भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३०४ भैषज्यरत्नावली । [ बालरोग-
पोहकरमूल, अतीस, काकड़ासिंगी, पीपल और धमासा इनके चूर्णको शहदमें मिलाकर चटावे तो बालकोंकी पाँचों प्रकारकी खाँसी नष्ट होती हैं ॥ ८१ ॥
बालरोगान्तकरस ।
शाणं सूतस्य शुद्धस्य गन्धकस्य च तत्समम् ।
सुवर्णमाक्षिकस्यापि चार्द्धभागं विनिक्षिपेत् ॥ ८२ ॥
ततः कज्जलिकां कृत्वा लौहपात्रे दृढे नवे ।
केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याः पत्रसम्भवम् ॥ ८३ ॥
स्वरसं काकमाच्याश्च ग्रीष्मसुन्दरकस्य च ।
सूर्यावर्त्तकशालिञ्चभेकपर्णीरसं तथा ॥ ८४ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक प्रत्येक चार चार माशे और सोनामाखी दो माशे लेवे । फिर इनकी एकत्र कज्जली बनाकर उसको लोहेके पात्रमें रख कुकुरभाँगरा, भाँगरा, निर्गुण्डी, मकोय, गूमा शाक, हुलहुल, शालिञ्चशाक और मण्डूकपर्णी इनके रसमें यथाक्रम एक एक बार भावना देवे ॥ ८२-८४ ॥
श्वेतापराजितायाश्च मूलं दद्याद्विचक्षणः ।
देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं मरिचसम्भवम् ॥ ८५ ॥
शुभे शिलामये पात्रे लौहदण्डेन मर्दयेत् ।
शुष्कमातपसंयोगाद्वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ८६ ॥
प्रमाणं सर्षपस्येव बालानां विनियोजयेत् ।
हन्ति त्रिदोषजं चैव ज्वरमामं सुदारुणम् ॥ ८७ ॥
कासं पञ्चविधं चापि सर्वरोगन्निहन्ति च ।
शिशूनां रोगनाशाय निर्मितोऽयं महारसः ॥ ८८ ॥
फिर उसमें सफेद अपराजिताकी जडका चूर्ण दो माशे और काली मिरचका चूर्ण दो माशे मिलाकर उसको उत्तम पत्थरके बर्तनमें रख लोहेके दण्डेसे अच्छे प्रकार खरल करे । पश्चात् धूपमें सुखाकर सरसोंकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करानेसे बालकोंके त्रिदोष-जनित ज्वर दारुण आम ज्वर, पाँच प्रकारकी खाँसी एवं अन्य सर्व प्रकारके रोग शीघ्र नष्ट होते हैं। यह महारस बालकोंके रोगोंको दूर करनेके लिये रचा गया है ॥ ८५-८८ ॥