भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२० भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-
कर्ष परिमाण भोजनके पहले अथवा सायंकालमें खाता है तो उसको जो फल प्राप्त होता है वह सुनो ॥ २९-३१ ॥
नष्टवह्निस्तु दीप्ताग्निर्वडवानलसन्निभः । इष्टापि भास्वती कान्तिश्चन्द्रिकेव निशामुखे ॥ ३२ ॥ काशपुष्परुचः केशाः शिखिकण्ठमनोरमाः । पटलावहतं चक्षुर्लक्षयोजनदर्शनम् ॥ ३३ ॥ जराविश्रथदेहोऽपि लेपनिर्माणशाद्वलः । निर्व्याधिर्निर्जरः पङ्गुर्वेगेनोच्चैःश्रवा इव ॥ ३४ ॥
नष्ट हुई अग्नि पुनर्वार दीपन होकर वडवानलकी समान् होजाती है और चन्द्रमाकी चाँदनीकी समान कान्ति होती है, बाल काँसके फूलोंके समान (हैं सो) सुन्दर और मोरके कण्ठकी समान मनोहर होते हैं । एवं पटलरोगसे नष्ट नेत्रोंवाला मनुष्य इसकों सेवन करनेसे ४ लाख कोसतककी वस्तुको देख सकता है । इसका शरीरपर लेप करनेसे बुढापेसे शिथिल देहवाला पुरुष भी हरित-तृणकी समान कांतिमान् हो जाता है और समस्त व्याधियोंसे रहित होकर तरुण होजाता है, लँगडा मनुष्य आरोग्य होकर उच्चैःश्रवा घोडेके समान वेगवान् होता है ॥ ३२-३४ ॥
दिनेश इव तेजस्वी कन्दर्प इव रूपवान् । सहस्रायुर्महासत्त्वो गन्धर्व इव गायनः ॥ ३५ ॥ स्त्रीशतं रमते नित्यं नावसादं व्रजत्यसौ । न भजन्त्यापदः काश्चित्कामरूपी भवेदसौ ॥ ३६ ॥ पद्मगन्धि वपुस्तस्य पुष्पस्येव सुकोमलम् । जराचयैः सुजीर्णस्य नखकेशादयो यथा ॥ ३७ ॥ प्रभवन्ति बलादुग्रादथ कन्दा इवाम्बुदात् । हृष्टः पुष्टश्च पापघ्नः शान्तो भवति मानवः ॥ ३८ ॥
इससे सूर्यके समान तेजस्वी, कामदेवके समान रूपवाला, हजारों वर्षकी आयुवाला, गन्धर्वकी समान गान करनेवाला, प्रतिदिन सैंकडों स्त्रियोंसे रमण करनेपर भी नहीं हारनेवाला, किसी भी आपत्तिको नहीं भोगनेवाला, कामदेवके समान सुन्दर, कमलकेशरकी समान सुगन्धित और फूलके समान कोमल शरीरवाला होता है । बुढापेके कारण सफेद हुए नख और केश इसके उस