भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३३८ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-
कामदीपक ।
सितं पुनर्नवामूलं शाल्मलीरसभावितम् ।
शाल्मलीसत्त्वनिर्यासं दद्यात्तत्र समं समम् ॥ ४३ ॥
गन्धकं सर्वतुल्यं च भक्षयेच्छाणमात्रकम् ।
अनुपानं प्रकुर्वीत ततः क्षीरं पलद्वयम् ॥ ४४ ॥
अयं चण्डालिनीयोगोऽगम्याप्यत्र हि गम्यते ।
निषेधान्निधनं याति करणात्कामरूपधृक् ॥ ४५ ॥
सफेद पुनर्नवेकी जडका चूर्ण और मोचरस इन दोनोंको समान भाग और दोनोंके बराबर भाग शुद्ध गन्धक लेवे, फिर सब चूर्णको एकत्र मिलाकर सेमलके रसमें सात बार भावना देवे । इसको प्रतिदिन चार चार माशेकी मात्रासे भक्षण करे और ऊपरसे आठ तोले प्रमाण गोदुग्धका अनुपान करे । यह चंडालिनीयोगों अगम्यास्त्रीसे भी गमन करता है और स्त्रीसेवन न करनेसे मृत्यु होती है एवं सेवन करनेसे कामदेवके समान रूपलावण्य करके युक्त होता है ॥
कामधेनु ।
गन्धमामलकं चूर्णं धात्रीरसविभावितम् ।
सप्तधा शाल्मलीतोयैः शर्करामधुयोजितम् ॥ ४६ ॥
लीढ्वा चानु पयःपानं प्रत्यहं कुरुते तु यः ।
एतेनाशीतिवर्षोऽपि शतधा रमते स्त्रियः ॥ ४७ ॥
शुद्ध गन्धक और आमलोंका चूर्ण समान भाग ले, दोनोंको एकत्र मिलाकर आमलोंके रसमें और सेमलके रसमें ७ बार भावना देवे । फिर धूपमें सुखाकर चूर्ण करके उसको चीनी और शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दुग्धपान करे । इस प्रकार जो प्रतिदिन इसको सेवन करे तो; अस्सी वर्षका बूढा भी सैंकडों स्त्रियोंके साथ रमण करने लगताहै ॥४६॥४७॥
हरशशांक ।
शाल्मल्यास्त्वचमादाय श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
शुद्धगन्धकचूर्णानि तद्रसेनैव भावयेत् ॥ ४८ ॥
सेमलकी छालको लेकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर उस चूर्णके बराबरही शुद्ध गन्धकका चूर्ण मिलाकर दोनोंको सेमलके रसमें ७ बार भावना देवे । पश्चात् धूपमें सुखाकर पीसलेवे ॥ ४८ ॥