भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३११
वचाहिङ्गुविडङ्गानि सैन्धवं गजपिप्पली ।
पाठा प्रतिविषा व्योषं काश्यपेन विनिर्मितम् ॥
दशाङ्गमगदं पीत्वा सर्वकीटविषं जयेत् ॥ २२ ॥
बच, हींग, वायविडङ्ग, सेंधानमक, गजपीपल, पाठ, अतीस, सोंठ, मिरच और पीपल इन औषधियोंके समान भाग मिश्रित बारीक चूर्णको सेवन करनेसे सर्व प्रकार कीडोंके विष दूर होते हैं । इस चूर्णको कश्यप ऋषिने बनाया है ॥२२॥
कीटदष्टक्रियाः सर्वाः समानाः स्युर्जलौकसाम् ॥ २३ ॥
कीडे आदिकोंकी विषनाशक चिकित्साके समान ही जलचर जीवोंके विषकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २३ ॥
अपराजितामूलं च घृतेन त्वग्गतं विषम् ।
पयसाऽसृग्गतं हन्ति मांसगं कुष्ठचूर्णतः ॥ २४ ॥
अस्थिगं रजनीयुक्तं मेदोगं काकोलीयुतम् ।
मज्जागं पिप्पलीयुक्तं चण्डालीकन्दसंयुक्तम् ॥
शुक्रगं हन्ति लौहित्यं तस्माद्देयाऽपराजिता ॥ २५ ॥
अपराजिता (कोयल) की जडको घीके साथ सेवन करनेसे त्वचा में स्थित विष, दूधके साथ खानेसे रक्तगत विष, कूठके चूर्णके साथ खानेसे मांसगत विष, हल्दीके चूर्णके साथ सेवन करनेसे अस्थिगत विष, काकोलीके साथ सेवन करनेसे मेदोगत विष, पीपलके साथ खानेसे मज्जागत विष और चण्डालकन्दके साथ सेवन करनेसे शुक्रगतविष नष्ट होता है । इस कारण सर्वप्रकारके विषोंमें अपराजिताकी मूलको सेवन करना चाहिये ॥ २४ ॥ २५ ॥
द्वे हरिद्रे शिला तालं कुङ्कुमं मुस्तकं जलैः ।
गुडिका लेपमात्रेण विषं हन्ति महाद्भुतम् ॥ २६ ॥
दोनों हल्दी, मैनासिल, हरिताल, केशर और नागरमोथा इनको जलमें पीस कर गोली बनालेवे । उस गोलीको जलमें घिसकर लगानेसे महाभयानक विष सहजमें ही नाश होता है ॥ २६ ॥
घृतमधुनवनीतं पिप्पलीशृङ्गवेरं मरिचमपि तु दद्यात्
सप्तमं सैन्धवेन । यदि भवति सरोषैस्तक्षकैर्वापि
दष्टोऽगदमिह खलु पीत्वा निर्विषं तत्क्षणेन ॥ २७ ॥