भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1373

ऽधिकारः भाषाटीकासहिता । १३४१

शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली बनाले, फिर उसको लाल कमलके पत्तोंके रसमें तीन दिनतक खरल करके वालुकायन्त्रमें रखकर एक प्रहरतक पकावे । पश्चात् उसमेंसे औषधिको निकालकर केशराके क्वाथमें एक दिनतक भावना देवे । इस रसको प्रतिदिन उचित मात्रासे मिश्रीमें मिलाकर सेवन करे और यथेच्छ आहार विहार करे तो सौ स्त्रियोंसे प्रसंग करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ ६० ॥ ६१ ॥

कामिनीदर्पघ्न ।

कज्जलीकृतसुगन्धकशम्भोस्तुल्यमेव कनकस्य हि बीजम् ।
मर्दयेत्कनकतैलयुतं स्यात्कामिनीमदविधूनन एषः ॥ ६२ ॥
अस्य वल्लभकमथो सितयाऽक्तं सेवितं हरति मेहगदौघान् ।
वीर्यदाढर्यकरणं कमनीयं द्रावणं निधुवने वनितानाम् ॥६३॥

शुद्ध गन्धक एक तोला और शुद्ध पारा एक तोला लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली बनालेवे, फिर उसमें दो तोले धतूरेके बीजोंका चूर्ण मिलाकर धतूरेके तेलमें अच्छेप्रकार खरल कर उसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक दो गोली मिश्रीके साथ सेवन करे तो यह रस स्त्रीके मदको ध्वंस करता है और प्रमेहके समूहको तत्काल नष्ट कर वीर्यस्तम्भन करता है । इसके सेवनसे मनुष्य अत्यन्त मनोहर और स्त्रियोंके दर्पको तत्क्षण नष्ट करनेमें प्रबल होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

पुष्पधन्वा ।

हरजभुजगलोहं चाभ्रकं वङ्गचूर्णं कनकविजययष्टी शाल्मली नागवल्ली ।
घृतमधुसितदुग्धं पुष्पधन्वा रसेन्द्रो रमयति शतरामा दीर्घमायुर्बलं च ॥ ६४ ॥

रससिन्दूर, सीसा, लोहा, अभ्रक और वंग इनकी भस्मोंको समान भाग लेकर धतूरा, भांग, मुलहठी, सेमलकी मूसली और पान इनके रसमें एक एक बार क्रमसे भावना देवे । फिर इसको घी, शहद, मिश्री और दूधके साथ मिलाकर सेवन करे । इससे आयु और बलकी वृद्धि होती है तथा मनुष्य सैकडों स्त्रियोंके भोगनेको समर्थ होता है । यह पुष्पधन्वारस सब रसोंका राजा है ॥६४॥

पूर्णचन्द्ररस ।

सूताभ्रलौह सशिलाजतु स्याद्विडङ्गतार्प्यं मधुना सितेन ।
सम्मर्द्य सर्वं खलु पूर्णचन्द्रो माषोऽस्य वृष्यो भवति प्रयुक्तः ॥