भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1368

१३३६ | भैषज्यरत्नावली । | [वाजीकरणा-

उच्चटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममुच्यते ।
शतावर्युच्चटाचूर्णं पेयमेवं सुखार्थिना ॥ २९ ॥
केवल उच्चटाके चूर्णको अथवा उच्चटा और शतावरके चूर्णको एकत्र मिलाकर सुखकी इच्छा करनेवाला मनुष्य दूधके साथ पान करे तो वीर्यवृद्धि होती है ॥

कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमन्वितम् ।
पयोऽनुपानं यो लिह्यान्नित्यवेगः समो भवेत् ॥ ३० ॥
मुलहठीके १ कर्ष चूर्णको घी और शहदमें मिलाकर सेवन करे और ऊपरसे दूध पीवे तो प्रतिदिन कामशक्ति प्रबल होती है ॥ ३० ॥

आर्द्राणि मत्स्यमांसानि शफरीर्वा सुभर्जिताः ।
तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्त्रीषु न क्षयम् ॥३१॥
जो मनुष्य गीले मांस मछली अथवा शफरीमछलीको घृतमें भूनकर भक्षण करे तो उसके स्त्रीसहवास करनेपर भी वीर्य क्षय नहीं होता ॥ ३१ ॥

गोक्षुराद्यचूर्णं ॥
गोक्षुरकः क्षुरकः शतमूली वानरिनागबलाऽतिबला च ।
चूर्णमिदं पयसा निशि पेयं यस्य गृहे प्रमदाशतमस्ति ॥३२॥
जिसके घरमें सौ स्त्रियें हों वह मनुष्य गोखुरू, तालमखाना, शतावर कौंछ, गंगेरन, कंघी इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको दूधके साथ रात्रिमें सेवन करे ॥

नरसिंहचूर्णं ।
शतावरीरजः प्रस्थं प्रस्थं गोक्षुरकस्य च ।
वाराह्या विंशतिपलं गुडूच्याः पञ्चविंशतिः ॥ ३३ ॥
भल्लातकानां द्वात्रिंशच्चित्रकस्य दशैव तु ।
तिलानां शोधितानां च प्रस्थं दद्यात्सुचूर्णितम् ॥ ३४ ॥
त्र्यूषणस्य पलान्यष्टौ शर्करायाश्च सप्ततिः ।
माक्षिकं शर्कराद्धेन माक्षिकाद्धेन वै घृतम् ॥ ३५ ॥
शतावरीसमं देयं विदारीकन्दजं रजः ।
एतदेकीकृतं चूर्ण स्निग्धभाण्डे निधापयेत् ॥ ३६ ॥
शतावरका चूर्ण १ प्रस्थ, गोखुरूका चूर्ण १ प्रस्थ, वाराहीकन्द २० पल, गिलोय २५ पल, भिलावे ३२ पल, चीता १० पल, धुले हुए तिलोंका चूर्ण

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