भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1345, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३१३
अङ्कोटमूलनिःक्वाथं फाणितं सघृतं लिहेत् ।
तैलाक्तः स्विन्नसर्वाङ्गो गरदोषविषापहम् ॥ ३४ ॥
अङ्कोलकी जडका क्वाथ बनाकर उसमें राव और घृत डालकर पान करे और अपने सब शरीरमें तेलकी मालिश करे तो गरदोष विष नष्ट होता है ॥ ३४ ॥
कट्वभ्यर्जुनशैरेयशेल्लुक्षीरिद्रुमत्वचः ।
चूर्णं कल्कः कषायो वा कीटलूताव्रणापहा ॥ ३५ ॥
मालकाङ्गनी, अर्जुनकी छाल, पीलापियाबाँसा, बड और गूलरकी छाल इनके चूर्ण कल्क अथवा क्वाथको सेवन करनेसे कीडें और मकडी आदिका विष दूर होता है ॥ ३५ ॥
दंशे आम्रणविधिना वृश्चिकविषहृत्कुठेरपादगुटिका ।
पुरधूमपूर्वमर्कच्छदमिव पिष्ट्वा कृतो लेपः ॥ ३६ ॥
काली तुलसीकी जडको जलमें पीसकर गोली बनावे । उस गोलीको जलमें घिसकर बिच्छूसे काटे हुए स्थानपर लेप करे अथवा पहले दंशस्थानपर गूगलकी धूप देकर पश्चात् आकके पत्तोंको पीसकर लेप करनेसे बिच्छूका विष जाय ॥ ३६ ॥
जीरकस्य कृतः कल्को घृतसैन्धवसंयुतः ।
सुखोष्णो वृश्चिकार्त्तानां स्याल्लेपो वेदनापहः ॥ ३७ ॥
जीरेको पीसकर घृत और सेंधानमकमें मिलाकर बिच्छूके काटेहुए स्थानपर गरम करके लेप करनेसे उसकी पीडा कम होती है ॥ ३७ ॥
कुङ्कुमकुनटीकर्कटपलहरितालैः कुसुम्भसम्मिलितैः ।
कृतगुडिका आम्रणतो वृश्चिकगोधासरटादिविषजित् ॥३८
केशर, मैनसिल, केंकडेका मांस, हरिताल और कसमके फूल इन सबको एकत्र मर्दन कर गोली बनालेवे । फिर उक्त गोलीको जलमें घिसकर दंशस्थान पर लगा- नेसे बिच्छू, गोह और गिरगटादि जीवोंका विष नष्ट होता है ॥ ३८ ॥
लेप इव भेकगरलं शिरीषबीजैः स्नुहीपयःसिक्तैः ।
प्रणुदन्ति त्र्यहमशिता अङ्कोटजटाः कुष्ठसम्मिलिताः॥३९
सिरसके बीजोंको पीसकर उनको थूहरके दूधमें भिजोकर लेप करनेसे अथवा अङ्कोलकी जड, बालछड और कूठ इनके क्वाथ या कल्कको तीन दिनतक भक्षण करनेसे मेंढकका विष दूर होता है ॥ ३९ ॥
मरिचमहौषधबालकनागाह्वैर्मक्षिकाविषे लेपः ॥
८३