भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३१६ भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-
वृद्धदारकमूलानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
शताबर्या रसेनैव सप्तवारांश्च भावयेत् ॥ १० ॥
अक्षमात्रं तु तच्चूर्णं सर्पिषा सह योजयेत् ।
मासमात्रोपयोगेन मतिमान् जायते नरः ॥
मेधावी स्मृतिमांश्चैव वलीपपलितवर्जितः ॥ ११ ॥
विधारेकी जडको कूटपीस बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उसको शतावरके रसमें सातबार भावना देकर प्रतिदिन एकएक तोलेकी मात्रासे घीमें मिलाकर सेवन करे । इसको एक महीने यथाविधि सेवन करनेसे मनुष्य अत्यन्त बुद्धिमान्, मेधावान्, स्मृतिमान् होता है और वली तथा पलितरोगका नाश होता है ॥
हस्तिकर्णरजः खादेत्प्रातरुत्थाय सर्पिषा ।
यथेष्टाहारचारोऽपि सहस्रायुर्भवेन्नरः ॥ १२ ॥
मेधावी बलवान् कामी स्त्रीशतानि व्रजत्यसौ ।
मधुना त्वश्ववेगः स्याद्बलिष्ठः स्त्रीसहस्रगः ॥
मन्त्रश्चासौ प्रयोक्तव्यो भिषजा चाभिमन्त्रणे ॥ १३ ॥
मंत्रो यथा—“ॐ नमो महाविनायकाय अमृतं रक्ष रक्ष
मम फलसिद्धिं देहि रुद्रवचनेन स्वाहा ॥”
हस्तिकर्ण ( पलास ) की जडके चूर्णको उपर्युक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके घृतके साथ मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल भक्षण करे और यथेच्छ आहार विहार करे तो वह पुरुष हजारवर्षकी आयुवाला, मेधावाला, बलवान् कामी, सैंकडों स्त्रियोंसे रमण करनेवाला होता है और उक्त चूर्णको शहदके साथ खानेसे घोडेके समान अत्यन्त बलवान् और हजार स्त्रियोंमें गमन करनेवाला होता है ॥
गुडेन मधुना शुण्ठ्या कृष्णया लवणेन वा ।
द्वे द्वे खादन्सदा पथ्ये जीवेद्वर्षशतं सुखी ॥ १४ ॥
दो हरडों और दो पीपलोंको सोंठके चूर्ण, सेंघेनमक, गुड और शहदके साथ नियमितरूपसे प्रतिदिन सेवन करे तो वह मनुष्य सुखपूर्वक सौ वर्षतक जीता है ॥ १४ ॥
पञ्चाष्टौ सप्त दश वा पिप्पलीः क्षौद्रसर्पिषा ।
रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत् ॥ १५ ॥