भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३०६ भैषज्यरत्नावली । [ बालरोग-
फूल और मोचरस इन सबका समान भाग मिश्रित कल्क एक सेर डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करलेवे। यह घृत सर्वप्रकारके अतीसार और विशेषकर बालकोंकी दुस्तर संग्रहणीको नष्ट करता है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
अष्टमंगलघृत ।
वचा कुष्ठं तथा ब्राह्मी सिद्धार्थकमथापि वा ।
सारिवा सैन्धवं चैव पिप्पलीघृतमष्टकम् ॥ ९६ ॥
मेध्यं घृतमिदं सिद्धं पातव्यं च दिनेदिने ।
दृढस्मृतिः क्षिप्रमेधः कुमारो बुद्धिमान् भवेत् ॥ ९७ ॥
न पिशाचा न रक्षांसि न भूता न च मातरः ।
प्रभवन्ति कुमाराणां पिबतामष्टमङ्गलम् ॥ ९८ ॥
वच, कुठ, ब्राह्मी, सफेद सरसों, अनन्तमूल, सैंधानमक और पीपल इनका समान भाग मिलाहुआ चूर्ण १ सेर और घी २ सेर लेकर आठ सेर जलमें पकावें जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब यह घृत प्रतिदिन उचित मात्रासे बालकको पान करावे । इसके सेवनसे बालक दृढ स्मृतिवाला, मेधावान् कुशाग्र बुद्धिवाला होताहै। इस अष्टमङ्गलनामक घृतको पीनेवाले बालकोंको पिशाच, राक्षस, भूत और षोडशमातृकायें बाधनेके लिये समर्थ नहीं होतीं हैं ॥ ९६-९८ ॥
कुमारकल्याणघृत ।
शङ्खपुष्पी वचा ब्राह्मी कुष्ठं त्रिफलया सह ।
द्राक्षा सशर्करा शुण्ठी जीवन्ती जीरकं बला ॥ ९९ ॥
शठी दुरालभा बिल्वं दाडिमं सुरसा स्थिरा ।
मुस्तं पुष्करमूलं च सूक्ष्मैला गजपिप्पली ॥ १०० ॥
एषां कर्षसमैर्भागैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
कषाये कण्टकार्याश्च क्षीरे तस्मिंश्चतुर्गुणे ॥ १०१ ॥
शंखपुष्पी, वच, ब्राह्मी, कुठ, त्रिफला, दाख, चीनी, सोंठ, जीवन्ती, जीरा, खिरैंटी, कचूर, धमासा, बेलगिरी, अनारका बक्कल, तुलसी, शालपर्णी, नागरमोथा, पोहकरमूल, छोटी इलायची और गजपीपल इन प्रत्येकको एकएक कर्ष लेकर चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्ण और एक प्रस्थ घृतको कटेरीके दो प्रस्थ क्वाथ और ४ प्रस्थ दूधमें डालकर विधिपूर्वक पकावे ॥ ९९-१०१ ॥