भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३०८ भैषज्यरत्नावली। [ विष-
औष्ण्यात्तैक्ष्ण्याद्विशेषेण विषं पित्तं प्रकोपयेत् ।
वमितं सेचयेत्तस्माच्छीतलेन जलेन च ॥ ३ ॥
विष स्वभावतः अत्यन्त उष्ण अत्यन्त तीक्ष्णवीर्य होता है इस कारण सर्वप्रकारके विषोंमें शीतळक्रिया करे । विष अत्यन्त उष्ण होनेसे पित्तको कुपित करदेता है इसलिये वमन करानेके पीछे रोगीको शीतल जलसे सेचन करे ॥३॥
पाययेन्मधुसर्पिर्भ्यां विषघ्नं भेषजं द्रुतम् ।
भोक्तुमम्लरसं दद्यात्सितया च समन्वितम् ॥ ४ ॥
घृत तथा शहदके साथ विषनाशक औषधि शीघ्र प्रयोग करे अथवा मिश्रीके साथ खटाई मिलाकर भक्षण करानी चाहिये ॥ ४ ॥
सर्वैरेवोदितः सर्पैः शाखादष्टस्य देहिनः ।
दंशस्योपरि बध्नीयादरिष्टाश्चतुरङ्गुले ॥ ५ ॥
न गच्छति विषं देहमरिष्टाभिर्निवारितम् ।
दहेद्दंशमथोत्कृत्य यत्र बन्धो न जायते ॥ ६ ॥
यदि किसी मनुष्यके हाथ अथवा पाँवमें साँप काटखाय तो तत्क्षण काटेहुए स्थानसे ४ अंगुल ऊपर उसके रस्सीसे अथवा डोरेसे खूब कसकर बन्धन बाँधदेवे । इससे विष सब शरीरमें नहीं फैल सकेगा । जिस दंशस्थानमें बन्ध न बँध सकता हो उस स्थानको अस्त्रसे चीरकर दागदेवे ॥ ५ ॥ ६ ॥
मूलं तण्डुलवारिणा पिबति यः प्रत्यङ्गिरासम्भवं
निष्पिष्टं शुचिभद्रयोगदिवसे तस्याहिभीतिः कुतः ।
दर्पादेव फणी यदा दशति तं मोहान्वितो मूलयन्
स्थाने तत्र स एव याति नियतं वक्त्रं यमस्याचिरात् ॥७॥
आषाढके महीनेमें पुष्यनक्षत्र और शुभदिनमें सिरसकी जडको चावलोंके जलमें पीसकर जो पुरुष पीता है उसको कहीं भी सर्पका भय नहीं रहता । यदि क्रोधके कारण सर्प उस पुरुषको काट भी लेता है तो वह सर्प मोहको प्राप्त होकर गिरपडता है और वह उसी स्थानमें बहुत जल्द यमराजके मुँहका ग्रास होता है ॥ ७ ॥
मसूरनिम्बपत्राभ्यां योऽत्ति मेषगते रवौ ।
अब्दमेकं न भीतिः स्याद्विषात्तस्य न संशयः ॥ ८ ॥