भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३०७


एतत्कुमारकल्याणं घृतरत्नं सुखप्रदम् ।
बलपुष्टिकरं धन्यं पुष्ट्यग्निवलवर्द्धनम् ॥ १०२ ॥
छायासर्वग्रहालक्ष्मीकृमिदन्तमदापहम् ।
सर्वबालामयं हन्ति दन्तोद्भेदं विशेषतः ॥ १०३ ॥
यह कुमारकल्याण नामक घृतरत्न सुखको देनेवाला, बल और पुष्टिको करनेवाला, अग्निवलको बढानेवाला तथा छाया, समस्त ग्रह, अलक्ष्मी, कृमिरोग, दन्तरोग बालकोंके सब रोग और विशेषकर दन्तोद्भेदरोगको नष्ट करनेवाला है ॥ १०२ ॥ ॥ १०३ ॥

लाक्षादितैल ।

लाक्षारससमं सिद्धं तैलं मस्तु चतुर्गुणम् ।
रास्नाचन्दनकुष्ठाब्दवाजिगन्धानिशायुगैः ॥ १०४ ॥
शताह्वादारुयष्ट्याह्वमूर्वांतिक्ताहरेणुभिः ।
बालानां ज्वररक्षोघ्नमभ्यङ्गाद्बलवर्णकृत् ॥ १०५ ॥
लाखका रस १ प्रस्थ, तिलका तेल १ प्रस्थ और दहीका तोड ४ प्रस्थ एवं रायसन, लालचन्दन, कूठ, नागरमोथा, असगन्ध, हल्दी, दारुहल्दी, सोया, देवदारु, मुलहठी, मूर्वा, कुटकी और रेणुका इनका कल्क समान भाग मिलित एक सेर लेवे । सबको यथाविधि एकत्र करके उत्तम प्रकार तेलको पकावे । यह तेल बालकोंके शरीरपर मालिश करनेसे जीर्णज्वर और राक्षसादिक़ी बाधा नष्ट होती हैं तथा बल और वर्णकी वृद्धि होती है ॥ १०४ ॥ १०५ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां बालरोगचिकित्सा ॥


विषकी चिकित्सा ।

स्थावरेण विषेणार्त्तं नरं यत्नेन वामयेत् ।
वमनेन समं नास्ति यतस्तस्य चिकित्सितम् ॥ १ ॥
स्थावरविषसे पीडित मनुष्यको प्रथम यत्नपूर्वक वमन करावे । क्योंकि वमन करानेके समान विषनाशक अन्य औषधि नहीं है ॥ १ ॥

विषमत्यन्तमुष्णञ्च तीक्ष्णं च कथितं यतः ।
अतः सर्वविषे युक्तः परिषेकस्तु शीतलः ॥ २ ॥