भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३१२ भैषज्यरत्नावली । [ विष-
घी, शहद, नैनीघी, पीपल, सोंठ, मिरच और सेंधानमक इनको एकत्र पीसकर सेवनकरनेसे क्रोधयुक्त तक्षकसे कटाहुआ पुरुष भी तत्क्षण विषरहित होताहै २७
नक्तमालफलं व्योषं बिल्वमूलं निशाद्वयम् । सौरसं पुष्पमाजं वा मूत्रं बोधनमञ्जनम् ॥ २८ ॥
करञ्जके फल, त्रिकुटा, बेलकी जड, हल्दी, दारुहल्दी और तुलसीकी मञ्जरी इन सबको एकत्र बकरीके मूत्रमें पीसकर नेत्रोंमें आँजे तो सर्पके डसनेसे बेहोश हुआ पुरुष शीघ्र चैतन्यलाभ करता है ॥ २८ ॥
जलेन लाङ्गलीकन्दं नस्यं सर्पविषापहम् । वारिणा टङ्कणं पीतमथवार्कस्य मूलकम् ॥ २९ ॥
कलिहारीकी जडको जलमें पीसकर सूँघनेसे या सुहागेको अथवा आककी जडको जलमें पीसकर पीनेसे सर्पविष दूर होता है ॥२९॥
कपोतमांसं ससिताक्षौद्रं कण्ठगते विषे । लिह्यादामाशयगते ताभ्यां चूर्णपलं नतम् ॥ ३० ॥
कबूतरके मांसके चूर्णको मिश्री और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे कण्ठगत विष दूर होता है और तगरके चूर्णको १ पल प्रमाण ले मिश्री तथा शहदके साथ भक्षण करनेसे आमाशयगतविष नष्ट होता है ॥ ३० ॥
विषे पक्वाशयगते पिप्पलीरजनीद्वयम् । मञ्जिष्ठां च समं पिष्ट्वा गोपित्तेन नरः पिबेत् ॥ ३१ ॥
पीपल, हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ और गोरोचन ये प्रत्येक औषधियेँ समान भाग लेकर जलमें पीसकर सेवन करनेसे पक्वाशयगत विषको दूर करती है॥३१
रजनीसैन्धवक्षौद्रसंयुक्तं घृतमुत्तमम् । पानं मूलविषात्तंस्य दिग्घविद्धस्य चेष्यते ॥ ३२ ॥
हल्दी, सेंधानमक, शहद और उत्तम गोघृत इनको समान भाग ले एकत्र कर यथाविधिसे मर्दनकर मूलविषसे पीडित अथवा दिग्घविद्ध (विषलिप्त बाणादिसे हत) मनुष्यको पान कराना चाहिये ॥३२॥
सितामधुयुतं चूर्णं ताम्रस्य कनकस्य वा । लेहं प्रशमयत्युग्रं सर्वसंयोगजं विषम् ॥ ३३ ॥
शुद्ध ताँबेकी भस्म और स्वर्णभस्मको बराबर भाग ले मिश्री और शहदमें मिलाकर चाटनेसे सर्वप्रकारका उग्रविष शमन होताहै ॥३३॥