भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा } भाषाटीकासहिता । १३०५


कुमारकल्याणरस ।

सिन्दूरं मौक्तिकं हेम व्योमायः स्वर्णमाक्षिकम् ।
कन्यारसेन संमर्द्य कुर्यान्मुद्गमिता वटीः ॥ ८९ ॥
वटिकां वटिकार्द्धं वा वयोऽवस्थां विवेच्य च ।
क्षीरेण सितया सार्द्धं बालरोगे प्रयोजयेत् ॥ ९० ॥
कुमाराणां ज्वरं श्वासं कसनं च सुदारुणम् ।
ग्रहदोषांश्च विविधान् स्तन्यस्याग्रहणं तथा ॥ ९१ ॥
कामलामतीसारं च कृशतां मन्दवह्निताम् ।
रसः कुमारकल्याणो नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ९२ ॥

रससिन्दूर, मोतीकी भस्म, सुवर्ण, अभ्रक, लोहा और सोनामाखी इन सबकी भस्मको समान भाग ले घीग्वारके रसमें उत्तम प्रकार खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःसमय बालककी अवस्था और रोगका विचारकर एक गोली अथवा आधी गोली दूध और मिश्रीके साथ सेवन करावे तो यह बालकोंके ज्वर, श्वास, दारुण खाँसी, अनेक प्रकारके ग्रहदोष, स्तन्यदोष, कामला, अतीसार, कृशता, मन्दाग्नि और अन्य सब प्रकारके रोगोंको यह कुमारकल्याणरस निश्चय नष्ट करता है ॥ ८९-९२ ॥

अश्वगन्धाघृत ।

पादकल्केऽश्वगन्धायाः क्षीरे दशगुणं पचेत् ।
घृतं पेयं कुमाराणां पुष्टिकृद्बलवर्णकृत् ॥ ९३ ॥

असगन्धके १ सेर कल्क और दशगुने दूधमें यथाविधि २ सेर घृतको पकावे । इस घृतको पीनेसे बालकोंके अङ्गोंकी पुष्टि होतीहै तथा बल, वर्ण उत्पन्न होता है ॥ ९३ ॥

बालचाङ्गेरीघृत ।

चाङ्गेरीस्वरसे सर्पिश्छागक्षीरं समैः पचेत् ।
कपित्थव्योषसिन्धूत्थसमङ्गोत्पलवालकैः ॥ ९४ ॥
सबिल्वधातकीमोचैः सिद्धं सर्वातिसारजित् ।
ग्रहणीं दुस्तरां हन्ति बालानां तु विशेषतः ॥ ९५ ॥

अम्ललोनियाके २ सेर रसमें घी २ सेर, बकरीका दूध २ सेर एवं कैथ, सोंठ, मिरच, पीपल, सैंधानमक, वराहक्रान्ता, लालकमल, सुगन्धवाला, बेलगिरी, धायके