भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1341

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३०९

जो पुरुष वैशाखके महीनेमें मेषकी संक्रान्तिके दिन मसूरकी दालके दो दाने और नीमके दो पत्तोंको एकत्र पीसकर भक्षण करे तो उसको एक वर्ष पर्यन्त सर्पके विषसे भय नहीं रहता ॥ ८

धवलपुनर्नवजटया तण्डुलजलपीतया च पुष्यर्क्षे ।
अपहरति खलु विषधरोपद्रवमावत्सरं पुंसाम् ॥ ९ ॥
पुष्यनक्षत्रमें सफेद पुनर्नवेकी जड़को चावलोंके जलके साथ पीसकर सेवन करनेसे मनुष्योंको एकवर्षतक सर्पका भय कदापि नहीं होता ॥ ९ ॥

गृहधूमो हरिद्रे द्वे समूलं तण्डुलीयकम् ।
अपि वासुकिना दष्टः पिबेद्दधिघृताप्लुतम् ॥ १० ॥
घरका धुआँ, हल्दी, दारुहल्दी और चौलाईकी जड इनको समान भाग ले एकत्र पीसकर दही और घीमें मिलाकर पीवे तो वासुकिसर्पद्वारा काटाहुआ भी पुरुष आरोग्य होता है ॥ १० ॥

कुलिकमूलनस्येन कालदष्टोऽपि जीवति ॥ ११ ॥
कोकिलाक्षवृक्षकी जडको पीसकर सूंघनेसे साँपका काटाहुआ मृतप्राय पुरुष भी जीजाता है ॥ ११ ॥

शिरीषपुष्पस्वरसे भावितं मरिचं सितम् ।
सप्ताहं सर्पदष्टानां नस्यपानाञ्जने हितम् ॥ १२ ॥
सफेद मिरचको सिरसके फूलोंके रसमें ७ दिनतक भावना देकर पीसलेवे । फिर यह चूर्ण साँपसे काटे हुए मनुष्योंको पान, नस्य और अभ्यंजनादिरूपसे सेवन कराना हितकारी है ॥ १२ ॥

द्विपलं नतकुष्ठाभ्यां घृतक्षौद्रचतुःपलम् ।
अपि तक्षकदष्टानां पानमेतत्सुखप्रदम् ॥ १३ ॥
तगर और कूठ इन दोनोंको आठ आठ तोले लेकर खूब बारीक पीसले । फिर यह चूर्ण चार चार पल प्रमाण घी और शहदमें मिलाकर पान करे तो तक्षकसे काटे हुए पुरुषोंको भी सुख प्राप्त होता है ॥ १३ ॥

वन्यकर्कोटजं मूलं छागमूत्रेण भावितम् ।
नस्यं काञ्जिकसंयुक्तं विषोपहतचेतसः ॥ १४ ॥
वनककोडेकी जड़को बकरीके मूत्रमें भिगोकर और काँजीमें पीसकर साँपसे काटे हुए मनुष्यको नस्य देवे, इससे विष दूर होता है ॥ १४ ॥