भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकारः ] भाषाटीकासहिता । १३७५
दृष्टं सिद्धफलं ह्येतद्वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ९४ ॥
अमृतप्राशनामेदं सर्व्वामयनिषूदनम् ।
शिरोरोगे नष्टशुके स्त्रीषु नष्टार्त्तवासु च ॥ ९५ ॥
न च शुक्रक्षयं याति बलं ह्रासं न च व्रजेत् ।
दशस्त्रीणां रमेन्नित्यमानन्द उपजायते ॥ ९६ ॥
कासार्शआमशूलघ्नं बद्धकोष्ठहरं परम् ।
सिद्धघृतप्रयोगेन स्थिरं भवति यौवनम् ॥ ९७ ॥
यह घृत बृंहणीय विशेषकर बल और पुष्टिको देनेवाला एवं प्रमेह और ध्वजभङ्गको निश्चय नष्ट करनेवाला है। अत्यन्त वीर्यवर्द्धक इस घृतको काशिराज शिव ने निर्मित किया है। यह वाजीकरण और सिद्धफलको देनेवाला है ऐसा अनुभव कर देखागया है। यह अमृतप्राशनामक घृत सर्वप्रकारके रोगोंको दूर करता है। शिरोरोग, नष्टशुक्र और स्त्रियोंका नष्ट आर्त्तवमें यह परमोपयोगी है। इससे वीर्यक्षय और बलका ह्रास कभी नहीं होता। प्रतिदिन दश स्त्रियोंको भोगे तो भी अधिकाधिक आनन्द उत्पन्न होता है। खाँसी, बवासीर, आमशूल और कोष्ठबद्धताको शीघ्र हरता है। इस सिद्ध घृतके सेवनसे युवावस्था स्थिर होती है ॥ २९३–२९७ ॥
बृहच्छागलाद्यघृत ।
छागमांसतुलां गृह्य दशमुल्याः पलं शतम् ।
अश्वगन्धापलशतं वाट्यालकशतं तथा ॥ ९८ ॥
घृताढकं पचेत्तोयैश्चतुर्भागावशेषितैः ।
क्षीरं स्नेहसमं दद्याच्छतावर्या रसं तथा ।
ताम्रपात्रे दृढे चैव शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ९९ ॥
बकरीका माँस सौ १०० पल, दशमूलकी सब औषधियाँ १०० पल, असगन्ध १०० पल और खिरेंटी १०० पल इनको अलग अलग एक एक द्रोण जलमें पकावे। जब चतुर्थभागावशिष्ट जल रहे तब उतारकर छानलेवे। फिर सबको एकत्र कर उस क्वाथमें घी १ आढक और शतावरका रस १ आढक परिमाण डालकर ताँबेके पात्रमें भरकर मन्दमन्द अग्निद्वारा पकावे ॥ ९९ ॥
अस्यौषधस्य कल्कस्य प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् ॥ ३०० ॥