भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1349, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिकारः ] भाषाटीकासहित । १३१७
पाँच, आठ, सात अथवा दस पीपलोंको घृत और शहदके साथ मिलाकर एक वर्षपर्यन्त सेवन करनेसे रसायन औषधिके समान गुण होता है ॥ १५ ॥
तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्ने तथाऽग्रे भोजनस्य च । पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः ॥ १६ ॥ प्रयोज्या मधुसंमिश्रा रसायनगुणैषिणा । जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्कां गलामयम् ॥ १७ ॥ अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम् । वैस्वर्यं पीनसं शोथं गुल्मं वातबलासकम् ॥ १८ ॥
रसायनके गुणकी इच्छा करनेवाला मनुष्य छः पीपलोंको ढाकके क्षारजलमें ७ दिनतक भावना देकर धूपमें सुखालेवे । फिर उनको घीमें भूनकर शहदमें मिलाकर तीन पीपलें प्रातःकाल और तीन दोपहरको भोजन करनेसे पहले भक्षण करे । इससे खाँसी, क्षय, शोष, श्वास, हिचकी, गलेके रोग, बवासीर, संग्रहणी, पाण्डु, विषमज्वर, विरसता, पीनस, सूजन, गुल्म, वातज और बलासका रोग नष्ट होते हैं ॥ १६–१८ ॥
गुडूच्यपामार्गविडङ्गशङ्खिनी वचाभयाशुण्ठिशतावरी समा । घृतेन लीढा प्रकरोति मानवं त्रिभिर्दिनैः श्लोकसहस्रधारिणम् ॥ १९ ॥
गिलोय, चिरचिटा, वायविडङ्ग, शंखपुष्पी, वच, हरड, सोंठ और शतावर इनके चूर्णको समान भाग लेकर घृतमें मिलाकर तीन दिनतक चाटनेसे ही यह चूर्ण हजारों श्लोकोंकी धारणा करनेवाली मनुष्यकी स्मरणशक्तिको बढाता है ॥
व्यङ्गवलीपलितघ्नं पीनसवैस्वर्यकासहरम् । रजनीक्षयेऽम्बुनस्यं रसायनं दृष्टिजनकं च ॥ २० ॥
प्रतिदिन प्रातःकाल बासी शीतल जलका नस्य लेनेसे व्यङ्गरोग, झुर्री पडना, असमय बालोंका पकना, पीनस, स्वरभङ्ग और खाँसी आदि विकार नष्ट होते हैं और दृष्टिशक्ति बढती है ॥ २० ॥
अम्भसः प्रसृतान्यष्टौ रवावनुदिते पिबन् । वातपित्तगदान् हत्वा जीवेद्वर्षशतं नरः ॥ २१ ॥
प्रातःकाल ८ प्रसृत प्रमाण बासी शीतल जलको पीनेसे वात-पित्तसम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं और वह मनुष्य सौवर्षतक जीवित रहता है ॥ २१ ॥