कामला, ज्वर अतीसार, पाण्डु एवं अन्यान्य सर्वप्रकारके रोग दूर होते हैं ॥ ७५ ॥ ७६ ॥

कर्कटादि ।

कर्कटातिविषा शुण्ठी धातकी बिल्वबालकम् ।
मुस्तं मज्जां च कोलस्य मधुना सह मेलयेत् ॥ ७७ ॥
हन्ति ज्वरमतीसारं दुर्वारं ग्रहणीगदम् ।
छर्दिं रक्तस्रुतिं कासं श्वासं पश्चाद्रुजं तथा ॥ ७८ ॥

काकडासिंगी, अतीस, सोंठ, धायके फूल, बेलगिरी, सुगन्धवाला, नागरमोथा और बेरकी गुठलीकी गिरी इन औषधियोंके चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करानेसे बालकोंकी ज्वर, दस्त, दुस्तर, संग्रहणी, वमन, रक्तस्राव, खाँसी, श्वास और पश्चाद्रोग प्रभृति व्याधियाँ शमन होती हैं ॥ ७७ ॥ ७८ ॥

बालचतुर्भद्रिका ।

घनकृष्णारुणाशृङ्गीचूर्णं क्षौद्रेण संयुतम् ।
शिशोर्ज्वरातिसारघ्नं श्वासकासवमीहरम् ॥ ७९ ॥

नागरमोथा, पीपल, अतीस और काकडासिंगी इन सबके बारीक चूर्णको शहदके साथ मिश्रित कर चटानेसे बालकके ज्वर, दस्त, श्वास, खाँसी और वमनादि विकार नष्ट होते हैं ॥ ७९ ॥

धातक्यादि ।

धातकीबिल्वधन्याकलोध्रेन्द्रयवबालकैः ।
लेहः क्षौद्रेण बालानां ज्वरातीसारवान्तिजित् ॥ ८० ॥

धायके फूल, बेलगिरी, धनियाँ, लोध, इन्द्रजौ और सुगन्धवाला इनको समान भाग ले एकत्र पीसकर शहदके साथ मिलाकर चटानेसे बालकोंके ज्वर, दस्त और वमनरोग दूर होते हैं ॥ ८० ॥

पुष्करादि ।

पुष्करातिविषाशृङ्गीमागधीधन्वयासकैः ।
तच्चूर्णं मधुना लीढं शिशूनां पञ्चकासजित् ॥ ८१ ॥