भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें, १३१८ भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-
धात्रीचूर्णस्य कंसं स्वरसमपि शतं क्षौद्रसर्पिः समांशं कृष्णामानीसिताष्टप्रसृतयुतमिदं स्थापितं भस्मराशौ । वर्षान्ते तत्समश्नन्भवति विपुलितो रूपवर्णप्रतापै- र्निर्व्याधिर्बुद्धिमेधास्मृतिवचनबलस्थैर्यसत्त्वैकपेतः ॥ २२ ॥ आंमलोंके चूर्णको एक आढक परिमाण लेकर एक हजार आंमलोंके स्वरसमें २१ बार भावना देवे । फिर उसमें घी १ आढक, शहद १ आढक, पीपलका चूर्ण १ सेर और मिश्री २ सेर डालकर सबको एकत्र एक कर मिट्टीके बर्तनमें भरकर वर्षाऋतुमें राखके ढेरमें गाड देवे । फिर शरदऋतुमें उसको निकालकर सेवन करे । इसके सेवनसे नानाप्रकारकी व्याधियें नष्ट होकर मनुष्य रूप रङ्ग और प्रतापसे युक्त हो अत्यन्त बुद्धिमान्, मेधावान्, स्मृतिमान्, वाक्सिद्ध, बलवान् और स्थिर-वीर्यवाला होता है ॥ २२ ॥
ऋतुहरीतकी ।
सिन्धूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात् । वर्षादिष्वभया सेव्या रसायनगुणैषिणा ॥ २३ ॥ हरडको वर्षाऋतुमें सैंधानमक, शरदऋतुमें चीनी, हेमन्तऋतुमें सोंठके चूर्ण, शिशिरऋतुमें पीपलके चूर्ण, वसन्तऋतुमें शहद और ग्रीष्मऋतुमें गुडके साथ छहों ऋतुओंमें यथाविहित अनुपानोँके साथ सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल पान करे तो इससे जरा और सर्वव्याधि नष्ट होजाती हैं । यह अत्युत्तम रसायन है ॥ २३ ॥
भृङ्गराजादिचूर्ण ।
श्लक्ष्णीकृतं भृङ्गराजस्य चूर्ण तिलाधंर्कं चामलकार्धकं च । सशर्करं भक्षयतो गुडेर्वा न तस्य रोगा न जरा न मृत्युः २४ अन्धः पश्येद्द्रुमनरहितो मत्तमातङ्गगामी भूको वाग्मी श्रवणरहितो दूरशब्दानुसारी । नीरुङ् मर्त्यो भवति पलिती नीलजीमूतकेशो जीर्णा दन्ताः पुनरपि नवाः क्षीरगौरा भवन्ति ॥ २५ ॥ जो भाँगरेका बारीक पिसा चूर्ण एक तोला, तिल छः माशे आंमलोंका चूर्ण ६ माशे इनको एकत्र करके चीनीके अथवा गुडके साथ मिलाकर भक्षण करे तो उसके कोई रोग नहीं होता और न वृद्धावस्था आती है । वह पुरुष