भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1346

१३१४ भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-

मिर्च, सोंठ, सुगन्धवाला और नागकेशर इनको एकत्र पीसकर लेप करनेसे मक्खीका विष नष्ट होता है ॥

लालाविषमपनयतो मूले मिलिते पटालनीलकयोः ॥४०॥

परवलकी जड और नीलवृक्षकी जड इन दोनोंको एकत्र पीसकर लेप करे तो लालाविष नाश होता है ॥ ४० ॥

श्लेष्मणः कर्णगूथस्य वामानामिकया कृतः । लेपो हन्याद्विषं घोरं नृमूत्रासेचनं ततः ॥ ४१ ॥

बायें हाथकी अनामिका अंगुलिसे मुँहके थूकको अथवा कानके मैलको निकालकर दंशस्थानपर लगानेसे अथवा उस स्थानपर मनुष्यके मूत्रको सेचन करनेसे सर्पादि सर्वप्रकारके जन्तुओंका उग्र विष शीघ्र नष्ट होता है ॥ ४१ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां विषचिकित्सा ॥


अथरसायनाधिकारः ।

यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम् । पूर्वे वयसि मध्ये वा शुद्धकायः समाचरेत् ॥ १ ॥

जो औषध जरा (बुढापा) और रोगको नष्ट करनेवाली हैं उनको रसायन कहते हैं। युवावस्थाके प्रारम्भमें अथवा मध्यमें वमन और विरेचनादिसे शरीरको अच्छेप्रकार शुद्ध कर रासायनिक औषधि सेवन करे ॥ १ ॥

नाविशुद्धशरीरस्य युक्तो रसायनो विधिः । न भाति वाससि म्लिष्टे रङ्गयोग इवार्दितः ॥ २ ॥

यदि शरीरको विना शुद्धकिये ही रसायन औषधि सेवन की जाती है तो वह इस प्रकार गुण नहीं करती जिस प्रकार मलिन वस्त्रमें रंग देनेसे उसपर अच्छेप्रकार रंग नहीं चढता है ॥ २ ॥

दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः । प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलोदयम् ॥ ३ ॥ वाक्सिद्धिं वृषतां कान्तिमवाप्नोति रसायनात् । लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥ ४ ॥