भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1369, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1369
ऽधिकारः ]भाषाटीकासहिता ।१३३७

१ प्रस्थ, त्रिकुटा ८ पल, चीनी ७० पल, शहद ३५ पल, घी १७॥ पल और विदारीकन्दका चूर्ण एक प्रस्थ लेवे । इस सबको एकत्र मिलाकर घीके चिकनें बर्त्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ३३-३६॥

पलार्द्धमुपयुञ्जीत यथेष्टं चापि भोजनम् ।
मासैकमुपयोगेन जरां हन्ति रुजामपि ॥ ३७ ॥
वलीपलितखालित्यमेहपाण्ड्वाढ्यपीनसान् ।
हन्त्यष्टादश कुष्ठानि तथाऽष्टावुदराणि च ॥ ३८ ॥
भगन्दरं मूत्रकृच्छ्रं गृध्रसीं च हलीमकम् ।
क्षयं चैव महाव्याधिं पञ्च कासान्सुदारुणान् ॥ ३९ ॥
अशीतिं वातजात्रोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव संसृष्टान्सान्निपातिकान् ॥
सर्व्वानर्शोगदान्हन्ति वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ४० ॥
स काञ्चनाभो मृगराजविक्रमस्तुरङ्गमं चाप्यनुयाति वेगतः ।
स्त्रीणां शतं गच्छति सोऽतिरेकं प्रहृष्टपुष्टश्च यथा विहङ्गः ४१
पुत्रान्सञ्जनयेद्धीमान् नरसिंहनिभांस्तथा ।
नरसिंहमिदं चूर्णं सर्वरोगहरं नृणाम् ॥ ४२ ॥

फिर प्रतिदिन प्रातःकाल इसमेंसे दो दो तोले प्रमाण सेवन करे और यथेच्छ आहार विहार करे । इस प्रकार एक महीनेतक सेवन करनेसे यह चूर्ण सब प्रकारके रोगों और बुढापेको तथा वली, पलितरोग, गञ्ज, प्रमेह, पाण्डुरोग, आढ्यवात, पीनस, अठारह प्रकारके कुष्ठ, आठ प्रकारके उदररोग, भगन्दर मूत्रकृच्छ्र, गृध्रसीवात, हलीमक, अत्यन्त भयङ्कर क्षयरोग, पाँच प्रकारकी दारुण खाँसी, अस्सी प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग, बीस प्रकारके कफ-रोग, द्वन्द्वज, त्रिदोषजरोग और सर्वप्रकारके अर्शरोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जिस प्रकार वज्रपात वृक्षोंको तत्काल नाश करदेता है । इस चूर्णके प्रभावसे मनुष्य सुवर्णके समान कान्तिमान्, सिंहके समान पराक्रमी, घोडेके समान वेगसे चलने-वाला, सैकड़ों स्त्रियोंको भोगनेवाला, बलवान् और गरुडके समान हृष्टपुष्ट होताहै । एवं बुद्धिमान् पुरुष नृसिंहके समान शोभायमान पुत्रोंको उत्पन्न करता है । यह नरसिंहनामक चूर्ण मनुष्योंके सब रोगोंको हरनेवाला है ॥ ३७-४२॥

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