भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1367, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३३५
पिप्पलीलवणोपेतौ बस्ताण्डौ क्षीरसर्पिषा ।
साधितौ भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत्प्रमदाशतम् ॥ २३ ॥
जो बकरेके दोनों अण्डकोषोंको दूधमें पकाकर और घृतमें भूनकर पीपलका चूर्ण और सैंधानमक मिलाकर भक्षण करे तो वह सौ स्त्रियोंको भोगनेके लिये समर्थ होता है ॥ २३ ॥
बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ।
यः खादेत्स नरो गच्छेत्स्त्रीणां शतमपूर्ववत् ॥ २४ ॥
जो पुरुष बकरेके अण्डकोषोंके द्वारा सिद्ध कियेहुए दूधमें भूसीरहित तिलोंको सातवार भावना देकर, भक्षण करे तो वह सैंकडों स्त्रियोंमें गमन करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है ॥ २४ ॥
चूर्णं विदार्याः सुकृतं तद्रसेनैव भावितम् ।
सर्पिःक्षौद्रयुतं भुक्त्वा शतं गच्छेद्वराङ्गनाः ॥ २५ ॥
विदारीकन्दके चूर्णको उसके ही स्वरसमें ७ बार उत्तमप्रकार भावना देकर घी, दूधके साथ मिलाकर सेवनसे मनुष्य सैंकडों स्त्रियोंको भोगनेवाला होता है ॥
एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीढ्वा पयः पिबेत् ॥
एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति ॥ २६ ॥
आंमलोंके चूर्णको आमलोंके ही स्वरसमें भावना देकर खाँड, शहद और घीके साथ मिलाकर चाटे, ऊपरसे दूध पिये तो इससे अस्सीवर्षका बुढा आदमी भी युवाकी समान आनन्दको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥
विदारीकन्दकल्कं तु घृतेन पयसा नरः ।
उडुम्बरसमं खादेद् वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ २७ ॥
विदारीकन्द और गूलर इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर कल्क बनालेवे । फिर घृत और दूधके साथ उक्त कल्कको भक्षण करे तो वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान रमण करता है ॥ २८ ॥
स्वयंगुप्तेक्षुरकयोर्बीजं समधुशर्करम् ।
धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं व्रजेत् ॥ २८ ॥
कौंछके बीजोंका चूर्ण और तालमखानेके चूर्णको समभाग लेकर शहद और चीनी तथा धारोष्ण दूधके साथ मिलाकर पान करनेसे वीर्य क्षीण नहीं होता है ॥