भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1347, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1347

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३१५

रसायनको सेवन करनेसे दीर्घायु, स्मृतिशक्ति, मेधा, आरोग्यता, तरुणावस्था, प्रभा, वर्ण, स्वरकी सुन्दरता, उदारता, शरीर और इन्द्रियोंमें बल, वाक्पटुता, वृष्यता और कान्तिलाभ होता है। देहमें स्थित रस और रक्तादि उत्तम पदार्थोंकी जिस उपायके करनेसे प्राप्ति हो उसको ही रसायन कहते हैं ॥

ये मासमेकं स्वरसं पिबन्ति दिने दिने भृङ्गरजःसमुत्थम् ।
क्षीराशिनस्ते बलवर्णयुक्ताः समाशतं जीवितमाप्नुवन्ति ॥५॥

केवल दूधको ही पान करते हुए जो पुरुष प्रतिदिन नियमसे एक मास पर्यन्त भांगरेके रसको पान करते हैं वे बल, वर्ण और दीर्घायुसे युक्त होकर सौवर्षतक जीते हैं ॥ ५ ॥

मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य
चूर्णम् । रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयो-
ज्यः खलु शंखपुष्प्याः ॥६॥ आयुःप्रदान्यामयनाश-
नानि बलाग्निवर्णस्वरवर्द्धनानि । मेध्यानि चैतानि
रसायनानि मेध्या विशेषेण तु शङ्खपुष्पी ॥ ७ ॥

मण्डूकपर्णीके स्वरस अथवा मुलहठीके चूर्णको दूधके साथ सेवन करनेसे या जड और पुष्पसहित गिलोयके रस वा शंखपुष्पीके कल्कको उक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे आयुकी वृद्धि होती है, सब रोग नष्ट होते हैं तथा बल, वर्ण, जठराग्नि और स्वरकी वृद्धि होती है। ये सब रसायन औषधें मेधाजनक हैं तो भी शंखपुष्पीसे विशेषकर मेधावृद्धि होती है ॥ ६ ॥ ७ ॥

पीताऽश्वगन्धा पयसाऽर्द्धमासं घृतेन तैलेन सुखाम्बुना वा ।
कृशस्य पुष्टिं वपुषो विधत्ते बालस्य सस्यस्य यथाऽम्बुवृष्टिः॥

असगन्धके चूर्णको दूध, घी, तिलतेल अथवा उष्ण जलके साथ सेवन करनेसे कृश मनुष्यके शरीरकी इस भाँति पुष्टि होती है जैसे वर्षाके जलसे धान्यके नवीन अंकुर पुष्ट होते हैं ॥ ८ ॥

धात्रीतिलान्भृङ्गरजोविमिश्रान् ये भक्षयेयुर्मनुजाः क्रमेण ।
ते कृष्णकेशा विमलेन्द्रियाश्च निर्व्याधयो वर्षशतं भवेयुः ॥

जो मनुष्य आमलों और तिलोंके चूर्णको भाँगरेके रसमें मिलाकर यथानियम भक्षण करें तो वे पुरुष कृष्णवर्णके केशोंवाले और निर्मल इन्द्रियवाले नीरोग होकर सौ वर्षपर्यन्त जीते हैं ॥ ९ ॥

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