भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३१० | भैषज्यरत्नावली । | [ विष-
पीते विषे स्याद्वमनं च त्वक्स्थे प्रदेहसेकादि सुशीतलं च ॥
जिस मनुष्यने विष पान किया हो उसको तत्काल वमन करानी चाहिये और जो त्वचामें विष स्थित हो तो उसके शरीरपर शीतल द्रव्योंका लेप और सेचन करना चाहिये ॥ १५ ॥
अगारधूममञ्जिष्ठारजनीलवणोत्तमैः ।
लेपो जयत्याखुविषं कर्णिकायाश्च पातनम् ॥ १६ ॥
घरका धुआँ, मञ्जीठ, हल्दी और सेंधानमक इनको जलमें पीसकर लेप करनेसे चूहेका विष और कर्णिकानामक कीडेके अंकुर दूर होते हैं ॥ १६ ॥
सोमवल्कोऽश्वगन्धा च गोजिह्वा हंसपाद्यपि ।
रजन्यौ गैरकं लेपो नखदन्तविषापहः ॥ १७ ॥
सफेद खैर, असगन्ध, गोजिया ( गाजुवाँ ), लाल लज्जाळु, हल्दी, दारुहल्दी और गेरू इनको समान भाग ले जलमें पीसकर लेप करनेसे नाखूनका और दाँतोंसे काटेका विष दूर होता है ॥ १७ ॥
यः कासमर्द्दनेत्रं वदने निक्षिप्य कर्णफूत्कारम् ।
मनुजो ददाति शीघ्रं जयति विषं वृश्चिकानां सः ॥ १८ ॥
जो पुरुष कसौंदीके वृक्षकी नलकालीसे रोगीके कानमें फूँक मारे तो बिच्छूका विष तत्काल उतरता है ॥ १८ ॥
उष्णं गव्यं घृतं चापि सैन्धवेन समन्वितम् ।
वृश्चिकस्य विषं हन्ति लेपनात्पर्वतात्मजे ॥ १९ ॥
शिवजी कहते हैं कि, हे पार्वती ! गरम २ गौके घीको सेंधेनमकके साथ मिलाकर लेप करनेसे बिच्छूका विष शीघ्र नष्ट होता है ॥ १९ ॥
शिरीषस्य तु बीजं वै स्नुहीक्षीरेण घर्षितम् ।
तल्लेपेन महादेवि नश्येत्कुक्कुरजं विषम् ॥ २० ॥
हे महेश्वरि ! सिरसके बीजोंको थूहरके दूधमें पीसकर वा घिसकर लेप करनेसे कुत्तेका विष निश्चय नाश होता है ॥ २० ॥
पिष्टतण्डुलमध्यस्थं भक्षितं मेषलोमकम् ।
कुक्कुरस्य विषं हन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २१ ॥
चावलोंको पीसकर उनमें भेंडका रुआँ भरकर भक्षण करनेसे कुत्तेका विष नष्ट होता है । इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ २१ ॥