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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३१९

सदा अमर रहता है। इस रसायनको सेवन करनेसे अन्धा आदमी देखने लगता है, लँगडा आदमी उन्मत्त हाथीकी समान चलने लगता है, गूंगा बोलने लगता है, बहरा दूरके शब्दको सुनने लगता है, पलितरोग नष्ट होता है। मनुष्य नीरोग होकर बादलके समान नीलकेशोंवाला होता है। एवं जीर्ण शीर्ण दाँत फिर नवीन होकर दूधके समान श्वेत होते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥

अमृतवर्त्तिका ।

त्रिफलात्रिकटुबाह्मीगुडूचीरक्तचित्रकम् ।
नागकेशरचूर्णं च शृङ्गवेरं समार्कवम् ॥ २६ ॥
सिन्धुवारो हरिद्रे द्वे शक्राशनगुडत्वचौ ।
एला मधुकपर्णी च विडङ्गं चोग्रगन्धिका ॥ २७ ॥
चूर्णं प्रत्येकमेतेषां समादाय पलद्वयम् ।
कामरूपसमुद्भूतैर्गुडैः पञ्चाशता पलैः ॥
सषष्टित्रिशती कार्या वर्त्तिस्तेन समानतः ॥ २८ ॥

हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, ब्राह्मी, गिलोय, लालचीता, नागकेशरका चूर्ण, अदरख, भाँगरा, निर्गुण्डीकी जड, हल्दी, दारुहल्दी, भाँग, दारचीनी, छोटी इलायची, कम्भारी, वायविडङ्ग और वच इन प्रत्येक औषधियोंके आठ आठ तोले चूर्णको लेकर २०० तोले सफेद गुडमें मिलाकर खरल करे, फिर समान भाग मिलित उसकी ३६० बत्तियें बनालेवे ॥ २६-२८ ॥

चन्द्रताराविशुद्धौ च पूजयित्वेष्टदेवताम् ।
सुकृती प्रज्ञया प्रीतो वर्त्तिमेकां तु भक्षयेत् ॥ २९ ॥
ततोऽनुपानं पानीयं सलिलं च सुशीतलम् ।
कट्वम्ललवणं चैव नातिमात्रां कदाचन ॥ ३० ॥
यः प्रत्यहमिदं खादेत्कर्षमानं निरन्तरम् ।
भोजनादौ प्रदोषे वा शृणु यादृक् फलं भवेत् ॥ ३१ ॥

इसके अनन्तर जिस दिन चन्द्रमा और नक्षत्र शुभ हों उस दिन प्रातःकाल अपने इष्टदेवको पूजकर पुण्यकर्मा मनुष्य एक वत्ती भक्षण करे और ऊपरसे शीतल जल पान करे । इस औषधिको सेवन करते समय अत्यन्त चरपरे, खट्टे और नमकीन पदार्थ कदापि सेवन न करे । जो पुरुष प्रतिदिन नियमसे इस औषधिको एक

१३२० भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-

कर्ष परिमाण भोजनके पहले अथवा सायंकालमें खाता है तो उसको जो फल प्राप्त होता है वह सुनो ॥ २९-३१ ॥

नष्टवह्निस्तु दीप्ताग्निर्वडवानलसन्निभः । इष्टापि भास्वती कान्तिश्चन्द्रिकेव निशामुखे ॥ ३२ ॥ काशपुष्परुचः केशाः शिखिकण्ठमनोरमाः । पटलावहतं चक्षुर्लक्षयोजनदर्शनम् ॥ ३३ ॥ जराविश्रथदेहोऽपि लेपनिर्माणशाद्वलः । निर्व्याधिर्निर्जरः पङ्गुर्वेगेनोच्चैःश्रवा इव ॥ ३४ ॥

नष्ट हुई अग्नि पुनर्वार दीपन होकर वडवानलकी समान् होजाती है और चन्द्रमाकी चाँदनीकी समान कान्ति होती है, बाल काँसके फूलोंके समान (हैं सो) सुन्दर और मोरके कण्ठकी समान मनोहर होते हैं । एवं पटलरोगसे नष्ट नेत्रोंवाला मनुष्य इसकों सेवन करनेसे ४ लाख कोसतककी वस्तुको देख सकता है । इसका शरीरपर लेप करनेसे बुढापेसे शिथिल देहवाला पुरुष भी हरित-तृणकी समान कांतिमान् हो जाता है और समस्त व्याधियोंसे रहित होकर तरुण होजाता है, लँगडा मनुष्य आरोग्य होकर उच्चैःश्रवा घोडेके समान वेगवान् होता है ॥ ३२-३४ ॥

दिनेश इव तेजस्वी कन्दर्प इव रूपवान् । सहस्रायुर्महासत्त्वो गन्धर्व इव गायनः ॥ ३५ ॥ स्त्रीशतं रमते नित्यं नावसादं व्रजत्यसौ । न भजन्त्यापदः काश्चित्कामरूपी भवेदसौ ॥ ३६ ॥ पद्मगन्धि वपुस्तस्य पुष्पस्येव सुकोमलम् । जराचयैः सुजीर्णस्य नखकेशादयो यथा ॥ ३७ ॥ प्रभवन्ति बलादुग्रादथ कन्दा इवाम्बुदात् । हृष्टः पुष्टश्च पापघ्नः शान्तो भवति मानवः ॥ ३८ ॥

इससे सूर्यके समान तेजस्वी, कामदेवके समान रूपवाला, हजारों वर्षकी आयुवाला, गन्धर्वकी समान गान करनेवाला, प्रतिदिन सैंकडों स्त्रियोंसे रमण करनेपर भी नहीं हारनेवाला, किसी भी आपत्तिको नहीं भोगनेवाला, कामदेवके समान सुन्दर, कमलकेशरकी समान सुगन्धित और फूलके समान कोमल शरीरवाला होता है । बुढापेके कारण सफेद हुए नख और केश इसके उस

अधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३२१

प्रतापसे फिर उत्तम होते हैं जैसे बादलोंके जलसे कन्दलियें हरीभरी होजाती हैं । मनुष्य हृष्टपुष्ट अङ्गवाला, पापरहित और शान्त होता है ॥ ३५-३८ ॥

अमृतवर्त्तिका नाम मृत्युञ्जयमुखोदिता ।
रसायनानां श्रेष्ठेयं सर्वव्याधिनिषूदनी ॥ ३९ ॥

इस अमृतनामवर्त्तिको शिवजीने कहाहै। यह सम्पूर्ण रसायनोंमें श्रेष्ठ रसायन है और सब रोगोंको नाश करनेवाली है ॥ ३९ ॥

श्रीसिद्धमोदक ।

त्रिकटोस्त्रिपलं चूर्णं त्रिफलायाः पलत्रयम् ।
गुडूच्याश्च विडङ्गानां ग्रन्थिकग्रन्थिपर्णयोः ॥ ४० ॥
रक्तचित्राङ्घ्रिजं चूर्णं ग्राह्यं चापि पृथक् पृथक् ।
प्रत्येकं द्विपलं चैषां गृह्णीयान्मतिमान्नरः ॥ ४१ ॥
कामरूपोद्भवा ग्राह्या गुडस्यार्द्धतुला तथा ।
सर्वमेकत्र संमर्द्य सषष्टित्रिशतं शुभम् ॥ ४२ ॥
मोदकं कारयेद्धीमान्समभागेन यत्नतः ।
प्रत्यहं प्रातरेवैतत्पानीयैनैव भक्षयेत् ॥ ४३ ॥

त्रिकुटा ३ पल, त्रिफला ३ पल, गिलोय, वायावेडंग, पीपलमूल, गाँडर दूब और लालचीतेकी जड इन प्रत्येकका चूर्ण दो दो पल और गुड ५० पल लेवे । सबको एकत्र कूटपीसकर बुद्धिमान् वैद्य यथाविधिसे समान भाग मिश्रित तीनसौ साठ लड्डू बनालेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक लड्डू शीतल जलके साथ भक्षण करे ॥ ४०-४३ ॥

एवं निरन्तरं कार्य्यं संवत्सरमतन्द्रितः ।
प्रथमे मासि वाग्युक्तो द्वितीये बलवर्णवान् ॥ ४४ ॥
तृतीये नाशयेत्कुष्ठं श्वासकासौ तुरीयके ।
पञ्चमे स्त्रीप्रियत्वं च षष्ठे च पलितक्षयः ॥ ४५ ॥
सप्तमे कान्तियुक्तश्च अष्टमे बलवान्भवेत् ।
नवमे च शतायुः स्याद्दशमे च स्वरान्वितः ॥ ४६ ॥
महाबलस्त्वेकादशे अदृश्यो द्वादशे भवेत् ।
इच्छाहारविहारी स्यात्ततो दैत्यरिपोः समः ॥ ४७ ॥

१३२२ भैषज्यरत्नावली । [ रसायना-

इस प्रकार जो एक वर्षपर्यन्त निरालस्य हो निरन्तर इनको सेवन करे तो वह मनुष्य एक महीनेमें वाचाल, दूसरेमें बल और वर्णकरके युक्त होता है, तीसरे महीनेमें उसका कुष्ठरोग, चौथेमें श्वास और खांसी रोग नष्ट होते हैं, पाँचवेंमें स्त्रियोंको अत्यन्त प्रिय, छठवेंमें बालोंका पकना दूर होता है, सातवेंमें अत्यन्त शोभायमान, आठवेंमें बलवान्, नवेंमें सौवर्षकी आयुवाला, दसवेंमें सुन्दरस्वरवाला, ग्यारहवेंमें महाबलवान् और बारहवें महीनेमें मुक्त होजाता है। इसपर इच्छानुसार आहार और विहार करनेवाला मनुष्य विष्णुके समान पराक्रमी होता है ॥ ४४-४८ ॥

षडूर्मिरहितो देही प्राप्नोति कल्पजीवितम् ।
युवा निरन्तरं तिष्ठेद्यावत्कालं च जीवति ॥ ४८ ॥
भवन्ति सिद्धयोऽष्टाष्टौ याश्चापि परिकीर्तिताः ।
श्रीसिद्धमोदको ह्येष सिद्धादिसुनिषेवितः ॥ ४९ ॥

एवं वह मनुष्य षड् ऊर्मियोंसे रहित होकर एक कल्पपर्यंत जीता है और जबतक जीता है तबतक जवान बना रहता है। इसको सेवन करनेवाले पुरुषको अष्ट सिद्धियें प्राप्त होती हैं। ये श्रीसिद्धमोदक सिद्धादिकोंने सेवन किये हैं ४८॥४९॥

निर्गुण्डीकल्प।

ॐ सिद्धिः पिङ्गलायोगिनीकथितम् । निर्गुण्डीमूलचूर्ण-
मष्टपलं गृहीत्वा षोडशपलमधुमिश्रितं घृतभाण्डे कृत्वा
शरावेण निबिडलेपनं दत्त्वा मर्दयित्वामासमेकं धान्य-
मध्ये स्थापयेत् । तन्मासमेकं भक्षितमात्रेण नरः कनक-
वर्णो गृध्रदृष्टिः सर्वरोगविवर्जितो वलीपलितहीनः
संवत्सरं खादिते चन्द्रार्कं यावज्जीवेद्धृद्धशुक्रः स्त्रीशतं
कामयितुं क्षमो भवति । शाकाम्लं विहाय यथे-
च्छया भोज्यम् ॥

निर्गुण्डीकी जड़के चूर्णको ३२ तोले लेकर ६४ तोले शहदमें मिलाकर घीके चिकने बासनमें भरदेवे। फिर सकोरेसे उस पात्रके मुखको ढककर और मिट्टीसे उसके सन्धिस्थानोंको बन्द करके उसको एकमहीनेतक धानोंके बीचमें गाडकर रक्खे। फिर उसको निकालकर प्रतिदिन प्रातःकाल उचित मात्रासे निरन्तर एक वर्षतक सेवन करनेवाला मनुष्य सुवर्णके समान वर्णवाला गिद्धकीसी दृष्टि-

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३२३


वाला, सम्पूर्ण रोगोंसे मुक्त, वली और पलितरोगसे रहित, वर्षभरतक सेवन कर- लेनेपर चन्द्र और सूर्य्यकी समान ( कान्तिमान् ) जबतक जीवे तबतक स्थिरवीर्य और सैंकडों स्त्रियोंके भोगनेके समर्थ होता है । इसपर शाक और खट्टे रसवाले पदार्थ त्यागकर अन्यान्य द्रव्योंको यथेच्छ सेवन करे ॥

तच्चूर्णं गोमूत्रेण सह यः पिबति, हन्त्यष्टादश कुष्ठानि पामाविर्चाचकादीनि नाडीव्रणगुल्मशूलप्लीहोदराणि च ॥ तच्चूर्णं तक्रेण सह यः पिबति स सर्वरोगविवर्जितो गृध्रदृष्टिर्वराहबलो वलीपलितवर्जितः पवनवेगो दिव्य- मूर्तिर्भवति । मासद्वयप्रयोगेण पण्डितश्च न संशयः ॥

जो पुरुष निर्गुण्डीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे तो उसके १८ प्रकारके कोढ, खुजली, विचर्चिका, नाडीव्रण, गुल्म, शूल, तिल्ली और उदररोग नष्ट होते हैं । एवं तक्रके साथ सेवन करे तो वह सब प्रकारके रोगोंसे रहित, गिद्धकीसी दृष्टिवाला, शूकरकी समान बलवान्, वली तथा पलितरोगविहीन, वायुके समान वेगवाला और दिव्यमूर्ति होता है । दो महीनेतक इसका सेवन करनेसे धुरन्धर पण्डित होजाता है इसमें सन्देह नहीं । यह निर्गुण्डीकल्प पिङ्गला योगिनीने वर्णन किया है ॥

कार्श्यहरलौह ।

श्वेतापुनर्नवादन्तीवाजिगन्धात्रिकत्रयैः । शतमूलीबालयुक्तैरेभिर्लौहं प्रसाधितम् ॥ ५० ॥ हिनस्ति नियतं कार्श्यमपि भृङ्गरसैः सह । नास्त्यनेन समं लौहं सर्वरोगान्तकं शुभम् ॥ दीपनं बलवर्णाग्निवृष्यदं चोत्तमोत्तमम् ॥ ५१ ॥

सफेद, पुनर्नवा, दन्ती, असगन्ध, हरड, बहेडा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, नागरमोथा, चीता, वायविडङ्ग, श्तावर और खिरेंटी इनको समान भाग और सबके बराबर लोहभस्म लेवे । फिर सबोंको यथाविधि एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करलेवें । इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल भांगरेके रसके साथ नियमपूर्वक सेवन करनेसे मनु- ष्यकी कृशता नष्ट होती है । इस लोहके समान सम्पूर्ण रोगोंको नाश करनेवाला अन्य लोह नहीं है । यह अग्निदीपक, बलवर्णकारक, वीर्यवर्द्धक और अत्युत्तम लोह है ॥ ५० ॥ ५१ ॥

१३२४भैषज्यरत्नावली ।[ रसायन-

अमृतार्णवरस।

सूतभस्म चतुर्भागं लौहभस्म तथाऽष्टकम्।
अभ्रभस्म च षड्भागं गन्धकस्य च पञ्चमम् ॥ ५२ ॥
भावयेत्त्रिफलाक्वाथैस्तत्सर्वं भृङ्गजैर्द्रवैः।
शिग्रुवह्निकटुक्क्वाथैर्भावयेत्सप्तधा पृथक् ॥ ५३ ॥
सर्वतुल्या कणा योज्या गुडैर्भिश्रयं पुरातनैः ॥ ५४ ॥

रससिन्दूर ४ तोले, लोहभस्म ८ तोले, अभ्रकभस्म ६ तोले और शुद्ध गन्धक ५ तोले लेवे। सबको एकत्र पीसकर त्रिफलेके क्वाथ, भाँगरेके रस, सहिजनकी छाल, चीतेकी जड और कुटकी इनके क्वाथमें अलहिदा २ सात बार भावना देवे। फिर उपर्युक्त औषधियोंके चूर्णके बराबर भाग पीपलका चूर्ण और समस्त चूर्णके बराबर पुराना गुड मिलावे ॥ ५२-५४॥

निष्कमात्रं सदा खादेज्जरामृत्युनिवारणम्।
ब्रह्मायुः स्याच्चतुर्मासे रसोऽयममृतार्णवः ॥
कौरण्टकस्य पत्राणि गुडेन भक्षयेदनु ॥ ५५ ॥

इसमेंसे प्रतिदिन चार चार माशे परिमाण सेवन करे और ऊपरसे पीले पियावाँसेके पत्तोंके क्वाथको गुड डालकर पान करे। इसको खानेसे वृद्धता और अकालमृत्यु नहीं होती। इस अमृतार्णवरसको चार महीनेतक सेवन करनेवाला मनुष्य ब्रह्माजीके समान आयुवाला होता है ॥ ५५ ॥


नीलकण्ठरस।

सूतकं गन्धकं लौहं विषं चित्रकपञ्चकम्।
वराङ्करेणुकामुस्तं ग्रन्थेला नागकेशरम् ॥ ५६ ॥
त्रिकटु त्रिफला चैव शुल्वभस्म तथैव च।
एतानि समभागानि द्विगुणो गुड इष्यते ॥ ५७ ॥
सम्मर्द्य वटकं कृत्वा भक्षयेच्चणकोन्मितम्।
कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ॥ ५८ ॥
हिक्कायां ग्रहणीदोषे शोषे पाण्ड्वामये तथा।
मूत्रकृच्छ्रे मूढगर्भे वातरोगे च दारुणे ॥ ५९ ॥

ऽधकारः ] भाषाटीकासहिता । १३२६

नीलकण्ठो रसो नाम ब्रह्मणा निर्मितः पुरा ।
अनुपानविशेषेण सर्वरोगहरो भवेत् ॥ ६० ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, शुद्ध मीठा तेलिया, चीतेकी जड, पद्माख, दारचीनी, रेणुका, नागरमोथा, पीपलामूल, छोटी इलायची, नागकेशर, त्रिकुटा, त्रिफला और ताम्रभस्म ये सब औषधियें समान भाग और सबसे दुगुना पुराना गुड लेवे । सबको एकत्र मर्दन करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इस रसको खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, हिचकी, संग्रहणी, शोथ, पाण्डुरोग, मूत्रकृच्छ्र, मूढगर्भ और दारुण वातरोगोंमें अनुपानभेदसे सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं । इसका नाम नीलकण्ठरस है, इसको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने निर्माण किया है ॥ ५६-६० ॥

महानीलकण्ठरस।
पलैकं नागभस्माथ भावयेत्तिमिपित्ततः ।
तन्नागं सुमृतं स्वर्णं तोलैकं वापि मिश्रयेत् ॥ ६१ ॥
द्विपलं भस्म सूतस्य त्रिपलं मृतमभ्रकम् ।
त्रिपलं लौहभस्माथ सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ६२ ॥
भावयेच्च पृथक्कन्या ब्राह्मी निर्गुण्डिका शमी ।
मुण्डीशतपराच्छिन्नाकोकिलाक्षस्य बीजकैः ॥ ६३ ॥
मुसली वृद्धदार्वाग्निद्रवैरेभिर्भिषग्वरः ।
ततः सञ्चूर्णयेत्सर्वं तुल्यमेकादशाभिधम् ॥
वरायोषाम्बुदवह्र्येलाजातीफललवङ्गकम् ॥ ६४ ॥

सीसेकी भस्मको ४ तोले लेकर तिमिमत्स्यके पित्तमें सातवार भावना देके फिर उस सीसेको १ तोले सुवर्णभस्मके साथ मिलावे ! पश्चात् रससिन्दूर ८ तोले, अभ्रकभस्म १२ तोले और लोहभस्म १२ तोले इन सबको उसके साथ मिलाकर घीग्वार, ब्राह्मी, सिम्हाळु, छोंकर, गोरखमुण्डी, शतावर, गिलोय, तालमखानेके बीज, मुसली, बिधारेके बीज और चीतेकी जड इनके रसमें पृथक् पृथक् क्रमशः सात सात बार भावना देवे । फिर त्रिफला, त्रिकुटा, नागरमोथा, चीता, इलायची, जायफल और लौंग इन ग्यारहों औषधियोंका समान भाग मिश्रित चूर्ण उपर्युक्त चूर्णके बराबर भाग लेकर मिलादेवे ॥ ६१-६४ ॥

पूजयेद् वृषपुष्पाद्यैर्नीलकण्ठं महेश्वरम् ।
द्विगुञ्जं भक्षयेदस्य मृत्युञ्जयमनुस्मरन् ॥ ६५ ॥

१३२६ भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-

क्षयमेकादशविधं ग्रहणीं रक्तपित्तकम् । विविधान्वातजारोगाँश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ॥ ६६ ॥ हन्ति सर्वामयानेव कामिनीनां शतं व्रजेत् । एकविंशतिरात्रार्द्धं परिहार्यं त्यजेदिह ॥ ६७ ॥ यथेष्टाहारचेष्टो हि कन्दर्पसदृशो नरः । मेधावी बलवान्प्राज्ञो बह्वाशी भीमविक्रमः ॥ ६८ ॥ पुत्रार्थिनी तथा नारी सैव पुत्रं प्रसूयते ॥ अस्य सूतस्य माहात्म्यं वेत्ति शम्भुर्न चापरः ॥ ६९ ॥

तदनन्तर प्रथम अडूसेके फूलोंसे प्रातःकाल मृत्युञ्जयमहादेवको पूजकर और उनका ध्यान कर इस रसकी दो रत्ती प्रमाण मात्राको भक्षण करे। इसके सेवनसे ग्यारह प्रकारका क्षय, संग्रहणी, रक्तपित्त, अनेक प्रकारके वातज रोग, ४० प्रकारके पित्तज रोग और इनके अतिरिक्त अन्यान्य सर्वप्रकारके रोग नष्ट होते हैं। इससे सैंकड़ों स्त्रियोंको भोगनेकी शक्ति उत्पन्न होती है। इसपर ग्यारह दिनतक परहेज करके पश्चात् यथारुचि आहार और विहार करे तो मनुष्य कामदेवके समान सुन्दर, मेधावान्, बलवान्, विद्वान्, बहुभोजी और भीमके समान पराक्रमी होता है। पुत्रकी इच्छा करनेवाली स्त्री इसको सेवन करनेसे पुत्रको उत्पन्न करती है। इस रसके माहात्म्यको शिवजीके सिवा और कोई नहीं जानता ॥ ६६–६९ ॥

मकरध्वजरसायन ।

स्वर्णस्य भागौ वङ्गं च मौक्तिकं कान्तलौहकम् । जातीकोषफले रूप्यं कांस्यकं रससिन्दुरम् ॥ ७० ॥ प्रवालं कस्तुरी चन्द्रमभ्रकं चैकभागिकम् । स्वर्णसिन्दूरतो भागांश्चतुरः कल्पयेद्बुधः ॥ ७१ ॥

सुवर्णकी भस्म २ तोले एवं वङ्ग, मोती, कान्तलोह, जावित्री, जायफल, रूपा, काँसा, रससिन्दूर, मूँगा, कस्तूरी, कपूर और अभ्रक ये प्रत्येक औषधि एक एक तोला और स्वर्णसिन्दूर ४ तोले लेवे। इन सबको जलके द्वारा उत्तम प्रकारसे एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर यथोचित अनुपानके साथ प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली सेवन करे ॥ ७० ॥ ७१ ॥

नातः परतरः श्रेष्ठः सर्वरोगनिषूदनः । सर्वलोकहितार्थाय शिवेन परिकीर्त्तितः ॥ ७२ ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३२७


सब प्रकारके रोगोंको नष्ट करनेके लिये इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है। सर्व प्राणियोंके कल्याणके निमित्त शिवजीने इस रसको कहा है। ७२॥

बृहत्पूर्णचन्द्ररस ।

द्विकर्षं शुद्धसूतं तु गन्धकं च द्विकार्षिकम् ।
लौहभस्म पलं चैकं जारिताभ्रं पलांशिकम् ॥ ७३ ॥
द्वितोलं रजतं चैव वङ्गभस्म द्विकार्षिकम् ।
सुवर्णं तोलकं चैव ताम्रं कांस्यं च तत्समम् ॥ ७४ ॥
जातीफलं चेन्द्रपुष्पमेला भृङ्गं च जीरकम् ।
कर्पूरं वनितां मुस्तं कर्षं दद्यात्पृथक् पृथक् ॥ ७५ ॥
सर्वं खल्लतले क्षिप्त्वा कन्यारसविमर्दितम् ।
भावयित्वा वरातोयै रुबूकानां रसैस्तथा ॥ ७६ ॥
एरण्डपत्रैः संवेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् ।
उद्धृत्य मर्दयित्वा तु वटिकां चणसंमिताम् ॥ ७७ ॥

शुद्ध पारा दो कर्ष, शुद्ध गन्धक दो कर्ष, लोहभस्म एक पल, अभ्रकभस्म एक पल, चाँदी दो तोले, वङ्गभस्म दो कर्ष, सोना एक तोला, ताँबा एक तोला, काँसा एक तोला, जायफल, लौंग, इलायची, दारचीनी, जीरा, कपूर, फूलप्रियंगु और नागरमोथा ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष लेवे। फिर सबको खरलमें डालकर घीग्वारके रसद्वारा घोटकर त्रिफलेके क्वाथ और अण्डीकी जडके रसमें सातबार भावना देवे। पश्चात् अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंके ढेरमें गाडकर तीन दिनतक रक्खे। फिर उसको निकालकर और पीसकर उसकी चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ७३–७७ ॥

खादेच्च वटिकामेकां पर्णखण्डेन संयुताम् ।
सर्वव्याधिविनाशाय काशिराजेन भाषितः ॥ ७८ ॥
पूर्णचन्द्ररसो नाम्ना सर्वरोगेषु योजयेत् ।
बल्यो रसायनो वृष्यो वाजीकरण उत्तमः ॥ ७९ ॥

इसकी प्रतिदिन एक गोली पानके साथ खावे तो सब रोग नष्ट होते हैं। सम्पूर्ण आधिव्याधियोंको नष्ट करनेके लिये शिवजीने यह औषधि कही है। इसको पूर्णचन्द्ररस कहते हैं। यह सब रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये। यह रस बलकारक, वीर्यवर्द्धक और उत्तम वाजीकरण है ॥ ७८ ॥ ७९ ॥

१३२८ ] । भैषज्यरत्नावली रसायन-

अयमष्ठीलिकां हन्ति कासं श्वासमरोचकम् ।
आमशूलं कटीशूलं हृच्छूलं पंक्तिशूलकम् ॥ ८० ॥
अग्निमान्द्यमजीर्णं च ग्रहणीं चिरजामपि ।
आमवातमम्लपित्तं भगन्दरमपि द्रुतम् ॥ ८१ ॥
कामलां पाण्डुरोगं च प्रमेहं वातशोणितम् ।
वातं बहुविधं चैव मन्दाग्नित्वं वमिं भ्रमिम् ॥
नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यते वाजिकर्मणि ॥ ८२ ॥

यह रस अष्ठीला, खाँसी, श्वास अरुचि, आमशूल, कटिशूल, हृदयशूल, पंक्तिशूल, मन्दाग्नि, अजीर्ण, बहुत पुरानी संग्रहणी, आमवात, अम्लपित्त, भगन्दर, कामला, पाण्डुरोग, प्रमेह, वातरक्त, नानाप्रकारके वातरोग, वमन, भ्रम और अग्निकी हीनतादि विकारोंको तत्काल नष्ट करता है । वाजीकरण औषधियोंमें इससे बढकर अन्य कोई औषधि नहीं है ॥ ८०–८२ ॥

महालक्ष्मीविलासरस ।

पलं वज्राभ्रचूर्णस्य तदर्द्धं गन्धकं भवेत् ।
तदर्द्धं वङ्गभस्मापि तदर्द्धं पारदं तथा ॥ ८३ ॥
तत्समं हरितालं च तदर्द्धं ताम्रभस्मकम् ।
रसतुल्यं च कर्पूरं जातीकोषफले तथा ॥ ८४ ॥
वृद्धदारकबीजं च बीजं स्वर्णफलस्य च ।
प्रत्येकं कार्षिकं भागं मृतस्वर्णं च शाणकम् ॥
निष्पिष्य वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ॥ ८५ ॥
निहन्ति सन्निपातोत्थान् गदान् घोरांश्चतुर्विधान् ।
वातोत्थान्पैत्तिकांश्चैव नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥८६॥

वज्राभ्रककी भस्म चार तोले, शुद्धगन्धक दो तोले, वङ्गभस्म एक तोला, शुद्ध पारा ६ माशे, हरिताल ६ माशे, ताम्रभस्म ३ माशे कपूर ६ माशे तथा जावित्री और जायफल छः मासे, विधारेके बीज धतूरेके बीज प्रत्येक एक एक कर्ष और सोनेकी भस्म चार माशे सबको एकत्र कूटपीसकर पानके रस द्वारा खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह रस सन्निपातसे उत्पन्नहुए घोररोग तथा वात, पित्त, कफ और द्वन्द्वजादि चारों प्रकारके विकारोंसे उत्पन्नहुए रोगोंको नष्ट करता है । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं है ॥ ८३–८६

ऽविकारः ] | भाषाटीकासहिता । | १३२९


कुष्ठमष्टादशाख्यं च प्रमेहान्विंशतिं तथा ॥ ८७ ॥ नाडीव्रणं व्रणं घोरं मूत्रामयभगन्दरम् । श्रीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसाश्रितं च यत् ॥ ८८ ॥ मेदोगतं धातुगतं चिरजं कुलसम्भवम् । गलशोथमन्त्रवृद्धिमतीसारं सुदारुणम् ॥ ८९ ॥ आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् । उदरं कर्णनासाक्षिमूखवैकृत्यमेव च ॥ ९० ॥ कासपीनसयक्ष्मांशः स्थौल्यदौर्गन्ध्यनाशनः । सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीणां गदनिषूदनः ॥ ९१ ॥

यह अठारह प्रकारके कोढ, २० प्रकारके प्रमेह, नासूर, घोर व्रण, मूत्रकृच्छ्र, भगन्दर, श्लीपद, कफ-वातजन्य रोग, रक्त और मांसगत रोग, मेदागत, धातुगत, कुलपरम्परासे होनेवाले बहुत पुराने रोग, गलेके रोग, सूजन, अन्त्रवृद्धि, दारुण अतीसार, सब प्रकारकी आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलग्रह, उदर, कर्ण, नासिका, नेत्र और मुखके रोग, खाँसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, स्थूलता, दुर्गन्धि, सब प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रियोंके सब रोगोंको बहुत शीघ्र दूर करता ह ॥ ८७-९१ ॥

वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ ९२ ॥ वारितक्रसुरासीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्शी न च शुक्रस्य संक्षयः ॥ ९३ ॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्वताम् । नित्यं स्त्रीणां शतं गच्छेदन्मत्तवारणविक्रमः ॥ ९४ ॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकः परः । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽ नारदेन महात्मना ॥ ९५ ॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवे जगत्पतौ । प्रसादादस्य भगवान् लक्षनारीषु वल्लभः ॥ ९६ ॥

प्रतिदिन प्रातःकाल जठराग्निके बलानुसार इसकी एक गोली भक्षण करें और मांस, पिठ्ठी, दूध, दही, जल, मट्ठा, मदिरा और सीधुनामक काँजी इनके

८४

१३३० भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-

अनुपानरूपसे सेवन करे । इससे वृद्ध पुरुष भी कामदेवके समान स्वरूपवान् हो स्त्रियोंमें रमण करता है, वीर्य्यका नाश, लिंगकी शिथिलता नहीं होती तथा बाल पक्कावस्थाको कभी प्राप्त नहीं होते । मनुष्य उन्मत्त हाथीके समान पराक्रमी होकर सैंकडों स्त्रियोंको प्रतिदिन भोगता है । दो लाख योजनकी वस्तुको देखनेकी दृष्टि-शक्ति और अत्यन्त पुष्टि होती है । इस महालक्ष्मीविलासरसनामक प्रयोगराजको महात्मा नारदने जगत्पति भगवान् कृष्णचन्द्रसे वर्णन किया है । इसीके प्रतापसे भगवान् कृष्णचन्द्र एकलाख स्त्रियोंमें सर्वप्रिय हुए थे ॥

वसन्तकुसुमाकररस ।

द्विभागं हाटकं चन्द्रं त्रयो वङ्गाहिकान्तकाः ।
चतुर्भागं शुभ्रमभ्रं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥ ९७ ॥
भावयेद्गव्यदुग्धेन भावनेक्षुरसेन च ।
वासालाक्षारसोदीच्यरस्ताकन्दप्रसूनकैः ॥ ९८ ॥
शतपत्ररसेनैव मालत्याः कुङ्कुमोदकैः ।
पश्चान्मृगमदैर्भाव्यं सुगन्धिरससम्भवैः ॥ ९९ ॥

सोनेकी भस्म और चाँदीकी भस्म प्रत्येक दो दो तोले, वंग, सीसा और लोहा इनकी भस्म तीन तीन तोले, श्वेत अभ्रक, मूँगा और मोतीकी भस्म चार चार तोले लेवे। फिर सबको एकत्र पीसकर गौके दूध, ईखके रस, अडूसेकी छालके रस, लाखके क्वाथ और सुगन्धवालाके क्वाथ, केलेकी जडके रस, मोचरस, कमलके रस मालतीके फूलोंके रस, केशरके जल और कस्तूरीके क्वाथमें यथाक्रमसे अलग अलग सात सात बार भावनादेवे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे ॥

कुसुमाकरविख्यातो वसन्तपदपूर्वकः ।
गुञ्जाद्वयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ १०० ॥
मेहघ्नः कान्तिदश्चैव कामदः पुष्टिदस्तथा ।
वलीपलितनाशश्च श्रुतिभ्रंशं विनाशयेत् ॥ १०१ ॥
पुष्टिदो बल्य आयुष्यः पुत्रप्रसवकारणम् ।
प्रमेहान्विंशतिं चैव क्षयमेकादशं तथा ॥
तथा सोमरुजं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ २ ॥

इसको वसन्तकुसुमाकररस कहते है । इसकी प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक मिश्री, शहद और घीके साथ मिलाकर सेवन करे तो यह प्रमेहको नाश

अधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३१

करता है, शरीरमें कान्ति, काम और पुष्टि करता है, वली और पलितरोग तथा बह- रेपनको नष्ट करता है एवं पुष्टिके देनेवाला, बलकारक, वीर्यवर्द्धक और पुत्रको उत्पन्न करनेवाला है। बीस प्रकारके प्रमेह, ग्यारह प्रकारके क्षय तथा साध्य अथवा असाध्य सोमरोगको यह रस तत्काल नाश करता है ॥ १००-२ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां रसायनाधिकारः ॥

अथ वाजीकरणाधिकारः ।

येन नारीषु सामर्थ्यं बाजिवल्लभते नरः ।
व्रजेच्चाप्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ १ ॥
जिस औषधिके द्वारा मनुष्य स्त्रियोंमें घोडेके समान रमण करनेकी सामर्थ्यको पाता है और बार बार मैथुन करता है तथा जिसके द्वारा अधिक वीर्य उत्पन्न हों उसको वाजीकरण कहते हैं ॥ १ ॥

चिन्तया जरया शुक्रं व्याधिभिः कर्मकर्षणात् ।
क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चातिनिषेवणात् ॥ २ ॥
अधिक चिन्ता, बुढापा, रोग, दुःखदायी कर्म, लंघन और अधिक स्त्रीप्रसंग करना इत्यादि कारणोंसे वीर्य नष्ट होजाता है ॥ २ ॥

अतिव्यवायशीलो यो न च वृष्यक्रियारतः ।
ध्वजभङ्गमवाप्नोति स शुक्रक्षयहेतुकम् ॥ ३ ॥
जो मनुष्य अधिकतर मैथुन करता है रसायन एवं वाजीकरण औषधि नहीं खाता है तो वह अधिक वीर्यके क्षय होनेके कारण नपुंसकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

ग्लानिः कम्पोऽवसादस्तदनु च कृशता क्षीणता चेन्द्रियाणां
शोपोच्छ्वासोपदेशज्वरगुदजगदाः क्षीणता सर्वधातौ ।
जायन्ते दुर्निवाराः पवनपरिभवाः क्लीबता लिङ्गभङ्गो
वामा वश्यात्तियोगाद्व्रजत इह सदा वाजिकर्मच्युतस्य ॥४॥
अत्यन्त स्त्रीप्रसङ्ग करनेके कारण वीर्य नष्ट होजानेपर वाजीकरण औषधि सेवन न करनेसे मनुष्यके शरीरमें ग्लानि, कम्प, खेद, दुर्बलता, इन्द्रियोंकी शिथिलता, शोथ, उच्छ्वास, उपदंश, ज्वर, गुदाके रोग सम्पूर्ण धातुओंमें क्षीणता और दारुण वातरोग तथा नपुंसकता और लिंगनाश प्रभृति विकार उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥

१३३२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा—

यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु । हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद् वृष्यमुच्यते ॥ ५ ॥ जो मीठी, चिकनी, आयुकारक, वीर्यवर्द्धक, गुरुपाकी और मनको प्रसन्न करने- वाली वस्तु होती है उसको वृष्य कहते हैं ॥ ५ ॥

नरो वाजीकरान् योगान्सम्यक् शुद्धो निरामयः । सप्तत्यन्तं प्रकुर्वीत वर्षादूर्ध्वं तु षोडशात् ॥ ६ ॥ आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति । न च वै षोडशादर्वाक् सप्तत्याः परतो न च ॥ ७ ॥ वस्थ और वमन, विरेचनादि करके शुद्ध शरीरवाला मनुष्य सोलह वर्षका अव- स्थासे लेकर सत्तर वर्षकी अवस्थातक वाजीकरण औषधियोंको यथाविधि सेवन करे तो वह मनुष्य दीर्घायु और स्त्रियोंके साथ रमण करने योग्य होता है । सोलह वर्षसे कम उम्रवाले बालकको और सत्तर वर्षके पीछे वृद्ध मनुष्यको वाजीकरण औषधि सेवन नहीं करनी चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥

भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च । गीतं श्रोत्राभिरामाश्च वाचः स्पर्शसुखास्तथा ॥ ८ ॥ कामिनी सान्द्रतिलका कामिनी नवयौवना । गीतं श्रोत्रमनोज्ञं च ताम्बूलं मदिराः स्रजः ॥ ९ ॥ गन्धा मनोज्ञरूपाणि चित्राण्युपवनानि च । मनसश्चाप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥ १० ॥ तृप्तिजनक और बलकारक नाना प्रकारके भोज्य और पानीय द्रव्योंका सेवन, कानोंको प्रिय लगनेवाले गीत, स्त्रियोंके प्रिय वाक्य, स्त्रियोंका सुखपूर्वक स्पर्श, तिल- कको धारण करनेवाली नौजवान, स्त्रीके साथ प्रसङ्ग, मनोहर और कर्णप्रिय गान, ताम्बूलभक्षण, मदिरापान, सुगन्धित मालायें धारण करना, मनोरम और चित्रवि- चित्र पुष्पोंसे युक्त बगीचेमें भ्रमण एवं मनके खेदको हरनेवाले साधन ये सब मनुष्यको वाजीकरणके लिये प्रयोग करनी चाहिये ॥ ८–१० ॥

योगान्संसेव्य वृष्यांस्तदुपरि च पयः शीतलं चाम्बु पीत्वा गच्छेन्नारीं रसज्ञां स्मरशरतरुणीं कामुकः काममाद्ये । यामे हृष्टः प्रहृष्टां व्यपगतसुरतस्तत्समुत्पाद्य सद्यः । कान्तः कान्ताङ्गसङ्गान्महदपि न च वै धातुवैषम्यमेति ॥११॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३३

वाजीकरण औषधियोंको सेवन करके दूध और शीतल जल पान करे, फिर कामदेवके बाणोंसे विद्ध और रसको जाननेवाली नवयौवना तथा प्रसन्न चित्तवाली सुन्दरीको कामी पुरुष आनन्दसे एक प्रहरतक भोगे । जब मैथुन करते २ ग्लानि उत्पन्न होजाय तब वह पुरुष स्त्रीके अङ्गपर अङ्ग रखकर शयन करे । इस प्रकार करनेसे धातुवैषम्य नहीं होता ॥ ११ ॥

सुरूपा यौवनस्था च लक्षणैर्यदि भूषिता ।
वयस्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता १२॥

जो स्त्री सुन्दर, जवान, शुभलक्षण और आभूषणोंसे सुसज्जित, थोडी अवस्थावाली और सुशिक्षित होती है उसको वृष्यतमा कहते हैं ॥ १२ ॥

विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् ।
नराणां बहुभार्याणां विधिर्वाजीकरो हितः ॥ १३ ॥
स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् ।
योषित्प्रसङ्गात्क्षीणानां क्लीबानामल्परेतसाम् ॥ १४ ॥
हिता वाजीकरा योगाः प्रीणयन्ति बलप्रदाः ।
एतेऽपि पुष्टदेहानां सेव्याः कालाद्यपेक्षया ॥ १५ ॥

जो पुरुष विलासी, धनाढ्य, रूप तथा यौवनसे सम्पन्न और जो बहुतसी स्त्रियोंवाले हों उनको वाजीकरणविधि हितकारी है । एवं जो वृद्ध तथा स्त्रीके अभिलाषी, स्त्रियाक प्रिय होनेकी इच्छा करनेवाले, अधिक स्त्रीप्रसङ्गसे अथवा वीर्यके नष्ट होनेसे क्षीणदेहवाले, नपुंसक और अल्पवीर्यवाले जो पुरुष हैं उनको वाजीकरण प्रयोग विशेष हितकर, प्रीतिकर और बलप्रद होते हैं । हृष्टपुष्ट शरीरवाले मनुष्योंको भी ये वाजीकर प्रयोग देश, काल और मात्रानुसार सेवन करने चाहिये ॥१३-१५॥

घृतभृष्टमाषद्विदलं दुग्धसिद्धं च शर्कराविमिश्रम् ।
भुक्त्वा सदैव कुरुते तरुणीशतमैथुनं पुरुषः ॥ १६ ॥

उरदकी दालको घीमें भूनकर दूधमें पकाकर उसमें चीनी मिलाकर भक्षण करनेसे मनुष्य निरन्तर सौ स्त्रियोंके साथ प्रसङ्ग करनेको समर्थ होता है ॥ १६ ॥

शतावरीशृतं क्षीरं प्रपिबेत्सितया युतम् ।
रममाणस्य विरतिं मृदुतां याति नेन्द्रियम् ॥ १७ ॥

१३३४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-


शतावरको १ तोला ले ८ तोले दूध और ३२ तोले जलमें पकावे । जब पकते २ दूधमात्र शेष रहजाय तब उसको उतारकर शीतल करके मिश्री डालकर पान करे तो इससे अत्यन्त स्त्रीप्रसङ्ग करनेवाले मनुष्यकी इन्द्रिय शिथिल नहीं होती ॥ १७ ॥

वृद्धशाल्मलिमूलस्य रसं शर्करया समम् ।
प्रयोगादस्य सप्ताहाज्जायते रेतसोऽम्बुधिः ॥ १८ ॥
पुराने सेमलके वृक्षकी जडके रसको चीनी मिलाकर ७ दिनतक सेवन करनेसे वीर्यकी जलके समान वृद्धि होती है ॥ १८ ॥

लघुशाल्मलिमूलेन तालमूलीं सुचूर्णिताम् ।
सर्पिषा पयसा पीते रतौ चटकवद्भवेत् ॥ १९ ॥
छोटे छोटे सेमलके पौधोंकी जडका चूर्ण और मुसली इन दोनोंको समान भाग ले एकत्र कूटपीसकर घृत और दूधके साथ पान करनेसे चिरौंटेके समान रतिशक्ति बढती है ॥ १९ ॥

विदारीकन्दचूर्णं च घृतेन पयसा पिबेत् ।
उडुम्बररसेनैव वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ २० ॥
विदारीकन्दके चूर्णको घी, दूध और गूलरके रसके साथ मिलाकर सेवन करनेसे वृद्ध मनुष्य भी तरुण होता है ॥ २० ॥

सप्तधाऽऽमलकीचूर्णमामलक्यम्बुभावितम् ।
घृतेन मधुना लीढ्वा पिबेत्क्षीरपलं नरः ॥ २१ ॥
आमलॉके चूर्णको आमलोंकेही रसमें सात बार भावना देकर घृत और मधुके साथ प्रतिदिन भक्षण करे और पीछेसे ४ तोले गोदुग्ध पीवे तो कामशक्ति बढती है ॥ २१ ॥

अत्यन्तमुष्णकटुतिक्तकषायमम्लं क्षारं च शाकमथवा लवणाधिकं च ।
कामी सदैव रतिमान्वनिताभिलाषी नो भक्षयेदिति समस्तजनप्रसिद्धिः ॥ २२ ॥
अत्यन्त गरम, चरपरे, तीखे, कषैले, खट्टे और क्षाररसवाले पदार्थ, शाक अथवा अधिक परिमाणमें लवण इन पदार्थोंको कामी पुरुष कदापि सेवन न करे । क्योंकि ये सब रतिशक्तिका ह्रास करनेवाले हैं ॥ २२ ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३५

पिप्पलीलवणोपेतौ बस्ताण्डौ क्षीरसर्पिषा ।
साधितौ भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत्प्रमदाशतम् ॥ २३ ॥

जो बकरेके दोनों अण्डकोषोंको दूधमें पकाकर और घृतमें भूनकर पीपलका चूर्ण और सैंधानमक मिलाकर भक्षण करे तो वह सौ स्त्रियोंको भोगनेके लिये समर्थ होता है ॥ २३ ॥

बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ।
यः खादेत्स नरो गच्छेत्स्त्रीणां शतमपूर्ववत् ॥ २४ ॥

जो पुरुष बकरेके अण्डकोषोंके द्वारा सिद्ध कियेहुए दूधमें भूसीरहित तिलोंको सातवार भावना देकर, भक्षण करे तो वह सैंकडों स्त्रियोंमें गमन करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ २४ ॥

चूर्णं विदार्याः सुकृतं तद्रसेनैव भावितम् ।
सर्पिःक्षौद्रयुतं भुक्त्वा शतं गच्छेद्वराङ्गनाः ॥ २५ ॥

विदारीकन्दके चूर्णको उसके ही स्वरसमें ७ बार उत्तमप्रकार भावना देकर घी, दूधके साथ मिलाकर सेवनसे मनुष्य सैंकडों स्त्रियोंको भोगनेवाला होता है ॥

एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीढ्वा पयः पिबेत् ॥
एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति ॥ २६ ॥

आंमलोंके चूर्णको आमलोंके ही स्वरसमें भावना देकर खाँड, शहद और घीके साथ मिलाकर चाटे, ऊपरसे दूध पिये तो इससे अस्सीवर्षका बुढा आदमी भी युवाकी समान आनन्दको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥

विदारीकन्दकल्कं तु घृतेन पयसा नरः ।
उडुम्बरसमं खादेद् वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ २७ ॥

विदारीकन्द और गूलर इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर कल्क बनालेवे । फिर घृत और दूधके साथ उक्त कल्कको भक्षण करे तो वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान रमण करता है ॥ २८ ॥

स्वयंगुप्तेक्षुरकयोर्बीजं समधुशर्करम् ।
धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं व्रजेत् ॥ २८ ॥

कौंछके बीजोंका चूर्ण और तालमखानेके चूर्णको समभाग लेकर शहद और चीनी तथा धारोष्ण दूधके साथ मिलाकर पान करनेसे वीर्य क्षीण नहीं होता है ॥

१३३६ | भैषज्यरत्नावली । | [वाजीकरणा-

उच्चटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममुच्यते ।
शतावर्युच्चटाचूर्णं पेयमेवं सुखार्थिना ॥ २९ ॥
केवल उच्चटाके चूर्णको अथवा उच्चटा और शतावरके चूर्णको एकत्र मिलाकर सुखकी इच्छा करनेवाला मनुष्य दूधके साथ पान करे तो वीर्यवृद्धि होती है ॥

कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमन्वितम् ।
पयोऽनुपानं यो लिह्यान्नित्यवेगः समो भवेत् ॥ ३० ॥
मुलहठीके १ कर्ष चूर्णको घी और शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दूध पीवे तो प्रतिदिन कामशक्ति प्रबल होती है ॥ ३० ॥

आर्द्राणि मत्स्यमांसानि शफरीर्वा सुभर्जिताः ।
तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्त्रीषु न क्षयम् ॥३१॥
जो मनुष्य गीले मांस मछली अथवा शफरीमछलीको घृतमें भूनकर भक्षण करे तो उसके स्त्रीसहवास करनेपर भी वीर्य क्षय नहीं होता ॥ ३१ ॥

गोक्षुराद्यचूर्णं ॥
गोक्षुरकः क्षुरकः शतमूली वानरिनागबलाऽतिबला च ।
चूर्णमिदं पयसा निशि पेयं यस्य गृहे प्रमदाशतमस्ति ॥३२॥
जिसके घरमें सौ स्त्रियें हों वह मनुष्य गोखुरू, तालमखाना, शतावर कौंछ, गंगेरन, कंघी इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको दूधके साथ रात्रिमें सेवन करे ॥

नरसिंहचूर्णं ।
शतावरीरजः प्रस्थं प्रस्थं गोक्षुरकस्य च ।
वाराह्या विंशतिपलं गुडूच्याः पञ्चविंशतिः ॥ ३३ ॥
भल्लातकानां द्वात्रिंशच्चित्रकस्य दशैव तु ।
तिलानां शोधितानां च प्रस्थं दद्यात्सुचूर्णितम् ॥ ३४ ॥
त्र्यूषणस्य पलान्यष्टौ शर्करायाश्च सप्ततिः ।
माक्षिकं शर्कराद्धेन माक्षिकाद्धेन वै घृतम् ॥ ३५ ॥
शतावरीसमं देयं विदारीकन्दजं रजः ।
एतदेकीकृतं चूर्ण स्निग्धभाण्डे निधापयेत् ॥ ३६ ॥
शतावरका चूर्ण १ प्रस्थ, गोखुरूका चूर्ण १ प्रस्थ, वाराहीकन्द २० पल, गिलोय २५ पल, भिलावे ३२ पल, चीता १० पल, धुले हुए तिलोंका चूर्ण

ऽधिकारः ]भाषाटीकासहिता ।१३३७

१ प्रस्थ, त्रिकुटा ८ पल, चीनी ७० पल, शहद ३५ पल, घी १७॥ पल और विदारीकन्दका चूर्ण एक प्रस्थ लेवे । इस सबको एकत्र मिलाकर घीके चिकनें बर्त्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ३३-३६॥

पलार्द्धमुपयुञ्जीत यथेष्टं चापि भोजनम् ।
मासैकमुपयोगेन जरां हन्ति रुजामपि ॥ ३७ ॥
वलीपलितखालित्यमेहपाण्ड्वाढ्यपीनसान् ।
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि तथाऽष्टावुदराणि च ॥ ३८ ॥
भगन्दरं मूत्रकृच्छ्रं गृध्रसीं च हलीमकम् ।
क्षयं चैव महाव्याधिं पञ्च कासान्सुदारुणान् ॥ ३९ ॥
अशीतिं वातजात्रोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव संसृष्टान्सान्निपातिकान् ॥
सर्व्वानर्शोगदान्हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ४० ॥
स काञ्चनाभो मृगराजविक्रमस्तुरङ्गमं चाप्यनुयाति वेगतः ।
स्त्रीणां शतं गच्छति सोऽतिरेकं प्रहृष्टपुष्टश्च यथा विहङ्गः ४१
पुत्रान्सञ्जनयेद्धीमान् नरसिंहनिभांस्तथा ।
नरसिंहमिदं चूर्णं सर्वरोगहरं नृणाम् ॥ ४२ ॥

फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इसमेंसे दो दो तोले प्रमाण सेवन करे और यथेच्छ आहार विहार करे । इस प्रकार एक महीनेतक सेवन करनेसे यह चूर्ण सब प्रकारके रोगों और बुढापेको तथा वली, पलितरोग, गञ्ज, प्रमेह, पाण्डुरोग, आढ्यवात, पीनस, अठारह प्रकारके कुष्ठ, आठ प्रकारके उदररोग, भगन्दर मूत्रकृच्छ्र, गृध्रसीवात, हलीमक, अत्यन्त भयङ्कर क्षयरोग, पाँच प्रकारकी दारुण खाँसी, अस्सी प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग, बीस प्रकारके कफ-रोग, द्वन्द्वज, त्रिदोषजरोग और सर्वप्रकारके अर्शरोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जिस प्रकार वज्रपात वृक्षोंको तत्काल नाश करदेता है । इस चूर्णके प्रभावसे मनुष्य सुवर्णके समान कान्तिमान्, सिंहके समान पराक्रमी, घोडेके समान वेगसे चलने-वाला, सैकड़ों स्त्रियोंको भोगनेवाला, बलवान् और गरुडके समान हृष्टपुष्ट होताहै । एवं बुद्धिमान् पुरुष नृसिंहके समान शोभायमान पुत्रोंको उत्पन्न करता है । यह नरसिंहनामक चूर्ण मनुष्योंके सब रोगोंको हरनेवाला है ॥ ३७-४२॥

१३३८ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-


कामदीपक ।

सितं पुनर्नवामूलं शाल्मलीरसभावितम् ।
शाल्मलीसत्त्वनिर्यासं दद्यात्तत्र समं समम् ॥ ४३ ॥
गन्धकं सर्वतुल्यं च भक्षयेच्छाणमात्रकम् ।
अनुपानं प्रकुर्वीत ततः क्षीरं पलद्वयम् ॥ ४४ ॥
अयं चण्डालिनीयोगोऽगम्याप्यत्र हि गम्यते ।
निषेधान्निधनं याति करणात्कामरूपधृक् ॥ ४५ ॥

सफेद पुनर्नवेकी जडका चूर्ण और मोचरस इन दोनोंको समान भाग और दोनोंके बराबर भाग शुद्ध गन्धक लेवे, फिर सब चूर्णको एकत्र मिलाकर सेमलके रसमें सात बार भावना देवे । इसको प्रतिदिन चार चार माशेकी मात्रासे भक्षण करे और ऊपरसे आठ तोले प्रमाण गोदुग्धका अनुपान करे । यह चंडालिनीयोगों अगम्यास्त्रीसे भी गमन करता है और स्त्रीसेवन न करनेसे मृत्यु होती है एवं सेवन करनेसे कामदेवके समान रूपलावण्य करके युक्त होता है ॥


कामधेनु ।

गन्धमामलकं चूर्णं धात्रीरसविभावितम् ।
सप्तधा शाल्मलीतोयैः शर्करामधुयोजितम् ॥ ४६ ॥
लीढ्वा चानु पयःपानं प्रत्यहं कुरुते तु यः ।
एतेनाशीतिवर्षोऽपि शतधा रमते स्त्रियः ॥ ४७ ॥

शुद्ध गन्धक और आमलोंका चूर्ण समान भाग ले, दोनोंको एकत्र मिलाकर आमलोंके रसमें और सेमलके रसमें ७ बार भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर चूर्ण करके उसको चीनी और शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दुग्धपान करे । इस प्रकार जो प्रतिदिन इसको सेवन करे तो; अस्सी वर्षका बूढा भी सैंकडों स्त्रियोंके साथ रमण करने लगताहै ॥४६॥४७॥


हरशशांक ।

शाल्मल्यास्त्वचमादाय श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
शुद्धगन्धकचूर्णानि तद्रसेनैव भावयेत् ॥ ४८ ॥

सेमलकी छालको लेकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर उस चूर्णके बराबरही शुद्ध गन्धकका चूर्ण मिलाकर दोनोंको सेमलके रसमें ७ बार भावना देवे । पश्चात् धूपमें सुखाकर पीसलेवे ॥ ४८ ॥