भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1371

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३९

मासमात्रप्रयोगेण शृणु वक्ष्यामि ये गुणाः ।
मकरध्वजरूपोऽपि स्त्रीशतानन्दवर्द्धनः ॥
शतायुश्च भवेद्देवि वलीपलितवर्जितः ॥ ४९ ॥
तेजस्वी बलसम्पन्नो वेगेन तुरगोपमः ।
सततं भक्षयेद्यस्तु तस्य मृत्युर्न जायते ॥ ५० ॥

इस चूर्णको एक महीनेतक सेवन करनेसे जो गुण होते हैं उनको कहता हूँ सुनो-हे देवि ! इसके प्रतापसे मनुष्य सौ वर्षकी आयुवाला, वली तथा पलितरोगसे मुक्त, तेजस्वी, बलवान् और घोडेके समान वेगवान् होता है । जो पुरुष इसको सर्वदा भक्षण करे तो उसकी कभी मृत्यु नहीं होती है ॥ ४९ ॥ ५० ॥

लक्ष्मणालौह ।

लक्ष्मणाहस्तिकर्णाभ्यां त्रिकत्रयसमन्वयात् ।
अश्वगन्धासमायोगाल्लौहं पुंसवनं मतम् ॥ ५१ ॥
पुत्रोत्पत्तिकरं वृष्यं कन्याप्रसूतिनिवर्त्तकम् ।
कृशस्य बलदं श्रेष्ठं सर्व्वामयहरं परम् ॥ ५२ ॥

लक्ष्मणाकी जड, हस्तिकर्ण (पलाश) की छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड बहेडा, आमला, वायविडङ्ग, चीता, नागरमोथा और असगन्ध इनके चूर्णको समान भाग और सब चूर्णके बराबर भाग लोहा लेवे । सबको जलके द्वारा खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह लोह पुरुषत्वको उत्पन्न करता है । स्त्रियोंके इसके सेवनसे कन्योत्पत्ति निवृत्त होकर पुत्रोत्पत्ति होती है । इससे वीर्य्य-वृद्धि और कृश मनुष्यके बलकी वृद्धि होती है तथा सर्वप्रकारके रोगोंका नाश होता है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥

सिद्धशाल्मलीकल्प ।

भूकूष्माण्डं तालमूली धात्री चैव पुनर्नवा ।
समभागं समाहृत्य भागाद्धं गन्धकं तथा ॥ ५३ ॥
तदर्द्धं पारदं शुद्धं कज्जलीकृत्य निक्षिपेत् ।
श्वतशाल्मलितोयेन सप्तधा भावयेत्ततः॥ ५४ ॥
माहिषेण च दुग्धेन तच्चूर्णं भावयेत्पुनः ।
शुष्कं तच्चूर्णयेद्यत्नाल्लेहयेन्मधुसर्पिषा ॥ ५५ ॥
अनेनाशीतिवर्षोऽपि शतधा रमते स्त्रियः ।