भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३७४ भैषज्यरत्नावली। [ वाजीकर .।-
पचेत्तेन घृतप्रस्थमजाक्षीरं चतुर्गुणम् ।
मूर्च्छनार्थे प्रदातव्यं कुंकुमं च द्विकार्षिकम् ॥ ८७ ॥
बलामूलं च गोधूमं चाश्वगन्धा तथाऽमृता ।
गोक्षुरं च कशेरुं च त्रिकटू च सधान्यकम् ॥ ८८ ॥
तालांकुरं त्रैफलं च कस्तुरी बीजवानरी ।
मेदे द्वे च तथा कुष्ठं जीवकर्षभकौ शठी ॥ ८९ ॥
दार्वा प्रियङ्गु मञ्जिष्ठा नतं तालीशपत्रकम् ।
एलापत्रत्वचं नागं जातिकुसुमरेणुकम् ॥ २९० ॥
सरलं जातिकोषं च सूक्ष्मैलोत्पलसारिवा ।
मूलं बिम्बस्य जीवन्ती ऋद्धिवृद्धी उडुम्बरः ॥ ९१ ॥
प्रत्येकं कर्षमानानि पेषयित्वा विनिक्षिपेत् ।
वस्त्रपूते सुशीते च सितां दद्याच्छरावकम् ॥
कर्षमात्रं ततः खादेदुष्णदुग्धानुपानतः ॥ ९२ ॥
बकरेका मांस १०० पल और असगन्ध १०० पल लेकर दोनोंको एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । उस क्वाथमें घी एक प्रस्थ, बकरीका दूध ४ प्रस्थ मूर्च्छनार्थ केशर २ कर्ष एवं खिरेंटीकी जड, गेहूँ, असगन्धक, गिलोय, गोखुरू, कसेरू, सोंठ, मिरच, पीपल, धनियाँ, ताडके अंकुर, त्रिफला, कस्तूरी, कौंछके बीज, मेदा, महामेदा, कूट, जीवक, ऋषभक, कचूर, दारुहलदी, फूलप्रियंगु, मंजीठ, तगर, तालीशपत्र, बडी इलायची, तेजपात, दारचीनी, नागकेशर, चमेलीके फूल, रेणुका, धूपसरल, जावित्री, छोटी इलायची, लालकमल, अनन्तमूल, कन्दूरीकी जड, जीवन्ती, ऋद्धि, वृद्धि और गूलर ये प्रत्येक औषधि एकएक कर्ष प्रमाण कूट पीसकर डालदेवे और पुनर्वार पकावे । जब घृत उत्तमप्रकार सिद्ध होजाय तब वस्त्रसे छानकर शीतल होजानेपर उसमें मिश्री ६४ तोले परिमाण डालकर मिलादेवे । इस घृतको प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक कर्ष प्रमाण सेवन करे और मन्दोष्ण दुग्धका अनुपान करे ॥ २८६–२९२ ॥
बृंहणीयं विशेषेण बलपुष्टिकरं सदा ।
प्रमेहान्ध्वजभङ्गांश्च नाशयेदविकल्पतः ॥ ९३ ॥
एतद् वृष्यकरं सर्पिः काशिराजेन निर्मितम् ।