भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1351

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३१९

सदा अमर रहता है। इस रसायनको सेवन करनेसे अन्धा आदमी देखने लगता है, लँगडा आदमी उन्मत्त हाथीकी समान चलने लगता है, गूंगा बोलने लगता है, बहरा दूरके शब्दको सुनने लगता है, पलितरोग नष्ट होता है। मनुष्य नीरोग होकर बादलके समान नीलकेशोंवाला होता है। एवं जीर्ण शीर्ण दाँत फिर नवीन होकर दूधके समान श्वेत होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥

अमृतवर्त्तिका ।

त्रिफलात्रिकटुबाह्मीगुडूचीरक्तचित्रकम् ।
नागकेशरचूर्णं च शृङ्गवेरं समार्कवम् ॥ २६ ॥
सिन्धुवारो हरिद्रे द्वे शक्राशनगुडत्वचौ ।
एला मधुकपर्णी च विडङ्गं चोग्रगन्धिका ॥ २७ ॥
चूर्णं प्रत्येकमेतेषां समादाय पलद्वयम् ।
कामरूपसमुद्भूतैर्गुडैः पञ्चाशता पलैः ॥
सषष्टित्रिशती कार्या वर्त्तिस्तेन समानतः ॥ २८ ॥

हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, ब्राह्मी, गिलोय, लालचीता, नागकेशरका चूर्ण, अदरख, भाँगरा, निर्गुण्डीकी जड, हल्दी, दारुहल्दी, भाँग, दारचीनी, छोटी इलायची, कम्भारी, वायविडङ्ग और वच इन प्रत्येक औषधियोंके आठ आठ तोले चूर्णको लेकर २०० तोले सफेद गुडमें मिलाकर खरल करे, फिर समान भाग मिलित उसकी ३६० बत्तियें बनालेवे ॥ २६-२८ ॥

चन्द्रताराविशुद्धौ च पूजयित्वेष्टदेवताम् ।
सुकृती प्रज्ञया प्रीतो वर्त्तिमेकां तु भक्षयेत् ॥ २९ ॥
ततोऽनुपानं पानीयं सलिलं च सुशीतलम् ।
कट्वम्ललवणं चैव नातिमात्रां कदाचन ॥ ३० ॥
यः प्रत्यहमिदं खादेत्कर्षमानं निरन्तरम् ।
भोजनादौ प्रदोषे वा शृणु यादृक् फलं भवेत् ॥ ३१ ॥

इसके अनन्तर जिस दिन चन्द्रमा और नक्षत्र शुभ हों उस दिन प्रातःकाल अपने इष्टदेवको पूजकर पुण्यकर्मा मनुष्य एक वत्ती भक्षण करे और ऊपरसे शीतल जल पान करे । इस औषधिको सेवन करते समय अत्यन्त चरपरे, खट्टे और नमकीन पदार्थ कदापि सेवन न करे । जो पुरुष प्रतिदिन नियमसे इस औषधिको एक

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