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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

ऽधिकारः भाषाटीकासहिता । १३४१

शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली बनाले, फिर उसको लाल कमलके पत्तोंके रसमें तीन दिनतक खरल करके वालुकायन्त्रमें रखकर एक प्रहरतक पकावे । पश्चात् उसमेंसे औषधिको निकालकर केशराके क्वाथमें एक दिनतक भावना देवे । इस रसको प्रतिदिन उचित मात्रासे मिश्रीमें मिलाकर सेवन करे और यथेच्छ आहार विहार करे तो सौ स्त्रियोंसे प्रसंग करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ ६० ॥ ६१ ॥

कामिनीदर्पघ्न ।

कज्जलीकृतसुगन्धकशम्भोस्तुल्यमेव कनकस्य हि बीजम् ।
मर्दयेत्कनकतैलयुतं स्यात्कामिनीमदविधूनन एषः ॥ ६२ ॥
अस्य वल्लभकमथो सितयाऽक्तं सेवितं हरति मेहगदौघान् ।
वीर्यदाढर्यकरणं कमनीयं द्रावणं निधुवने वनितानाम् ॥६३॥

शुद्ध गन्धक एक तोला और शुद्ध पारा एक तोला लेकर दोनोंकी एकत्र कज्जली बनालेवे, फिर उसमें दो तोले धतूरेके बीजोंका चूर्ण मिलाकर धतूरेके तेलमें अच्छेप्रकार खरल कर उसकी दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक दो गोली मिश्रीके साथ सेवन करे तो यह रस स्त्रीके मदको ध्वंस करता है और प्रमेहके समूहको तत्काल नष्ट कर वीर्यस्तम्भन करता है । इसके सेवनसे मनुष्य अत्यन्त मनोहर और स्त्रियोंके दर्पको तत्क्षण नष्ट करनेमें प्रबल होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

पुष्पधन्वा ।

हरजभुजगलोहं चाभ्रकं वङ्गचूर्णं कनकविजययष्टी शाल्मली नागवल्ली ।
घृतमधुसितदुग्धं पुष्पधन्वा रसेन्द्रो रमयति शतरामा दीर्घमायुर्बलं च ॥ ६४ ॥

रससिन्दूर, सीसा, लोहा, अभ्रक और वंग इनकी भस्मोंको समान भाग लेकर धतूरा, भांग, मुलहठी, सेमलकी मूसली और पान इनके रसमें एक एक बार क्रमसे भावना देवे । फिर इसको घी, शहद, मिश्री और दूधके साथ मिलाकर सेवन करे । इससे आयु और बलकी वृद्धि होती है तथा मनुष्य सैकडों स्त्रियोंके भोगनेको समर्थ होता है । यह पुष्पधन्वारस सब रसोंका राजा है ॥६४॥

पूर्णचन्द्ररस ।

सूताभ्रलौह सशिलाजतु स्याद्विडङ्गतार्प्यं मधुना सितेन ।
सम्मर्द्य सर्वं खलु पूर्णचन्द्रो माषोऽस्य वृष्यो भवति प्रयुक्तः ॥

१३४२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

रससिन्दूर, अभ्रक, लोहा, शिलाजीत, वायविडंग और सोनामाखी इन सबको बराबर भाग ले एकत्र पीसलेवे । फिर शहद और मिश्रीमें मिलाकर एक एक माशे प्रमाण प्रतिदिन भक्षण करे तो मनुष्य पूर्णचन्द्रमाके समान वीर्य्यकी वृद्धिको प्राप्त होता है ॥ ६५ ॥

अनङ्गकुसुमाकर।

निरुत्थभस्म सौवर्णं मुक्ता कस्तूरिका तथा ।
तालसत्त्वं च तत्सर्वं तोलकैर्कं प्रकल्पयेत् ॥६६॥
कन्यारसेन संमर्द्य चतुर्गुञ्जामिता वटी ।
वटिकां वटिकार्द्धं वा सर्वरोगेषु योजयेत् ॥६७॥
अनुपानादिकं दद्याद् बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ।
अयथावीर्यपातेन शुक्रमेहादिभिस्तथा ॥६८॥
क्लीबत्वं ध्वजभङ्गं च रोगांश्चाशु तदुद्भवान् ।
नाशयेदेव विख्यातोऽनङ्गकुसुमसंज्ञितः ॥ ६९ ॥

उत्तमप्रकार मारेहुये सोनेकी भस्म, मोतीकी भस्म, कस्तूरी और वंशपत्री, हरिताल इन सबको एकएक तोला प्रमाण लेकर घीग्वारके रसमें अच्छे प्रकार खरल करके चारचार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। फिर इसकी एक अथवा आधी गोली सेवन करे और दोषोंके बलाबलको विचारकर अनुपानकी कल्पना करे। यह रस सर्व रोगोंमें हितकारी है। अकारण वीर्यपात होनेसे, शुक्रक्षय वा प्रमेहादिसे उत्पन्न हुई क्लीबता, ध्वजभंग और उससे होनेवाले अन्यान्य सब रोगोंको यह प्रसिद्ध अनंगकुसुमनामवाला रस नष्ट करता है ॥ ६६–६९ ॥

हेमसुन्दररस।

शुद्धसूतस्य पादांशं हेमभस्म प्रकल्पयेत् ।
क्षीराज्यदधिसंमिश्रं माषैकं कांस्यपात्रके ॥ ७० ॥
लेहयेन्माषषट्कं तु जरामरणनाशनम् ।
वागुजीचूर्णकर्षैकं धात्रीफलरसाप्लुतम् ॥
अनुपानं पिबेन्नित्यं स्याद्रसो हेमसुन्दरः ॥ ७१ ॥

शुद्ध पारा १ तोला और सुवर्णभस्म ३ माशे लेकर काँसीके पात्रमें रख उसमें दूध, घी और दही प्रत्येक एक एक माशा डालकर अच्छे प्रकार खरल करें। इस रसको प्रतिदिन छः छः माशेकी मात्रासे सेवन करे तो जरा और मृत्युको

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३४३

निवृत्ति होती है । इसपर वापचीके एक कर्ष चूर्णको आमलोंके रसमें मिलाकर अनुपान करे । यह हेमसुन्दरनामवाला रस है ॥७०॥७१॥

अनङ्गसुन्दररस ।

शुद्धसूतं समं गन्धं त्र्यहं कल्हारजैर्द्रवैः ।
मर्दितं वालुकायन्त्रे यामं सम्पुटके पचेत् ॥ ७२ ॥
रक्तागस्त्यद्रवैर्भाव्यं दिनमेकं सिताम्बुजैः ।
यथेष्टं भक्षयेच्चानु कामयेत्कामिनीशतम् ॥ ७३ ॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको समान भाग लेकर लाल कमलके रसमें तीन दिनतक खरल करे । फिर वायुकायन्त्रमें रखकर एक प्रहरतक पुटपाक करे । पश्चात् लाल अगस्तियाके रसमें एक दिनतक भावना देकर प्रतिदिन इस रसको उचित मात्रासे मिश्रीके जलके साथ सेवन करे और यथेच्छ भोजन करे तो सौ स्त्रियोंको भोगनेकी शक्ति सम्पन्न होता है ॥७२॥७३॥

गन्धामृतरस ।

भस्मसूतं द्विधा गन्धं कन्यकाद्भिर्विमर्दयेत् ।
रुद्ध्वा लघुपुटे पाच्यमुद्धृत्य मधुसर्पिषा ॥ ७४ ॥
वल्लं खादेज्जरामृत्युं हन्ति गन्धामृतो रसः ।
समूलं भृङ्गराजं च छायाशुष्कं विचूर्णयेत् ॥ ७५ ॥
तत्समं त्रिफलाचूर्ण सर्वतुल्या सिता भवेत् ।
पलैकं भक्षयेच्चानु सेवनाच्च जरापहः ॥ ७६ ॥

रससिन्दूर एक तोला और शुद्ध गन्धक दो तोले इन दोनोंको एकत्र घीग्वारके रसके साथ खरलकर पश्चात् लघुपुटमें रखकर पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इस औषधिको प्रतिदिन दो रत्ती प्रमाण ले घी और शहदमें मिलाकर सेवन करे तो यह गन्धामृत रस वृद्धावस्था और मृत्युको नाश करता है । इस औषधको सेवन करनेके पश्चात् जडसहित भाँगरेको छायामें सुखाकर चूर्ण करले, फिर उस चूर्णके समान भाग त्रिफलेका चूर्ण और सब चूर्णके बराबर भाग मिश्री मिलाकर उसमेंसे चार तोले नित्य सेवन करें तो वृद्धता दूर होती है ॥७४-७६॥

सिद्धसूत ।

मुक्ताफलं शुद्धसूतं सुवर्णं रूप्यमेव च ।
यवक्षारं च तत्सर्वं तोलकैकं प्रकल्पयेत् ॥ ७७ ॥

१३४४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा--


रक्तोत्पलपत्रतोयैर्मर्दयेत्पुत्तलीकृतम् । मर्दयेच्च पुनर्दत्त्वा गन्धकं तदनन्तरम् ॥ ७८ ॥ क्षिप्त्वा काचघटीमध्ये सन्निरुध्य त्रियामकम् । सिकताख्ये पचेच्छीते सिद्धसूतं तु भक्षयेत् ॥ पञ्चरक्तिप्रमाणेण मुशलीशर्करान्वितम् ॥ ७९ ॥

मोती, शुद्ध पारा, सोना, चांदी इनकी भस्म और जवाखार ये प्रत्येक एक एक तोला लेकर लालकमलके पत्तोंके रसमें खरल करे । फिर सब औषधिके बराबर शुद्ध गन्धक मिलाकर पुनर्वार उक्त रसमें खरल करे । पश्चात् उसको एक बोतलमें भरकर उसके मुँहको अच्छ प्रकार बन्द करके वालुकायन्त्रमं र ३ प्रहरतक पकावे । जब स्वांगशीतल हो जाय तब निकालकर इस सिद्ध पारेको पाँच रत्ती प्रमाण ले मुशली और मिश्रीके चूर्णमें मिलाकर भक्षण करे ॥७७-७९॥

शुक्रवृद्धिं करोत्येष ध्वजभङ्गं च नाशयेत् । दुर्बलं वपुरत्यर्थं बलयुक्तं करोत्यसौ ॥ ८० ॥ मुद्गगर्भं घृतं क्षीरं शालयः स्निग्धमामिषम् । पारावतस्य मांसं च तित्तिरिश्च सदा हितः ॥ ८१ ॥

यह वीर्य्यकी वृद्धि करता है और ध्वजभङ्गको दूर करता है इसी प्रकार दुर्बल मनुष्यको अत्यन्त बलवान् बनाता है । इसपर मूँगकी दाल, घी, दूध, शालिचावल, स्निग्ध मांस, कबूतरका मांस और तीतरका मांस इन पदार्थोंका सेवन सदैव हितकारी है ॥८०॥८१॥

मकरध्वजवटी ।

सुवर्णं रजतं लौहं कस्तूरी मौक्तिकं तथा । जातीफलं च सर्वेषां प्रत्येकं तुल्यभागिकम् ॥ ८२ ॥ लौहाच्च द्विगुणं देयं भस्मसूतं भिषग्वरैः । तत्तुल्यं चन्द्रसंज्ञं च प्रवालं च तथैव च ॥८३॥ सहस्रपुटितं चाभ्रं मतं लोहाच्चतुर्गुणम् । सर्वद्रव्यसमं देयं मकरध्वजचूर्णितम् ॥ ८४ ॥ वारिणा वटिकां कृत्वा भक्षयेच्च विधानतः । सर्वरोगहरो ह्येष नात्र कार्या विचारणा ॥ ८५ ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३४५

सोना, रूपा, लोहा, कस्तूरी, मोती और जायफल ये प्रत्येक एकएक तोला एवं रससिन्दूर, कपूर और मूँगा प्रत्येक दो दो तोले तथा सहस्रपुटित अभ्रक ४ तोले और सब द्रव्योंके समान भाग स्वर्णसिन्दूर लेवे । सबको जलद्वारा एकत्र खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह औषधि अनुपानभेदसे अनेक प्रकारके रोगोंमें विधिपूर्वक प्रयोग करनी चाहिये । इससे सब रोग नष्ट होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८२-८५ ॥

वातपित्तोद्भव वापि श्लुष्माणं च विशेषतः ।
आर्द्रकस्य रसैश्चानु सन्निपातविनाशनः ॥ ८६ ॥
प्राकृतं वैकृतं द्वन्द्वं त्रिदोषं च विशेषतः ।
उन्मादं चानेकविधमज्ञानं वाक्प्ररोधकम् ॥ ८७ ॥
कान्तिपुष्टिकरो ह्येष वलीपलितनाशनः ।
मकरध्वजवटी ख्याता स्वयं नाम्ना च भाषिता ॥८८॥

इसको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे वात, पित्त, कफ और त्रिदोषजन्य विकार, प्राकृतक, विकृत, द्वन्द्वजरोग, अनेक प्रकारका उन्माद, मोह और मूर्च्छादि व्याधि शीघ्र नष्ट होती हैं । यह स्वनामख्यात मकरध्वजवटी कान्ति और पुष्टिको उत्पन्न करती है तथा वली और पलितरोगको नष्ट करती है ॥ ८६-८८ ॥

श्रीमन्मन्मथाभ्ररस ।

रसगन्धकयोर्ग्राह्यं पलमेकं सुशोधितम् ।
अभ्रं निश्चन्द्रकं दद्यात्पलार्द्धं च विचक्षणः ॥ ८९ ॥
कर्पूरं तोलकं दद्याद्वङ्गं च कोलसम्मितम् ।
ताम्रं तोलार्द्धकं तत्र निश्शेषं मारितं पुनः ॥९० ॥
लौहकर्षं सुजीर्णं च वृद्धदारकजीरकम् ।
विदारीं शतमूलीं च क्षुरबीजं बलां तथा ॥ ९१ ॥
मर्कटचतिविषां चैव जातीकोषफले तथा ।
लवङ्गं विजयाबीजं श्वेतसर्जं यमानिकाम् ॥ ९२ ॥
शाणभागान् गृहीत्वैतानेकीकृत्यैव पेषयेत् ।
गुञ्जाद्वयं तु कर्त्तव्यं कोष्णं क्षीरं पिबेदनु ॥ ९३ ॥

८५

१३४६ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक प्रत्येक- एकएक तोला, निश्चन्द्र अभ्रक दो तोले, भीमसेनी कपूर और वङ्गभस्म प्रत्येकः एकएक तोला, ताँबेकी भस्म ६ माशे, लोहेकी भस्म एक कर्ष, पुराने विधारेके बीज, जीरा, विदारीकन्द, शतावर, तालमखाने, खिरैंटी, कौंछके बीज, अतीस, जावित्री, जायफल, लौंग, भाँगके बीज, सफेद राल और अजवायन इन सबको चार चार माशे ले एकत्र पीस लेवे । इस औषधिको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण ले सुखोष्ण दूधके साथ सेवन करे ॥ ८९-९३ ॥

गृहे यस्य शतं नार्यो विद्यन्तेऽतिव्यवायिनः । न तस्य लिङ्गशैथिल्यमौषधस्यास्य सेवनात् ॥ ९४ ॥ न च शुक्रं क्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् । कामरूपी भवेन्नित्यं वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥ ९५ ॥ रसः श्रीमन्मथाभ्रोऽयं महेशेन प्रकाशितः । अस्य भक्षणमात्रेण काष्ठं जीर्यति तत्क्षणात् ॥ नाशयेद् ध्वजभङ्गादीन् रोगान् योगकृतानपि ॥ ९६ ॥

जिसके घरमें सौ स्त्रियें हों और जो अत्यन्त मैथुन करनेवाले हैं उनको यह रस सेवन करना चाहिये । इसके सेवनसे लिङ्ग कभी शिथिल नहीं होता, न वीर्य नष्ट होता है और न बलका ह्रास होता है । एवं मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् और बुढा सोलह वर्षके युवाके समान होता है । इस श्रीमन्मथाभ्ररसको श्रीमहादेवने प्रकट किया है । इसको भक्षण करनेसे काष्ठभी जीर्ण होजाता है तथा ध्वजभङ्गादिरोग तत्क्षण नष्ट होते हैं ॥ ९४-९६ ॥

श्रीकामदेवरस ।

पारदं पलमेकं स्याद् द्विपलं शुद्धगन्धकम् । रक्तकार्पासतोयेन घृष्ट्वा काचस्य कुप्यतः ॥ ९७ ॥ निक्षिप्य टङ्कणेनैव मुखं तस्य निरोधयेत् । वालुकायन्त्रमध्यस्थं कुप्यं च कुरुते दृढम् ॥ ९८ ॥ अहोरात्रं पचेदग्नौ शास्त्रवित्कुशलो भिषक् । शीते चादाय पात्रस्थं कूपिकान्तरलम्बितम् ॥ ९९ ॥ दरदेन समं रक्तं सोज्ज्वलं भस्म यद्भवेत् । भक्षयेन्माषमेकं च घृतेन मधुना सह ॥ १०० ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता १३४७


पश्चाद् दुग्धं गुडं चाज्यं कृष्णेक्षुमपि शर्कराम् ।
द्राक्षाखर्जूरमधुकप्रभृतीनथ भक्षयेत् ॥ १ ॥

शुद्ध पारा चार तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले इन दोनोंको लाल कपासके रसमें खरल करके बोतलमें भरकर सुहागेसे उसके मुँहको बन्द कर देवे । फिर उस बोतलको वालुकायन्त्रमें रखकर शास्त्रवेत्ता वैद्य एक दिनरात्रितक अग्निमें पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब उसको शीशीमेंसे निकाले । वह हिंगुलके समान लालरंगवाली और अति उज्ज्वल भस्म होगी । उस भस्मको प्रतिदिन एक एक माशा ले घी और शहदमें मिलाकर चाटे और पीछेसे दूध, गुड, घी, काली ईखका रस, चीनी, दाख, खजूर और मुलहठी आदि द्रव्योंका सेवन करे ॥ ९७-१०१ ॥

त्रिफला मधुना शान्तिं याति पित्तं चिरोद्भवम् ।
निर्गुण्डिकारसेनात्र दुर्वारा वातवेदना ॥ २ ॥
प्रशमं याति वेगेन नूतनं च वपुर्भवेत् ।
अर्द्धावर्त्तितदुग्धेन गृह्यते यद्ययं रसः ॥ ३ ॥
वन्ध्यापि च भवेत्येव जीववत्सा सुपुत्रिका ।
कामदेवमथो सूतं कामिनां कामदं सदा ॥
अस्य प्रसादतो बह्व्यो रम्यश्च रमते स्त्रियः ॥ ४ ॥

त्रिफलेके क्वाथ और शहदके साथ इस रसको खानेसे बहुत पुराना दुष्ट पित्त शान्त होता है । निर्गुण्डीके रसके साथ खानेसे दुष्टवातकी वेदना दूर होती है और शरीर नवीन हो जाता है । यदि इस रसको एक बारकी ब्याई हुई गौके अधओटे दूधके साथ सेवन करे तो वन्ध्यास्त्री भी जीवितवत्सा और सुयोग्य पुत्रवाली होती है । यह कामदेव रस कामी पुरुषोंको कामके देनेवाला है । इसके प्रसादसें निर्बल मनुष्यभी प्रबल और रमणीय होकर स्त्रियोंको भोगता है ॥ २-१०४ ॥

मकरध्वजरस ।

स्वर्णादष्टगुणं सूतं मर्दयेत्त्रिकगन्धकम् ।
रक्तकार्पासकुसुमैः कुमार्याद्भिर्विमर्दयेत् ॥ ५ ॥
शुष्कं काचघटीं रुद्ध्वा वालुकायन्त्रगं हठात् ।
भस्म कुर्याद्रसेन्द्रस्य नवार्ककिरणोपमम् ॥ ६ ॥

१३४८ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरण

भागोऽस्य भागाश्चत्वारः कर्पूरस्य सुशोभनाः । लवङ्गं मरिचं जातीफलं कर्पूरमात्रया ॥ ७ ॥ मेलयेन्मृगनाभिं च गद्यानकमितं तथा । श्लक्ष्णपिष्टो रसो नाम जायते मकरध्वजः ॥ ८ ॥

सोना १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग और पारेसे तिगुनी शुद्ध गन्धक इनको एकत्र खरल कर कज्जली बनालेवे । फिर उसको लालकपासके फूलोंके रस और घीग्वारकें रसमें उत्तम प्रकार खरल करके छायामें सुखाले, पश्चात् काँचकी शीशीमें भरकर उस शीशीके मुँहको बन्दकर वालुकायन्त्रमें नवीन उदय हुए सूर्य्यकी किरणोंके समान लाल वर्णकी विधिपूर्वक भस्म करे । जब स्वांगशीतल होजाय तब उक्त भस्म १ भाग, कपूर ४ भाग, लौंग, मिरच और जायफल ये प्रत्येक कपूरके बराबर भाग एवं कस्तूरी ८ माशे लेकर सबको एकत्र पीस लेवे । इस प्रकार यह मकरध्वजनामक रस सिद्ध होता है ॥ ५-८ ॥

वल्लं वल्लद्वयं वाथ ताम्बूलीदलसंयुतम् । भक्षयेन्मधुरं स्निग्धं मृदु मांसलवातलम् ॥ ९ ॥ श्रुतशीतं सितायुक्तं दुग्धं गोभवमाज्यकम् । मध्वाद्यं पिष्टमपरं मद्यानि विविधानि च ॥ १० ॥ करोत्यग्निबलं पुंसां वलीपलितनाशनः । मेधायुःकान्तिजननः कामोद्दीपनकृन्महान् ॥ अभ्यासात्साधकः स्त्रीणां शतं जयति नित्यशः ॥ ११ ॥

इसको प्रतिदिन दो रत्तीभर अथवा चार रत्तीभर पानमें रखकर सेवन करे । इसपर मधुर, स्निग्ध, हल्का और वातल मांसल एवं औटाकर स्वयं शीतल हुआ मिश्रीमिला गोदुग्ध और घृत, शहद, पिष्टक और अनेक प्रकारकें मद्यादि पदार्थ सेवन करे । यह रस मनुष्योंकी अग्निको दीपन करता, वली और पलितरोगको नष्ट करता है एवं मेधा, आयु, कान्ति और कामको बढानेवाला है । इसके सेवनसे मनुष्य नित्य सौ स्त्रियोंको भोगता है ॥ ९-१११ ॥

रतिकाले रतान्ते च पुनः सेव्यो रसोत्तमः । मानहानिं करोत्यासां प्रमदानां सुनिश्चितम् ॥ १२ ॥ कृत्रिमं स्थावरविषं जङ्गमं विषवारि च । न विकाराय भवति साधकानां च वत्सरात् ॥ १३ ॥

[अधिकारः ] | भाषाटीकासहिता । | १३४९

मृत्युञ्जयो यथाऽभ्यासान्मृत्युं जयति देहिनाम् ।
तथाऽयं साधकेन्द्रस्य जरामरणनाशनः ॥१४॥

इस उत्तम रसको मैथुनके आदि और अन्तमें सेवन करे। यह स्त्रियोंके मानको निस्सन्देह दूर करता है। एक वर्ष पर्यन्त इस रसको सेवन करनेसे कृत्रिम, स्थावर, जङ्गम और जलीय जीवोंका विष कुछ भी असर नहीं करता, जिस प्रकार मृत्युञ्जय मन्त्रका जप करनेसे मनुष्योंकी मृत्यु दूर होजाती है उसी प्रकार यह रसेन्द्र भी प्राणियोंके जरा और मरणको नष्ट करता है ॥१२-१४॥

महेश्वररस ।

रसं भस्मीकृतं कोलं गन्धकं शोधितं समम् ।
लौहं कर्षद्वयं ताम्रमर्द्धतोलकसम्मितम् ॥ १५ ॥
सुवर्णं जारितं दद्याच्छाणार्द्धं सुविचक्षणः ।
अभ्रं कर्षद्वयं दद्याच्छाणार्द्धं चन्द्रचूर्णकम् ॥ १६ ॥
श्यामाबीजं वरीं चैव बलामतिबलां तथा ।
एलां च शङ्खपुष्पं च शाणमानं विनिक्षिपेत् ॥
जलेन वटिकां कृत्वा गुञ्जामात्रां प्रदापयेत् ॥ १७ ॥
सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ।
सहस्रं याति नारीणामुत्साहो जायतेऽधिकः ॥ १८ ॥

रससिंदूर १ तोला, शुद्ध गंधक १ तोला, लोहा २ तोले, तांबा ६ माशे, जारणकिया सोना २ माशे, अभ्रक २ तोले, कपूर ६ माशे एवं विधारेके बीज, शतावर, खिरेंटी, कंघी, इलायची और शंखपुष्पी ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे । सबको जलके द्वारा एकत्र खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् होता है और हजारों स्त्रियोंको भोगनेका उत्साह उत्पन्न होता है ॥१५-१८॥

नित्यं स्त्रीसेवनाद्यस्तु क्षीणशुक्रो भवेन्नरः ॥ १९ ॥
महाशुक्रो भवेत्सोऽपि सेवनादस्य नान्यथा ।
महाबलो महाबुद्धिर्जायते नात्र संशयः ॥ १२० ॥
स्थूलानां कर्षकः श्रेष्ठः कृशानां पुष्टिकारकः ।
रसौ विनाशयेद्रोगान्सप्तसप्ताहभक्षणात् ॥ २१ ॥

१३५० | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरगा-

जो पुरुष नित्यप्रति स्त्रीप्रसङ्ग करनेसे नष्टवीर्य्य होगया हो वह भी इसके सेवनसे अत्यन्त वीर्य्यवान्, महाबलवान् और बुद्धिमान् होता है इसमें कुछ सन्देह नहीं । इस रसको सात सप्ताह पर्यन्त सेवन करनेसे सब रोग नष्ट होते हैं एवं स्थूल पुरुषोंकी स्थूलता और कृश मनुष्योंकी कृशता दूर होकर शरीर पुष्ट होताहै॥१९-२१॥

स्वर्णसिंदूर ।

पलं रसेन्द्रस्य च गन्धकस्य हेम्नोऽपि कर्षं परिगृह्य सम्यक्। वटप्ररोहस्य रसेन यामं यामं विमर्द्याथ कुमारिकायाः ॥२२॥ तत्काचकूप्यां निहितं प्रयत्नात्पचेद्विधिज्ञः सिकताख्ययन्त्रे । ततो रजश्चोर्द्धगतं सुरम्यं प्रगृह्य यत्नादरुणप्रभं यत् ॥२३॥ तद्योजयेत्सर्वगदेषु वीक्ष्य धातुं बलं वह्निवृद्धिं वयश्च । रसायनं वृष्यतरं च बल्यं मेधाग्निकान्तिस्मरवर्द्धनं च ॥ २४ ॥

शुद्ध पारा एक पल, शुद्ध गंधक एक पल और सोना एक तोला लेवे । सबको एकत्र बडके अंकुरोंके रसमें एक प्रहरतक एवं घीग्वारके रसमें एक प्रहरतक खरल करे । फिर एक बोतलमें विधिपूर्वक बुद्धिमान् वैद्य उसको वालुकायंत्रमें पकावे । जब स्वयं शीतल होजाय तब सूर्योदयकी लाल लाल कान्तिके समान उस औषधिको बोतलमेंसे निकालकर पीस लेवे । इस स्वर्णसिन्दूरनामक रसको सब प्रकारके रोगोंमें विचारपूर्वक प्रयोग करे । यह रसायन धातु, बल, अग्नि और आयुकी वृद्धि, शरीरमें पुष्टि, वीर्य तथा बलकी वृद्धि करती है । मेधा, जठराग्नि और काम-शक्तिको प्रबल करती है ॥२१-२४॥

स्वल्पचन्द्रोदयमकरध्वज ।

जातीफलं लवङ्गं च कर्पूरं मरिचं तथा । प्रत्येकं तोलकं दत्त्वा सुवर्णस्य च माषकम् ॥ २५ ॥ अण्डजं माषमानं च सर्वतुल्यमथेश्वरम् । यत्नतो मर्दयेत्खल्ले चतुर्गुञ्जावटीं चरेत् ॥ २६ ॥ एष चन्द्रोदयो नाम रसो वाजीकरः परः । हन्ति रोगानशेषांश्च बलवीर्याभिवर्द्धनः ॥ २७ ॥

जायफल, लौंग, कपूर और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक तोला, सोना एक माश, कस्तूरी एक माशा और सब औषधोंके बराबर भाग रससिंदूर

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता। १३५१

लेवे। सबको खरलमें रखकर उत्तम प्रकार मर्दन करे पश्चात् चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह स्वल्प चन्द्रोदयनामक रस अत्यन्त वाजीकरण,सर्वरोग नाशक, बल, वीर्य एवं अग्निवर्द्धक है। इसको माखन, मिश्री अथवा पानके रसके साथ सेवन करना चाहिये ॥ २६-२७ ॥

वृहच्चन्द्रोदयमकरध्वज ।

पलं मृदुस्वर्णदलं रसैन्द्रात्पलाष्टकं षोडश गन्धकस्य ।
शोणैः सुकार्पासभवैः प्रसूनैः सव विमर्द्याथ कुमारि-
काद्भिः ॥ २८ ॥ तत्काचकुम्भे निहितं सुगाढे मृत्क-
र्पटीभिर्दिवसत्रयं च । पचेत्क्रमाग्नौ सिकतारुययन्त्रे
ततो रजः पल्लवरागरम्यम् ॥ २९ ॥ संगृह्य चैतस्य पलं
पलानि चत्वारि कर्पूररजस्तथैव । जातीफलं सोषण-
मिन्द्रपुष्पं कस्तूरिकाया इह शाणमेकम् ॥ १३० ॥

सोनेके वरक चार तोले, शुद्ध पारा ३२ तोले, शुद्ध गन्धक ६४ तोले इनको एकत्र कर कज्जली बनावे, फिर लालवर्णकी वनकपासके फूलोंके रस और घीग्वारके रसमें खरल कर उसको कांचकी शीशीमें भर ऊपरसे कपरामटी करके धूपम सुखालेवे। पश्चात् उस बोतलको बालुकायन्त्रमें रखकर मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इस क्रमसे तीन दिनतक अग्निदेवे। जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब उसमेंसे लालवर्णके कोमल पत्तोंके समान रमणीय भस्मको निकाललेवे। तदनन्तर यह भस्म चार तोले, कपूर १६ तोले एवं जायफल, त्रिकुटा, लौंग, कस्तूरी ये प्रत्येक चार चार माशे लेवे, सबको जलद्वारा एकत्र खरल कर गोलियाँ बनालेवे ॥ २८-१३० ॥

चन्द्रोदयोऽयं कथितोऽस्य वल्लो भुक्तोऽहिवल्लीदलमध्य-
वर्त्ती । मदोन्मदानां प्रमदाशतानां गर्वाधिकत्व श्लथ-
यत्यकाण्डे ॥ ३१ ॥ घृतं घनीभूतमतीव दुग्धं मृदूनि
मांसानि समस्तकानि । मांसात्रपिष्टानि भवन्ति पथ्या-
न्यानन्ददायीन्यपराणि चात्र ॥ ३२ ॥ वलीपलिताना-
शनस्तनुभृतां वयःस्तम्भनः समस्तगदखण्डनः प्रचुर-
रोगपञ्चाननः । गृहेऽपि गृहभूपतिर्भवति यस्य चन्द्रो-
दयः स पञ्चशरदर्पितो मृगदृशां भवेद्वल्लभः ॥ ३३ ॥

१३५२ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

इसको बृहच्चन्द्रोदयरस कहते हैं। इस रसको प्रतिदिन दो या तीन रत्ती प्रमाण ले पानमें रखकर सेवन करे । इसके सेवनसे मनुष्य सैकड़ों मन्दोन्मत्त स्त्रियोंके मदको असमयमें दूर करता है। इसपर घृत, खूब औटाकर गाढा हुआ दूध, मृदु मांस, अन्नके और पिष्ठीके बने पदार्थ एवं अन्यान्य सब प्रकारकें आनन्ददायक पथ्य पदार्थ हितकारी हैं। यह रस वली और पलितरोगको नष्ट करनेवाला, मनुष्योंकी आयुको स्थापन करनेवाला, समस्त रोगोंको नाश करनेके लिये मृत्युञ्जय है। यह चन्द्रोदय जिसके घरमें भी होता है वह घरका राजा होता है। वह मृगनयनी स्त्रियोंका प्यारा और कामदेवके गर्वको दूर करता है ॥ ३१-३३ ॥

खण्डाभ्रक ।

पक्वचूतरसद्रोणः पात्रं स्याच्छुद्धखण्डतः ।
घृतमर्द्धं ततो ग्राह्यं चतुर्थांशं च नागरम् ॥ ३४ ॥
तदर्द्धं मरिचं प्रोक्तं तदर्द्धां पिप्पली मता ।
तोयं खण्डसमं दद्यात्सर्वमेकत्र संस्थितम् ॥ ३५ ॥
विपचेन्मृन्मये पात्रे यदा दर्वीप्रलेपनम् ।
चूर्णान्येषां ततो दद्यात्पत्रं पलचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥
ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं धन्याकं जीरकद्वयम् ।
त्र्यूषणं जाति तालीशं चूर्णमेषां पलं पलम् ॥ ३७ ॥
त्वगेलाकेशराणां च प्रत्येकं च पलं तथा ।
सिद्धशीते च मधुनः प्रस्थं दत्त्वा विघट्टयेत् ॥
तत्सर्वमेकतः कृत्वा स्निग्धे भाण्डे निधापयेत् ॥ ३८ ॥

उत्तम प्रकार पकेहुए आमोंका रस ३२ सेर, मिश्री ८ सेर, गौका घी चार सेर, सोंठका चूर्ण दो सेर, मिरचोंका चूर्ण एक सेर, पीपलका चूर्ण आध सेर और जल आठ सेर लेवे । सबोंको मिट्टीके उत्तम पात्रमें एकत्रकर विधिपूर्वक पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होकर करछीसे लगने लगे तब उसमें तेजपात १६ तोले, गठिवन, चीतेकी जड, नागरमोथा, धनियाँ, जीरा, काला जीरा, त्रिकुटा, जायफल, तालीशपत्र, दारचीनी, छोटी इलायची और नागकेशर इन प्रत्येक औषधियोंको चार चार तोले ले बारीक पीसकर मिलादेवे । जब अच्छे प्रकार पकजाय तब उतारकर शीतल होजानेपर उसमें एकप्रस्थ शहद डालकर सबको एकमएक करके चिकने बर्तनमें भरकर रखदेवे ॥ ३४-३८ ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५६


भोजनादादितः खादेत्पलमानं प्रमाणतः ।
गच्छेत्कन्दर्पदर्पान्धो रागवेगाकुलेन्द्रियः ॥ ३९ ॥
शतं वापि तदर्द्धं वा रमेत्स्त्रीणां पुमानयम् ।
संसेव्य भेषजं ह्येतद्वन्ध्यायां जनयेत्सुतम् ॥ ४० ॥
वीरं सर्वगुणोपेतं शतायुश्च भवेदयम् ।
मृतवत्सा च या नारी या च गर्भोपघातिनी ॥ ४१॥
साऽपि सूते सुतं सत्यं नारायणपरायणम् ।
वन्ध्याऽपि लभते पुत्रं वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ४२ ॥
कुरङ्ग इव संहृष्टो मातङ्ग इव विक्रमः ।
सदा भेषजसंसेवी भवेन्मारुतवेगवान् ॥ ४३ ॥

तदनन्तर प्रतिदिन भोजन करनेसे पहले इसको चार चार तोले प्रमाण सेवन करें। इसके सेवनसे कामदेवके मदसे अन्धीभूत और रागके वेगसे व्याकुल इन्द्रिय-वाला मनुष्य सौ या पचास स्त्रियोंको भोगता है। इस औषधिको सेवनकर वन्ध्या स्त्री भी वीर, सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त और शतायुषी पुत्रको उत्पन्न करती है। जिस स्त्रीके सन्तान होकर मरजाती है और जिसके गर्भ पतित होजाता है वह स्त्रीभी सत्य और नारायण परायण पुत्रको जनती है। इसक प्रतापसे वन्ध्या स्त्री पुत्रवाली और वृद्ध मनुष्य तरुण होता है। इस औषधिको सर्वकालमें नियमितरूपसे सेवन करनेवाला मनुष्य हिरनके समान हृष्ट पुष्टाङ्ग तथा प्रसन्न, हाथीके समान पराक्रमी और वायुके समान वेगवाला होता है ॥ ३९-१४३ ॥

हन्ति सर्वामयं घोरं कासं श्वासं क्षयं तथा ॥ ४४ ॥
दुर्नामाजीर्णकं चैव अम्लपित्तं सुदारुणम् ।
तृष्णां छर्दिं च मूर्च्छा च शूलमष्टविधं जयेत् ॥ ४५ ॥
खण्डाभ्रकमिदं प्रोक्तं भार्गवेण स्वयम्भुवा ।
वयस्यं मेध्यमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ॥ ४६ ॥
ग्रहरक्षःपिशाचघ्नमपस्मारविनाशनम् ।
पाण्डुरोगं प्रमेहं च मूत्रकृच्छ्रं च नाशयेत् ॥ ४७ ॥
वश्या योषिद्भवेत्पुंसां पुमान् वश्यश्च योषिताम् ।
दृष्टं वारसहस्रं च कथमत्र विचारणा ॥ ४८ ॥

१३५४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वाजीकरणा-


यह सर्वप्रकारके भयङ्कर रोग, खाँसी, श्वास, क्षय, बवासीर अजीर्ण, अम्लपित्त, तृषा, वमन, मूर्च्छा और आठ प्रकारके शूल इत्यादि रोगोंको जीतता है। इस खण्डाभ्रकरसायनको ब्रह्माके पुत्र भृगुऋषिने कहा है। यह आयु और मेधाको बढानेवाला तथा सब पापोंको हरनेवाला है। ग्रह, राक्षस और पिशाचोंकी बाधा, अपस्मार, पाण्डुरोग, प्रमेह और मूत्रकृच्छ्रादि विकारोंको शीघ्र नष्ट करता है। इससे स्त्री पुरुषोंके और पुरुष स्त्रियोंके वशीभूत होजाता है यह हजारों बार परीक्षा-कर देखागया है इसमें सन्देह नहीं ॥

गुडकूष्माण्ड ।

कूष्माण्डात्पलशतं सुस्विन्नं निष्कुलीकृतम् ।
प्रस्थं च घृततैलस्य तस्मिंस्तप्ते निधापयेत् ॥ ४९ ॥
त्वक्पत्रधान्यकव्योषजीरकैलाद्वयानलम् ।
ग्रन्थिकं चव्यमातङ्गपिप्पलीविश्वभेषजम् ॥ १५० ॥
शृङ्गाटकं कसेरुं च प्रलम्बं तालमस्तकम् ।
चूर्णीकृतं पलाशं च गुडस्य तुलया पचेत् ॥
शीतीभूते पलान्यष्टौ मधुनः सम्प्रदापयेत् ॥ ५१ ॥

छीलकर उसीजे हुए पेठेके टुकडे १०० पल, घी और तिलका तेल एक एक प्रस्थ और पुराना गुड १०० पल लेवे । प्रथम उक्त पेठेके टुकडोंको सुखाकर घी तेलमें भूनलेवे, फिर सबको एकत्रकर पेठेके रसमें पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें दारचीनी, तेजपात, धनियाँ, त्रिकुटा, जीरा, दोनों तरहकी इलायची, चीतेकी जड, पीपलामूल, चव्य, गजपीपल, पीपल, साँठ, सिंघाडे, कसेरू खीरेके बीज और ताडका मस्तक ये प्रत्येक चार चार तोले चूर्ण कर डाल देवे और शितल होनेपर आठ पल शहद मिलाकर चिकने वासनमें भरकर रखदेवे ॥ १४९-१५१ ॥

कफपित्तानिलहरं मन्दाग्नौ च प्रशस्यते ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ५२ ॥
प्रमदासु प्रसक्तानां ये च स्युः क्षीणरेतसः ।
क्षयेण च गृहीतानां परमेतद्भिषग्जितम् ॥ ५३ ॥
कासं श्वासं ज्वरं हिक्कां हन्ति च्छर्दिमरोचकम् ।
गुडकूष्माण्डकं ख्यातमश्विभ्यां समुदाहृतम् ॥ ५४ ॥
खण्डकूष्माण्डवत्पाच्यः स्विन्नकूष्माण्डकद्रवः ॥५५ ॥

५ धिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५५

इसके सेवनसे कफ, पित्त और वातजन्य रोग नष्ट होते हैं। यह मन्दाग्निमें सेवन करना हितकर है। कृश मनुष्योंको अत्यन्त पुष्टिकारक और उत्तम वाजीकरण है। जो पुरुष निरन्तर स्त्रियोंमें आसक्त होनेसे क्षीणवीर्य होगये हों और जो क्षयरोगसे ग्रसित हों उनका यह औषध परमोपयोगी है तथा खाँसी श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन और अरुचि आदि विकारोंको नष्ट करती है । इस गुडकूष्माण्डनामक औषधको अश्विनीकुमारोंने वर्णन किया है। इसमें खण्डकूष्माण्डके समान आठ सेर पेठेको उबालकर रस बनावे ॥ ५२–५५ ॥

कामेश्वरमोदक।

धात्रीसैन्धवकुष्ठकट्फलकणाशुण्ठीयमानीद्वयं
यष्टीजीरकयुग्मधान्यकशठीशृङ्गीवचाकेशरम् ।
तालीशं त्रिसुगन्धिकं समरिचं पथ्याक्षमेभिः समं
चूर्णीकृत्य मनाक् स्वबीजसहितं भृष्टा तु शक्राशनम्॥५६॥
सर्वेषां द्विगुणां सितां सुविमलां यत्नाद्भिषङ् निक्षिपेत्
क्षौद्रं चापि घृतं प्रशस्तदिवसे कुर्याच्छुभान्मोदकान् ।
कर्पूरैरवचूर्णितानपि हितान्दत्त्वा तिलान्भर्जितान्
गोप्योऽयं क्षितिमण्डलेऽमितधिया पाखण्डिनामग्रतः॥५७॥

आमले, सैंधानमक, कूठ, कायफल, पीपल, सोंठ, अजवायन, अजमोद, मुलहठी जीरा, कालाजीरा, धनियाँ, कचूर, काकड़ासिंगी, वच, नागकेशर, तालीशपत्र, दारचीनी, इलायची, तेजपात, मिरच, हरड और बहेडा इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर बीजोंसहित भुनीहुई भाँगका चूर्ण सबकी बराबर और समस्त चूर्णसे दुगुनी मिश्री, शहद तथा घृत लेकर सबको यथाविधिसे पकावे । पश्चात् सुगन्धिके लिये कपूरका चूर्ण और भुनेहुए तिलोंका चूर्ण मात्रानुसार डालकर उत्तम मोदक बनालेवे । बुद्धिमान् वैद्योंको यह योग पाखण्डियोंसे गुप्त रखना चाहिये ॥ ५६ ॥ ५७ ॥

आधिव्याधिहरः परं क्षयहरः कुष्ठापहो बृंहणः स्त्रीणां
तोषकरो मुखद्युतिकरः शुक्राग्निवृद्धिप्रदः। कासश्वास-
बलासरो़गनिचयप्रध्वंसनः प्राणिनां प्रोक्तो ब्रह्मसुतेन
सर्वसुखदः कामेश्वरो मोदकः ॥ ५८ ॥ अहगणपरीहीनः
सर्वशास्त्रप्रवीणो ललितविमलकीर्तिः प्राप्तकन्दर्पमूर्त्तिः ।

१३५६ भैषज्यरत्नावली । [ वाजीकरणा-

विगतसकलभीतिर्गीतवाद्याङ्गनीतिर्भवति भुवि स देवो येन भुक्तः प्रयत्नात् ॥ ५९ ॥

इसको शुभ दिनमें सेवन करनेसे मानसिक और शारीरिक सब विकार, क्षय और कुष्ठरोग दूर होते हैं। यह अत्यन्त बृंहण है । स्त्रियोंको प्रसन्न करनेवाला, मुखकी कान्ति, वीर्य और जठराग्निकी वृद्धि करनेवाला है । इससे खाँसी, श्वास और बलास आदि मनुष्योंके रोगसमूह नष्ट होते हैं । इस सर्वसुखदायी कामेश्वर-मोदकको भृगुजीने कहा है । जो मनुष्य इसको विधिपूर्वक सेवन करता है वह सम्पूर्ण ग्रहोंकी बाधासे मुक्त, सर्वशास्त्रोंमें कुशल, निर्मल कीर्त्तिवाला, कामदेवके समान रूपवाला, समस्त भयोंसे रहित, गीत वाद्यादिको जाननेवाला और देवताओंके समान होता है ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

रहसि युवतिखेलासम्पुटाकर्षहर्षार्द्रमयति युवतीनां केलिकौतूहलेन । यदि कथमपि भुक्तो भोजनादा वथान्ते सुरतरभसमुच्चैर्नष्टकामं प्रकामम् ॥ १६० ॥ यस्मान्नव्यबृहस्पतिस्तनुधियो यस्मात्सदा वीर्यवान् यस्मादुन्मददाक्षिणात्ययुवतीसम्भोगकौतूहली । यस्मात्काव्यकुतूहली सुकविता सञ्जायते लीलया श्रीमद्भिः प्रतिवासरं क्षितितले संसेव्यतां मोदकः॥१६१॥

इसको सेवन करनेवाला बडे आनन्दसे स्त्रियोंमें रमण करता है । यदि इसको भोजनके आदि और अन्तमें सेवन करे तो सुरतसमय नष्ट हुआ काम फिर प्रबल होता है । जिससे मनुष्य बृहस्पतिके समान बुद्धिमान्, अत्यन्त वीर्यवान्, कामक्रीडा करनेमें चतुर, स्त्रियोंके साथ सम्भोगरूपी कुतूहल करनेवाला और सहजमें सुन्दर कविता तथा काव्य कुतुहलको प्राप्त होता है ऐसे मोदक श्रीमानोंको प्रतिदिन नियमसे सेवन करने चाहिये ॥ १६० ॥ १६१ ॥

अन्य कामेश्वरमोदक। चूर्णीशं गगनं घनार्द्धविमलं गन्धं च कुष्ठामृता मेथी मोचरसो विदारि मुषली गोक्षूरकं चेक्षुरः । भीरुं चैव कशेरुकं यम (मा) निका तालाङ्कुरं धान्यकं यष्टी नागबला तिला मधुरिका जातीफलं सैन्धवम् ॥६२॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५७


भारङ्गीं कर्कटशृङ्गकं त्रिकटुकं जीरद्वयं चित्रकं चातुर्जातपुनर्नवा करिकणा द्राक्षा शठी कट्फलम् । शाल्मल्यंघ्रि फलत्रिकं कपिभवं बीजं समं चूर्णयेत् चूर्णांर्द्धा विजया सिता द्विगुणिता मध्वाज्यमिश्रं तु तत् ॥ कर्षाद्धां गुडिकाथ कर्षमथवा सेव्या सतां सर्वदा पेयं क्षीरमनु स्ववीर्यकरणे स्तम्भेऽप्ययं कामिनाम् ॥६३॥

कूठ, गिलोय, मेथी, मोचरस, विदारीकन्द, मुसली, गोखरू, तालमखाने, शता- वर, कसेरू, अजवायन, ताडके अंकुर, धनियाँ, मुलहठी, गंगेरन, घुलेहुए तिल, सौंफ, जायफल, सेंधानमक, भारङ्गी, काकडासिंगी, त्रिकुटा, जीरा, कालाजीरा, चीतेकी जड, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, पुनर्नवा गजपीपल, दाख, कचूर, कायफल, सेमलकी मुसली, त्रिफला, कौंछके बीज, इनको समान भाग लेकर चूर्ण करलेवे । इस चूर्णमें सब चूर्णसे चौथाई भाग अभ्रक, अभ्रकसे आधा भाग शुद्ध गन्धक और सब चूर्णसे आधी भांग एवं सबसे दुगुनी मिश्री, शहद और घी यथाविधि मिलाकर पकावे । फिर आधे कर्ष अथवा एक एक कर्षके लड्डू बनालेवे । प्रतिदिन एक एक लड्डू खावे और ऊपरसे दूध पीवे तो इससे कामी पुरुषोंके वीर्य स्तम्भन होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

रतिवल्लभमोदक ।

शक्राशनस्य बीजानां चूर्णानि पलपञ्च च । हविषः कुडवं चैव सिताप्रस्थं प्रगृह्य च ॥ ६४ ॥ शतावरीरसप्रस्थं तथा शक्राशनस्य च । गव्यमाजं पयः प्रस्थं ततः प्रस्थद्वयं पचेत् ॥ ६५ ॥

भाँगके बीजोंका चूर्ण २० तोले, गोघृत १६ तोले, मिश्री एक प्रस्थ, शता- वरका रस एक प्रस्थ, भाँगका रस एक प्रस्थ, गौका दूध एक प्रस्थ और बक- रीका दूध एक प्रस्थ, इन सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर मृदु अग्निके द्वारा पकावे ॥ ६४ ॥ ६५ ॥

धात्री द्विजीरकं मुस्तं त्वगेलापत्रकेशरम् । आत्मगुप्ता चातिबला तालांकुरकशेरुकम् ॥ ६६ ॥ शृङ्गाटकं त्रिकटुकं धान्यमभ्रं च वङ्गकम् । पथ्या द्राक्षा द्विकाकोल्यौ खर्जूरं क्षुरकं तथा ॥ ६७ ॥

१३५८भैषज्यरत्नावली ।[ वाजीकरणा-

कटुका मधुकं कुष्ठं लवङ्गं सारसैन्धवम् ।
यमानी चाजमोदा च जीवन्ती गजपिप्पली ॥ ६८ ॥
प्रत्येकं कर्षमेकं तु चूर्णितानि शुभानि च ।
कुडवार्द्धं पादशेषे मधुनः प्रक्षिपेत्तथा ॥
मृगाण्डजं सकर्पूरं यथालाभं विनिक्षिपेत् ॥ ६९ ॥

जब पाक पकते पकते अवलेहके समान गाढा होजाय तब उसमें आमले, जीरा, काला जीरा, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, कौंछके बीज, कंघी, ताडके अंकुर, कशेरू, सिंघाडे, त्रिकुटा, धनियाँ, अभ्रक, वङ्ग, हरड, दाख, काकोली, खजूर, तालमखाना, कुटकी, मुलहठी, कूठ, लौंग, सैंधानमक, अजवायन, अजमोद, जीवन्ती और गजपीपल इन प्रत्येक औषधोंके चूर्णको एक एक कर्ष डाल देवे । जब उत्तमप्रकार पाक पककर सिद्ध होजाय तब शीतल होजानेपर उसमें शहद ८ तोले और सुगन्धिके लिये किञ्चित् कस्तूरी तथा कपूर मिलाकर लड्डू बनालेवे ॥ ६६-६९ ॥

रतिवल्लभनामाऽयं सेव्यमानो महारसः ।
परमोजस्करो बल्यो वातव्याधिविनाशनः ॥ ७० ॥
वातपित्तहरो वृष्यो दृष्टिसन्दीपनः परः ।
पित्तश्लेष्मास्रपित्तघ्नो विषगुल्मज्वरापहः ॥ ७१ ॥
यापयत्येष मन्दाग्निं रोगाणां क्षयहेतुकः ॥ ७२ ॥
न भवेल्लिङ्गशैथिल्यं वृद्धानां पुष्टिवर्द्धनम् ।
कृशानां बृंहणं श्रेष्ठं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ७३ ॥
यस्य गेहे सदा बह्व्यः पत्न्यः स्युः सुमनोहराः ।
तेन सेव्यः सदैवायं मोदको रतिवल्लभः ॥ ७४ ॥

यह रतिवल्लभनामक महारस उचित मात्रासे प्रतिदिन सेवन करना चाहिये । यह अत्यन्त ओजस्कर, बलकर, वातव्याधिनाशक, वात-पित्तहर, वृष्य, नेत्र-शक्तिवर्द्धक, पित्त, कफ, रक्तपित्त, विष, गुल्मज्वर, मन्दाग्नि और क्षयरोगोंको नाश करनेवाला है । इससे लिङ्गमें शिथिलता नहीं होती । यह वृद्ध मनुष्योंको भी पुष्ट करता है । कृश मनुष्योंको बृंहण और उत्तम वाजीकरण है । जिसके घरमें बहुतसी सुन्दरी स्त्रियाँ हों उसको यह रतिवल्लभमोदकरस निरन्तर सेवन करना चाहिये ॥ १७०-१७४ ॥

ऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३५९

कामाग्निसन्दीपनमोदक ।

कर्षो रसो गन्धकमभ्रकं च द्विक्षारचित्रे लवणानि पञ्च ।
शठी यमानीद्वयकीटहारी तालीशपत्राण्यपरं द्विकर्षम् ॥ ७५ ॥
जीरं चतुर्जातलवङ्गजातीफलं च कर्षत्रयमेवमन्यत् ।
सवृद्धदारं कटुकत्रयं च तथा चतुःकर्षमितं निबोध ॥ ७६ ॥
धन्याकयष्टीमधुरीकशेरुकर्षाः पृथक् पञ्च वरी विदारी ।
वरेभकर्णैभकणात्मगुप्ताबीजं तथा गोक्षुरबीजयुक्तम् ॥ ७७ ॥
सबीजपत्रेन्द्ररजः समानं समा सिता क्षौद्रघृतं च तुल्यम् ।
कर्षैकमिन्दोरथ मोदकं तत्कामाग्निसन्दीपनमेतदुक्तम् ॥ ७८ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक, जवाखार, सज्जी, चीता, पाँचोंनमक, कचूर अजवायन, अजमोद, वायबिडङ्ग और तालीशपत्र ये प्रत्येक एक एक कर्ष, जीरा दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, जायफल ये दो दो कर्ष, विधारेके बीज, त्रिकुटा प्रत्येक तीन तीन कर्ष धनियाँ, मुलहठी, सौंफ, कसेरू ये चार चार कर्ष, शतावर, विदारीकन्द, त्रिफला, हस्तिकर्ण, पलाशकीजड, गजपीपल, कौंछके बीज, गोखुरु ये प्रत्येक पाँच पाँच कर्ष एवं बीज और पत्तोंसहित भाँगका चूर्ण सब औषधियोंके चूर्णके बराबर भाग तथा सर्वोंकी बराबर मिश्री, शहद : और घी लवे । सबको विधिपूर्वक मन्द मन्द अग्निसे पकावे फिर उसमें एक कर्ष कपूर डालकर करछीसे सबको एकम एक करके मोदक बनालेवें । इस रसको कामाग्निसन्दीपन कहते हैं ॥७५-७८॥

वृष्यस्त्वतः परतरं सततं न दृष्ट एनं निषेव्य मनुजः प्रमदासहस्रम् ।
गच्छेत्र लिङ्गशिथिलत्वमवाप्नुयाच्च नागाधिपं विजयते बलतः प्रमत्तम् ॥ ७९ ॥
कान्त्या हुताशनमपि स्वरतो मयूरान् वाहं जवेन नयनेन महाविहङ्गम।
वातानशीतिमथ पित्तगदं समग्रं श्लेष्मोत्थविंशतिरुजः परमग्निमान्द्यम् ॥ १८० ॥
दुर्नामकामलभ गन्दरपाण्डुरोग मेहातिसारकृमिहृद्ग्रहणीप्रदोषान् ।
कासज्वरश्वसनपीनसपार्श्वशूलशूलामॢपित्तसहितांशिरोजान् समस्तान् ॥ ८१ ॥
हत्वा गदानपि च तत्पुमपत्यकारि

१३६० भैषज्यरत्नावली [ वाजीकरणा- ]

सर्वर्तुपथ्यमथ सर्वसुखप्रदायि । वृष्यं वलीपलितहारि रसायनं स्याच्छ्रीमूलदेवकथितं परमं प्रशस्तम् ॥८२ ॥

इसके सेवनसे निरन्तर वीर्य्यकी वृद्धि होती है । मनुष्य हजारों स्त्रियोंको भोगता है तो भी उसका लिंग शिथिल नहीं होता बल्कि ऐरावत हाथीके समान दृढ और बलवान् होजाता है । अग्निके समान प्रदीप्त कान्ति, मोरके समान स्वर, घोडेके समान वेग और गरुडके समान दृष्टिशक्ति प्रबल होती है । यह मोदक अस्सी प्रकारके वातरोग, समस्तपित्तरोग, बीस प्रकारके कफरोगों एवं दुर्नामादि उल्लिखित सर्व प्रकारके रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । अग्निको अत्यन्त प्रदीप्तकर पुरुष सन्तानको बढाता है । यह सर्व ऋतुओंमें सेवन करने योग्य सब प्रकारके सुखोंकों देनेवाला, वयवृद्धि और पुष्टिकारक, वली और पलितरोगसंहारक एवं परमोत्तम रसायन है । इसको श्रीमुलदेवजीने वर्णन किया है ॥ १७९-१८२ ॥

बृहच्छतावरीमोदक ।

शतावरी श्वदंष्ट्रा च बला चातिबला तथा । मर्कटीक्षुरबीजं च विदारीकन्दजं रजः ॥ ८३ ॥ एतानि समभागानि पलिकानि विचूर्णयेत् । तस्माच्चतुर्गुणं देयं त्रैलोक्यविजयारजः ॥ ८४ ॥ एतदेकीकृतं यावत्तदर्द्धं माहिषं पयः । तावन्मात्रेण दातव्यः शतावर्या रसस्तथा ॥ ८५ ॥ विदार्य्याः स्वरसप्रस्थं सिता पलशतद्वयम् । गोलयित्वा सितां चैव पात्रे ताम्रमये दृढे ॥ ८६ ॥ पाचयेत्पाकविद्वैद्यो मोदकं परमं हितम् । त्र्यूषणं त्रिफला दन्ती त्रिजातं सैन्धवं शठी ॥ ८७ ॥ धान्यकं बालकं मुस्तं कस्तूरी गोस्तनी तुगा । जातीकोषफलं मांसी पत्रं नागेन्द्रग्रन्थिकम् ॥ ८८ ॥ शतपुष्पा चवी दारु प्रियङ्गुं सलवङ्गकम् । सरलं शैलजं कुष्ठं जातीपुष्पं यमानिका ॥ ८९ ॥ कट्फलं केशरं मेथी मधुरं सुरदारु च । मिषिस्तालीशपत्रं च खर्जूरं रसगन्धकौ ॥ ९० ॥