भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1405

अधिकारः ] भ.पाटीकासहिता । १३७३


जीरा, कौंछके बीज, ऋषभक, इलायची, मुलहठी, दाख, मुगवन, मधवन, जीवन्ती, पीपल, खिरेंटी, शतावर और विदारीकन्द इनको एक एक कर्षप्रमाण बारीक पीसकर डालदेवे और मन्द मन्द अग्निद्वारा घृतको सिद्ध करे । जब उत्तम पकजाय तब उसमें शीतल होनेपर मिश्री १६ तोले और शहद १६ तोले मिलादेवे । प्रतिदिन इस घृतको दो दो तोले प्रमाण हथेलीपर रखकर चाटे और पीछेसे सुखोष्ण दूध पीवे । इसपर यथेच्छ आहार विहार करे ॥ ७५-२८० ॥

क्षीणेन्द्रियाः क्षीणशुक्रा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ।
हीनमांसाश्च ये केचित्प्राश्येरं मात्रया घृतम् ॥ ८१ ॥
ओजः स्वास्थ्यं च तेजश्च प्रसादं हीन्द्रियस्य च ।
लभते सूर्यसङ्काशो भ्राजते विगतज्वरः ॥ ८२ ॥
वृद्धो वृषायते स्त्रीषु नित्यं षोडशवर्षवत् ।
नारीणां च शतं गच्छेद्व न शुक्रक्षयो भवेत् ॥ ८३ ॥
वन्ध्या च लभते पुत्रं बुद्धिमेधासमन्वितम् ।
मासमात्रप्रयोगेण वलीपलितनाशनम् ॥ ८४ ॥
खालित्यं तिमिरं व्याधीन्वातिकांन्कफपित्तजान् ।
पञ्च कासान्क्षयं श्वासं हिक्कां च विषमज्वरम् ॥
हन्ति सर्वान् गदाञ्छीघ्रमश्विभ्यां निर्मितं पुरा ॥ ८५ ॥

जो नष्टेन्द्रिय, नष्टवीर्य, वृद्ध, दुर्बल और मांसहीन स्त्री अथवा पुरुष हो उनके यह घृत उचित मात्रासे सेवन करनेसे ओज, तेजकी वृद्धि, इन्द्रियोंकी प्रसन्नता और आरोग्यताको उत्पन्न करता है । ज्वरोंसे रहित होकर सूर्यके समान कान्तिमान् होता है । वृद्ध पुरुष नित्यप्रति स्त्रियोंमें सोलहवर्षके युवाके समान रमण करता है । सैकड़ों स्त्रियोंको भोगनेपर वीर्यपात नहीं होता । वंध्या स्त्रीभी बुद्धिमान् और मेधावान् पुत्रको उत्पन्न करती है । इस घृतको एक महीनेतक सेवन करे तो यह वली, पलित, खालित्य, तिमिर, वात, पित्त कफसम्बन्धी रोग, पाँच प्रकारकी खाँसी, क्षय, श्वास, हिचकी और विषमज्वर आदि विकारोंको तत्काल नाश करता है । इसको पूर्वकालमें अश्विनीकुमारोंने रचा है ॥ २८१-८५ ॥

अमृतप्राशघृत ।

छागमांसतुलां चैव वाजिगन्धां तथैव च ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं कुर्यात्पादावशेषितम् ॥ ८६ ॥