भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1372

१३४० भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-


ऊर्ध्वलिङ्गः सदा तिष्ठेत्कामदेव इव स्वयंम् ॥ ५६ ॥
ज्वरादिरोगनिर्मुक्तः संसारसुखमश्नुते ।
शाणमेकं तु कर्त्तव्य दुग्धमत्रानुपानकम् ॥ ५७ ॥

विदारीकन्द, मुसली, आमले और सफेद पुनर्नवा ये प्रत्येक एक एक तोला एवं गन्धक ६ माशे और शुद्ध पारा ३ माशे लेवे । प्रथम पारे और गन्धककी एकत्र कजली बनालेवे, फिर सबको एकत्रकर सफेद सेमलकी जडके क्वाथ और भैंसके दूधमें अलग २ क्रमशः सातबार भावना देवे । पश्चात् धूपमें सुखाकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन चार चार माशे प्रमाण लेकर शहद और घीके साथ सेवन करे । इसके सेवनसे अस्सी वर्षका वृद्ध मनुष्य भी सैंकडों स्त्रियोंको भोगता है और लिङ्ग सदा खडा रहता है । मनुष्य कामदेवके समान सुन्दर हो और ज्वरादि रोगोंसे मुक्त होकर सांसारिक सुखको भोगता है । इसपर दुग्धपान करना चाहिये ॥ ५३-५७ ॥

पञ्चशर ।

रसेन वै शाल्मलिजेन सूतं त्रिसप्तवाराणि बलिं
विमद्य ॥ पृथक् तयोः कज्जलिकां विपक्कां घृते रसः
पञ्चशरोऽयमुक्तः ॥ ५८ ॥ वल्लोऽहिवल्लीदलसंप्रयुक्तो
वीर्यातिवृद्धिं कुरुतेऽस्य नूनम् । मांसान्नमध्यं गुरु पायसं
च पयः पिबेन्माहिषमत्र सिद्धम् ॥ ५९ ॥

सेमलकी मुशलीके रसमें समान भाग मिश्रित पारे और गन्धकको पृथक् पृथक् इक्कीसबार भावना देवे । फिर दोनोंकी कज्जली बनाकर घीमें पकालेवे । पश्चात् इसको दो दो रत्तीप्रमाण ले पानके रसमें मिलाकर सेवन करे तो यह निश्चय वीर्यकी वृद्धि करता है । इसपर मांस, उडदके बने पदार्थ, मदिरा, भारी पदार्थ, खीर और उत्तमप्रकार सिद्ध कियाहुआ भैंसका दूध इत्यादि पदार्थ सेवन करने चाहिये । इस योगको पञ्चशरस कहते हैं ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

कामिनीमदभञ्जन ।

शुद्धसूतं समं गन्धं त्र्यहं कह्लारकद्रवैः ।
मर्दितं वालुकायन्त्रे यामं सम्पुटके पचेत् ॥ ६० ॥
रक्ताङ्गरुह द्रवैर्भाव्यं दिनैकं तु सितायुतम् ।
यथेष्टं भक्षयेच्चानु कामयेत्कामिनीशतम् ॥ ६१ ॥